अरुंधती ने सिर्फ इतना ही नहीं कहा था
वरवर राव
28 अक्टूबर 2010
कश्मीर की आज़ादी के पक्ष में बोलने को देशद्रोह कहने वाले अरुंधति राय की गिरफ़्तारी की मांग कर रहे हैं. लेकिन, जैसा अरुंधति ने खुद कहा है, वे यह आवाज़ बुलंद करनेवाली अकेली नहीं हैं. कश्मीर ही नहीं, लाखों आवाजें भारत और भारत से बाहर भी उठ रही हैं जो यह मांग कर रही हैं की कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के अधिकार का सम्मान किया जाये. उन्हें आज़ादी दी जाये. लाखों लोगों को बर्बर फौजी ताकत के बल पर आधी सदी से भी ज्यादा समय तक आपने कब्ज़े में रखना देशप्रेम कैसे हो सकता है? और क्या देशप्रेम इतनी घिनौनी, इतनी अमानवीय, इतनी असंवेदनशील भावना है? इसलिए, कश्मीरी जो कह रहे हैं (और वे यह 60 साल से अधिक समय से कह रहे हैं) उसे सुना जाना चाहिए बजाय उनका पक्ष ले रहे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के. अरुंधति और कश्मीरी लोगों के समर्थन में हम यहाँ वरवर राव की यह टिप्पणी पेश कर रहे हैं. तेलुगु के क्रांतिकारी कवि वरवर कई बार देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किये गए हैं और हर बार बरी हुए हैं.
पिछले हफ्ते दिल्ली में हुए सेमिनार 'आज़ादी: द ओनली वे' में बोलनेवाले लोगों में से एक होने के नाते मुझे अरुंधति द्वारा कश्मीर के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार और आज़ादी पर दिए गए बयान पर मचे इस हाय-तौबा पर कोई हैरत नहीं है. उनको देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार करने कि मांगों पर भी मुझे हैरत नहीं है.
ऐसी बातें कहने वाली वे पहली नहीं हैं और न ही आखिरी होने जा रही हैं. दरअसल मीटिंग में शामिल हुए सभी लोगों ने- प्रो सुजातो भद्र, सैयद अली शाह गिलानी और मैंने खुद ऐसी हीभावनाओं का इज़हार किया था. इसकी वजह बहुत साफ है: कश्मीर के लोग यही चाहते हैं और इसे भूला नहीं जा सकता.
या तो जानबूझ कर या फिर किसी और वजह से मीडिया और राजनेता अरुंधति द्वारा उठाये गए कुछ पहलुओं पर बात नहीं कर रहे हैं. इसलिए उनका ज़िक्र करना ज़रूरी है.
आत्मनिर्णय के अधिकारों का पक्ष लेते हुए राय ने इस पर जोर दिया कि अकेले आज़ादी हर चीज़ नहीं दे सकती: उन्होंने जानना चाहा कि कश्मीरी लोगों को जब आज़ादी मिल जाएगी तो कश्मीरियों को कैसा इंसाफ मिलेगा. उन्होंने कश्मीर के एक दौरे के दौरान सुने गए नारे का हवाला दिया: 'भूखा नंगा हिंदुस्तान, जान से प्यारा पाकिस्तान' और इस नज़रिए पर गंभीर आपत्ति जताई थी. राय ने कहा कश्मीरियों के संघर्ष का समर्थन ठीक इन्हीं (भूखे-नंगे) वर्गों से आ रहा है- बुद्धिजीवियों के एक छोटे से हिस्से के अलावा देश के दूसरे हिस्सों के गरीब और उत्पीड़ित लोग कश्मीरी लोगों कि आज़ादी के संघर्ष को समर्थन दे रहे हैं. उनके संघर्ष का विरोध भारतीय राज्य कर रहा है.
मैं गिलानी के बदले हुए नज़रिए पर भी हैरान हुआ. दस साल पहले उन्होंने कहा था कि कश्मीर कि समस्याओं का हल इस्लाम के ज़रिये होगा. लेकिन आज उन्होंने हमें यह दिलाया कि महात्मा गाँधी चाहते थे कि कश्मीरी खुद तय करें कि वे कहाँ रहेंगे, कैसे जवाहरलाल नेहरू ने जनमत संग्रह का पक्ष लिया और कैसे भाजपा के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान से बातचीत कर के इसके राजनीतिक समाधान की कोशिशें कीं. हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि हैदराबाद और कश्मीर रियासतें उन तीन रियासतों में से थीं जो आज़ादी के समय भारतीय संघ का हिस्सा नहीं थे. तेलंगाना केलोग, हैदराबाद जिसका एक हिस्सा है, अब देश के भीतर अलग राज्य की मांग कर रहे हैं लेकिन कश्मीर के लोग, तभी से, मजबूती से आज़ादी के पक्ष में हैं. उनकी मांगों को मान्यता दिए बिना समाधान नहीं निकाल सकता.
अनुवादक: रियाज़-उल-हक़
अनुवाद तारीख: 28 अक्टूबर, 2010
| लेखक | विषय | संवाद | साभार | अनुवादक |
पहले वो आए साम्यवादियों के लिए
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था
फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था
फिर वो यहूदियों के लिए आए
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था
फिर वो आए मेरे लिए
और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था
