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जंतर-मंतर - Mon, 21/08/2017 - 10:56
चर्चिल और जिन्ना की साज़िश का नतीजा था देश का बंटवारा
शेष नारायण सिंह
भारत का बँटवारा एक  बहुत बड़ा धोखा था  जो कई स्तरों पर खेला गया था. अँगरेज़ भारत को आज़ाद किसी कीमत पर नहीं करना चाहते थे लेकिन उनके प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल को सन बयालीस के बाद जब अंदाज़ लग गया कि अब महात्मा  गांधी की आंधी के सामने टिक पाना नामुमकिन है तो उसने देश के टुकड़े करने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया .जिन्नाह अंग्रेजों के वफादार थे ही , चर्चिल ने देसी राजाओं को भी हवा देना शुरू कर दिया था . उसको उम्मीद थी कि राजा लोग कांग्रेस के अधीन भारत में शामिल नहीं होंगें . पाकिस्तान तो उसने बनवा लिया लेकिन राजाओं को सरदार पटेल ने भारत में शामिल होने के लिए राजी कर लिया. जो नहीं राजी हो रहे थे उनको नई हुकूमत की ताकत दिखा दी . हैदराबाद का  निजाम और जूनागढ़ का नवाब कुछ पाकिस्तानी मुहब्बत में नज़र आये तो उनको सरदार पटेल की राजनीतिक अधिकारिता के दायरे  में ले लिया  गया और कश्मीर का राजा  शरारत की बात सोच रहा था तो उसको भारत की मदद की ज़रुरत तब पड़ी जब पाकिस्तान की तरफ से कबायली हमला हुआ . हमले के बाद राजा डर गया और सरदार ने  उसकी मदद करने से इनकार कर दिया . जब राजा ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज़ पर दस्तखत कर  दिया तो  पाकिस्तानी फौज और कबायली हमले को भारत की सेना ने वापस भगा दिया .लेकिन यह सब देश के बंटवारे के बाद हुआ . १९४५ में  तो चर्चिल ने इसे एक ऐसी योजना के रूप में सोचा रहा होगा जिसके बाद भारत  के टुकड़े होने से कोई रोक नहीं सकता था .  चर्चिल का सपना था कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद  जिस तरह से यूरोप के देशों का विजयी देशों ने यूरोप के देशों में प्रभाव क्षेत्र का बंदरबाँट किया था , उसी तरह से भारत में भी कर लिया जाएगा .अंग्रेजों ने भारत को कभी भी अपने से अलग करने की बात सोची ही  नहीं थी. उन्होंने तो दिल्ली में एक खूबसूरत राजधानी बना ली थी .  प्रोजेक्ट नई दिल्ली १९११ में शुरू हुआ था और महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन और  सिविल नाफ़रमानी आन्दोलन की सफलता के बावजूद भी नयी इंपीरियल कैपिटल में ब्रिटिश हुक्मरान  पूरे  ताम झाम से आकर बस गए थे . 10 फरवरी 1931 के दिन नयी दिल्ली को औपचारिक रूप से ब्रिटिश भारत की राजधानी बनाया गया. उस वक़्त के वाइसराय लार्ड इरविन ने नयी दिल्ली शहर का विधिवत उदघाटन किया . १९११ में जार्ज पंचम के राज के दौरान दिल्ली में दरबार हुआ और तय हुआ कि राजधानी दिल्ली में बनायी जायेगी. उसी फैसले को कार्यरूप देने के लिए रायसीना की पहाड़ियों पर नए शहर को बसाने का फैसला हुआ और नयी दिल्ली एक शहर के रूप में विकसित हुआ . इस शहर की डिजाइन में एडविन लुटियन क बहुत योगदान है . १९१२ में एडविन लुटियन की दिल्ली यात्रा के बाद शहर के निर्माण का काम शुरू हो जाना था लेकिन विश्वयुद्ध शुरू हो गया और ब्रिटेन उसमें बुरी तरह उलझ गया इसलिए नयी दिल्ली प्रोजेक्ट पर काम पहले विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुआ. यह अजीब इत्तिफाक है कि भारत की आज़ादी की लडाई जब अपने उरूज़ पर थी तो अँगरेज़ भारत की राजधानी के लिए नया शहर बनाने में लगे हुए थे. पहले विश्वयुद्ध के बाद ही महात्मा गाँधी ने कांग्रेस और आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व संभाला और उसी के साथ साथ अंग्रेजों ने राजधानी के शहर का निर्माण शुरू कर दिया . १९३१ में जब नयी दिल्ली का उदघाटन हुआ तो महात्मा गाँधी देश के सर्वोच्च नेता थे और पूरी दुनिया के राजनीतिक चिन्तक बहुत ही उत्सुकता से देख रहे थे कि अहिंसा का इस्तेमाल राजनीतिक संघर्ष के हथियार के रूप में किस तरह से किया जा रहा है . १९२० के महात्मा गाँधी के आन्दोलन की सफलता और उसे मिले हिन्दू-मुसलमानों के एकजुट समर्थन के बाद ब्रिटिश साम्राज्य के लोग घबडा गए थे . उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता को तोड़ने के लिए सारे इंतज़ाम करना शुरू कर दिया था . हिन्दू महासभा के नेता वी डी सावरकर को माफी देकर उन्हें किसी ऐसे संगठन की स्थापना का ज़िम्मा दे दिया था जो हिन्दुओं और मुसलमानों में फ़र्क़ डाल सके . उन्होंने अपना काम बखूबी निभाया .उनकी  नयी किताब ‘ हिंदुत्व’ इस मिशन में बहुत काम आई . १९२० के आन्दोलन में दरकिनार होने के बाद कांग्रेस की राजनीति में निष्क्रिय हो चुके मुहम्मद अली जिन्ना को अंग्रेजों ने सक्रिय किया और उनसे मुसलमानों के लिए अलग देश माँगने की राजनीति पर काम करने को कहा . देश का राजनीतिक माहौल इतना गर्म हो गया कि १९३१ में नयी दिल्ली के उदघाटन के बाद ही अंग्रेजों की समझ में आ गया था कि उनके चैन से बैठने के दिन लद चुके हैं .
लेकिन अँगरेज़ हार मानने  वाले नहीं थे . उन्होंने जिस डामिनियन स्टेटस की बात को अब तक लगातार नकारा था , उसको लागू करने की बात करने लगे .१९३५ का गवर्नमेंट आफ इण्डिया एक्ट इसी दिशा में एक कदम था लेकिन कांग्रेस ने  लाहौर में १९३० में ही तय कर लिया था कि अब पूर्ण स्वराज चाहिए ,उस से कम कुछ नहीं . १९३५ के बाद यह तय हो गया था कि अँगरेज़ को जाना ही पड़ेगा . लेकिन वह तरह तरह के तरीकों से उसे टालने की कोशिश कर रहा था . अपने सबसे बड़े खैरख्वाह जिन्ना को भी नई दिल्ली के क्वीन्स्वे ( अब जनपथ ) पर  अंग्रेजों ने एक घर  दिलवा दिया था . जिन्ना उनके मित्र थे इसलिए उन्हें एडवांस में मालूम पड़ गया था कि बंटवारा होगा और फाइनल होगा . शायद इसीलिये जिन्ना की हर चाल में चालाकी नजर आती थी . बंटवारे के लिए अंग्रेजों ने अपने वफादार मुहम्मद अली जिन्ना से द्विराष्ट्र सिद्धांत का प्रतिपादन करवा दिया. वी डी सावरकार ने भी इस  सिद्धांत को हिन्दू महासभा के अध्यक्ष के रूप में १९३७ में अहमदाबाद के  अधिवेशन में अपने भाषण में कहा लेकिन अँगरेज़ जानता था कि सावरकर के पास कोई राजनीतिक समर्थन नहीं है इसलिए  वे जिन्ना को उकसाकर महात्मा गांधी और कांग्रेस को हिन्दू पार्टी के रूप में ही पेश करने की कोशिश करते रहे.आज़ादी की लड़ाई सन बयालीस के बाद बहुत तेज़ हो गयी .  ब्रिटेन के युद्ध कालीन प्रधानमंत्री  विन्स्टन चर्चिल को साफ़ अंदाज़ लग गया कि अब भारत से ब्रिटिश  साम्राज्य का दाना पानी उठ चुका है . इसलिए उसने बंटवारे का नक्शा बनाना शुरू कर दिया था . चर्चिल को उम्मीद थी कि वह युद्ध के बाद होने वाले चुनाव में फिर चुने जायेगें और प्रधानमंत्री  वही  रहेंगे इसलिए उन्होंने भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड वाबेल को पंजाब और बंगाल के विभाजन का नक्शा भी दे दिया था. उनको शक था कि आज़ाद भारत सोवियत रूस  की तरफ  जा सकता है और उसको कराची का बेहतरीन बंदरगाह मिल सकता है . उसक एबाद पश्चिम एशिया के तेल पर उसका अधिकार ज्यादा हो जाएगा .शायद इसीलिये चर्चिल ने जिन्ना को इस्तेमाल करके कराची को भारत से अलग करने की साज़िश रची थी .वाबेल तो चले गए लेकिन वह नक्शा कहीं नहीं गया . जब लार्ड माउंटबेटन भारत के वायसराय तैनात हुए तो  लार्ड हैस्टिंग्ज  इसमे ने जुगाड़ करके अपने आपको वायसराय  की चीफ आफ स्टाफ नियुक्त करवा लिया . उन्होंने युद्ध काल में चर्चिल के साथ काम किया था  इसलिये लार्ड इसमे बहुत भरोसे के आदमी थे और  चर्चिल ने  अपनी योजना को लागू  करने के लिए इनको सही समझा . प्रधानमंत्री एटली को भरोसे में लेकर  लार्ड हैस्टिंगज लायनेल इसमे , नए वायसराय के साथ ही आ गए . चर्चिल की बंटवारे की योजना के वे ही भारत में सूत्रधार बने . वे युद्ध काल में चर्चिल के चीफ मिलिटरी असिस्टेंट रह चुके थे .बाद में वे ही नैटो के गठन के बाद उसके पहले सेक्रेटरी जनरल भी बने. जब लार्ड माउंटबेटन  मार्च १९४७ में भारत आये तो उनका काम भारत में एक नई सरकार को अंग्रेजों की सत्ता  को सौंप देने का एजेंडा था . उनको क्या पता था कि चर्चिल ने पहले से ही तय कर रखा था कि देश का बंटवारा करना है .इसी विषय पर ब्रितानी फ़िल्मकार गुरिंदर चड्ढा की नई फिल्म आई है .फिल्म मूल रूप से अंग्रेज़ी में बनी है लेकिन हिंदी वालों के लिए डब कर के पेश की गयी है . अंग्रेज़ी फिल्म का नाम‘वायसरायज हाउस’ है जबकि हिंदी में इसका नाम ‘पार्टीशन:१९४७’ दिया गया है . हालांकि माउंटबेटन १९४७ में भारत आए  थे लेकिन उनको क्या करना है यह पहले से ही तय हो चुका था . यह अलग बात है उनको पूरी जानकारी नहीं थी .वे अपने हिसाब से ट्रांसफर आफ पावर के कार्य में  लगे हुए थे . फिल्म में लार्ड माउंटबेटन की शख्सियत को शुरू में इरादे के एक पक्के इंसान  के रूप में पेश किया गया है लेकिन बाद में वे एक निहायत ही लाचार और बेचारे व्यक्ति के रूप में नज़र आते हैं . फिल्म की अंतिम रीलों में उनको पता लगता है कि  उनको चर्चिल ने इस्तेमाल कर लिया है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी  . गुरिंदर चड्ढा ने भारत के अंतिम वायसराय की  दुविधा को बहुत ही सलीके से फिल्माया है . दावा किया गया है कि यह फिल्म लैरी कालिंस और डामिनिक लैपियर की किताब ‘फ्रीडम ईट मिडनाईट ‘ और  नरेंद्र सिंह सरीला की किताब ‘ शैडो आफ द ग्रेट गेम : द अनटोल्ड स्टोरी आफ इंडियाज़ पार्टीशन ‘ से प्रेरणा ले कर बनाई गयी है .भारत के बंटवारे में अंग्रेजों की साज़िश की जानकारी तो शुरू से थी लेकिन नरेंद्र सिंह सरीला की किताब के हवाले से पता चला है कि उनको ब्रिटिश लायब्रेरी में एक ऐसा दस्तावेज़ मिला है जो यह बताता है कि चर्चिल ने १९४५ में ही पंजाब और बंगाल को बांटकर नक़्शे की शक्ल दे दी थी .  सरीला ने दावा किया है कि जब माउंटबेटन को पता चला कि वे  इस्तेमाल हो गए हैं तो उन्होंने बहुत गुस्सा किया और  अपने चीफ आफ स्टाफ हैस्टिंग्ज इसमे से कहा  कि आप लोगों के हाथ खून से  रंगे हैं तो जवाब मिला कि लेकिन तलवार तो आपके हाथ में थी.  उनको याद  दिलाया  गया कि  भारत के बंटवारे की योजना का नाम ‘ माउंटबेटन प्लान ‘ भी उनके ही नाम पर है . फिल्म में इस दृश्य को  बहुत ही अच्छी तरह से फिल्माया गया   है . एक दृश्य और भी यादगार है . जब पाकिस्तान के उद्घाटन के अवसर पर माउंटबेटन कराची गए तो जिन्नाह ने उनको  धन्यवाद किया . वायसराय ने जवाब दिया कि आप धन्यवाद तो चर्चिल को दीजिये क्योंकि आप के साथ मिलकर उन्होंने ही यह साज़िश रची थी . मैं तो इस्तेमाल हो गया . जिन्नाह ने जवाब दिया कि हम दोनों ही इस्तेमाल हुए हैं, हम दोनों ही  शतरंज की चाल में मोहरे बने हैं . नरेंद्र सिंह सरीला कुछ समय ताज लार्ड माउंटबेटन के ए डी सी रहे थे इसलिए उनकी बात पर विश्वास करने के अवसर उपलब्ध हैं . जानकार बताते हैं कि चर्चिल ने जिन्नाह को ऐसा पाकिस्तान देने का सब्ज़बाग़ दिखाया था  जिसमें बंगाल और पंजाब तो होगा ही , बीच का पूरा इलाका होगा जहां से होकर जी टी रोड गुजरती है ,वहा भी पाकिस्तान में ही रहेगा . शायद इसीलिये जब दो दूर  दराज़ के दो हिस्सों में फैला पाकिस्तान बना तो जिनाह  की पहली प्रतिक्रिया थी कि उनको ‘ माथ ईटेन पाकिस्तान ‘ मिला  है.बंटवारे के विषय पर एक और अच्छी फिल्म आई है और इतिहास के उस दौर में जाने का एक और मौक़ा मिलता है जिसके बारे में जानकारी अभी पता नहीं कब तक ताज़ा होती रहेगी 

मेरी बेटी का जन्मदिन यादों सिलसिला लेकर आता है

जंतर-मंतर - Mon, 21/08/2017 - 10:43


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शेष नारायण सिंह
आज से चालीस साल पहले इक्कीस अगस्त के दिन मेरी गुड्डी पैदा हुयी थी , इमरजेंसी हट चुकी थी, जनता पार्टी  की सरकार बन  चुकी थी. मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनाकर यथास्थितिवादियों ने यह सुनिश्चित कर लिया था कि इमरजेंसी  जैसे राजनीतिक काले अध्याय के बाद भी केवल इंदिरा गांधी की सरकार बदले ,बाकी कुछ न बदले . जो लोग इमरजेंसी के खिलाफ हुए जन आन्दोलन को राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत मान रहे थे , उनका मोहभंग हो चुका था . मैं दिल्ली में रहता था. आया तो  रोज़गार की तलाश में था लेकिन इमरजेंसी में कहीं कोई नौकरी नहीं मिल रही थी. मजबूरी में कुछ पढाई लिखाई भी कर रहा था , इसी दौर में कोई मामूली नौकरी मिली थी . जिन दिन नौकरी की खबर  मिली उसी दिन गाँव से कोई आया था ,उसने बताया कि घर पर बेटी का जन्म हुआ है. मैं दो साल से ठोकर खा रहा था , नौकरी की खबर के साथ ही बेटी के जन्म की खबर भी आई तो लगा कि बिटिया भाग्यशाली है, बाप को कहीं पाँव जमाने की जगह लेकर आयी है .  उससे  दो साल बड़ा उनक एक भाई है और उनसे छः साल छोटी एक बहन भी है . गुड्डी मंझली औलाद हैं.इमरजेंसी के दौरान  इंदिरा-संजय की टोली ने देश में तरह तरह के अत्याचार किये थे .इमरजेंसी लगने के पहले मैं अच्छा भला लेक्चरर था, मान्यताप्राप्त ,सहायता प्राप्त डिग्री कालेज का लेकिन अगस्त १९७५ में नौकरी छोड़नी पड़ी थी. उत्तर प्रदेश में कालेजों के प्रबंधन अब तो माफियातंत्र में बदल चुके हैं लेकिन उन  दिनों भी किसी से कम नहीं होते थे . बहरहाल इमरजेंसी लगने के बाद मेरी जो नौकरी छूटी तो उसके हटने के बाद ही लगी.  इमरजेंसी के दौर में मैंने बहुत सी बुरी ख़बरें सुनीं और देखीं लेकिन गुड्डी के जन्म के बाद लगता   था कि शायद चीज़े बदल रही थीं. लेकिन ऐसा नहीं था. मेरे जिले का ग्रामीण समाज अभी पुरानी सोच के दायरे में ही था . दहेज़ अपने विकराल रूप में नज़र आना शुरू हो गया था. हमारे इलाके के बिकुल अनपढ़ या दसवीं फेल लड़कों की शादियाँ ऐसी लड़कियों से हो रही थीं जो बी ए  या एम ए तक पढ़ कर आती थीं . ज़ाहिर है मेरी बेटी के जन्म के बाद भी इसी तरह की सोच  समाज में थी . लेकिन मैंने ठान लिया था कि अपनी बेटी को बदलते समाज के आईने के रूप में ही देखूँगा.  गुड्डी सांवली थी, बेटी थी, और एक गोरे रंग के अपने दो साल बड़े भाई की छोटी बहन थी. मेरे परिवार के शुभचिंतक अक्सर चिंता जताया करते थे . लेकिन गुड्डी की मां और दादी का फैसला था कि बच्ची को दिल्ली में उच्च शिक्षा दी जायेगी और समाज की रूढ़ियों को चुनौती दी जायेगी . गुड्डी दिल्ली आयीं , यहाँ के बहुत अच्छे स्कूल से दसवीं पास किया लेकिन इतने नम्बर नहीं आये कि उस स्कूल में उनको अगली क्लास में साइंस मिल सके .  आर्ट्स मिला और गुड्डी की समझ में आ  गया कि मेहनत से पढ़ाई किए बिना बात बनेगी नहीं.  बस फिर क्या था .गुड्डी ने कठिन परिश्रम किया और  दिल्ली विश्वविद्यालय के बहुत अच्छे कालेज, वेंकटेश्वर कालेज में दाखिला पहली लिस्ट में ही ले लिया .
गुड्डी जो भी तय कर लेती हैं उसको हासिल करती हैं . आज वे चालीस साल की हो गयी हैं , जीवन में अच्छी तरह से व्यवस्थित हैं, खुद भी बहुत अच्छे स्कूल में टीचर हैं और उनका बेटा दिल्ली के सबसे अच्छे स्कूल में छात्र है .अपनी पसंद के लड़के से अन्तर्जातीय शादी की और सामंती शादी ब्याह के बंधन को तोड़कर मुझे गौरवान्वित किया .  दिल्ली के एक पुराने परिवार में ब्याही गयी हैं . परिवार के सबसे आदरणीय व्यक्ति उनके अजिया ससुर समाज और क्षेत्र के बहुत ही मानिंद व्यक्ति हैं , रेलवे से अवकाश प्राप्त अधिकारी हैं , गुड्डी को बहुत स्नेह  करते हैं . नई दिल्ली स्टेशन के पास घर है , व्यापारिक परिवार है.दिल्ली में गुड्डी हमारी गार्जियन भी हैं .अपनी अम्मा की हर ज़रूरत का ख्याल रखती  हैं . थोड़ी जिद्दी हैं. उसी जिद को अन्य माँ बाप अपने बच्चों की दृढ़ निश्चय की प्रवृत्ति बताते हैं .अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जीने वाली मेरी बेटी को आज उसका जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक होगा , ऐसा मेरा विश्वास है. 

प्रीतीश नंदी

रविवार - Sun, 20/08/2017 - 21:30
सरकार के हाथ में आपकी प्राइवेसी

राम पुनियनी

रविवार - Sun, 20/08/2017 - 21:30
गांधी की जाति और कांग्रेसी विचारधारा

संदीप पांडे

रविवार - Sun, 20/08/2017 - 21:30
भारत में महिलाओं की स्थिति

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

रविवार - Sun, 20/08/2017 - 21:30
यह नागार्जुन का अपमान
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)