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संजीव ठाकुर की बाल कवि‍ताएं

लेखक मंच - Sun, 26/03/2017 - 02:21

संजीव ठाकुर

ताल

पंखा चलता हन-हन–हन
हवा निकलती सन-सन–सन।

टिक-टिक–टिक–टिक चले घड़ी
ठक-ठक–ठक–ठक करे छड़ी।

बूंदें गिरतीं टिप–टिप–टिप
आँधी आती हिप–हिप –हिप।

फू–फू–फू फुफकारे नाग
धू–धू–धू जल जाए आग।

कोयल बोले कुहू-कुहू
पपीहा बोले पिऊ-पिऊ।

धिनक-धिनक–धिन बाजे ताल
लहर–लहर लहराए बाल ।san

मुश्किल हो गई

पापा जी की टांग टूट गई
अब तो भाई मुश्किल हो गई!
कौन मुझे नहलाएगा ?
विद्यालय पहुंचाएगा ?
सुबह की सैर कराएगा ?
रातों को टहलाएगा ?
चिप्स –कुरकुरे लाएगा ?
कोल्ड –ड्रिंक पिलवाएगा ?
आइसक्रीम खिलाएगा ?
मार्केट ले जाएगा ?

सुबू ने खाई ढेर पकौड़ी

सुबू ने खाई ढेर पकौड़ी
एक छीन ली पापा से
एक झटक ली मामा से
मम्मी ने अपने हिस्से की
दे दी उसको एक पकौड़ी !

फिर आई उसकी थाली
जिसमें थी दस–बीस पकौड़ी
प्याज और आलू वाली
उसने न दी एक किसी को
खुद ही खा ली बीस पकौड़ी !

कौआ काका

कौआ काका क्या कहते हो
आएँगी मेरी नानी ?
सोच मिठाई की बातें
मुँह में भर आया पानी ।

न जाने क्या–क्या लेकर
आएँगी मेरी नानी
मैं तो तुमको एक न दूँगा
मुझे नहीं बनना दानी !

लेकिन काले कौए काका
अगर नहीं आईं नानी
कौन मुझे दिलवाएगा
प्यारी सी गुड़िया रानी

इस जाड़े को …

इस जाड़े को दूर भगाओ
सूरज भैया जल्दी आओ !

जाड़े में देखो तो कोयल
भूल गई गाना
चिड़ियों के बच्चों ने मुँह में
न डाला दाना !सूरज भैया आओ
थोड़ी गर्मी ले आओ
और हमारे साथ बैठकर
पिज्जा–बर्गर खाओ !साथ रहोगे तो जाड़े की
दाल रहेगी कच्ची
दादी का तो हाल बुरा है
हो जाएगी अच्छी !

गर्मी आ जाए तो चाहे
आसमान में जाना
जाड़े के मौसम में लेकिन
वापस आ जाना

आज के लिए नहीं, कल के क्लासिक के लिए बनी आज की फिल्म है-“अनारकली ऑफ आरा”।

       मैं यहाँ अविनाश दास निर्देशित और स्वरा भास्कर सहित सभी नए-पुराने कलाकारों द्वारा पर्दे पर अभिनीत और पर्दे के पीछे से अभिनीत फिल्म “अनारकली ऑफ आरा” पर अपनी बात रखने जा रही हूँ। इसे फिल्म की समीक्षा के रूप में न लिया जाए, क्योंकि मैं फिल्म समीक्षक नहीं हूँ। लेकिन, फिल्म हमारे जीवन में नस की तरह काम करती है। फिल्में हमें जीवन का नया राग, रंग और संचेतना देती है। मैं फिल्मों की इसतरह मुरीद हूँ कि हर फिल्म में अपने लायक के कलाकार को अपने में गढ़ लेती हूँ और उसकी कहानी के साथ अपने आपको देखने-खोजने और बुनने लगती हूँ।       बचपन में दुर्गा पूजा के अवसर पर हमारे शहर में रात भर खेले जानेवाले नाटकों में मुजफ्फरपुर, बनारस और कभी-कभी कोलकाता से बाई जी मंगाई जाती थीं- नाटक के दृश्यों के बीच में नाचने के लिए। यह दृश्यों के लिए आवश्यक नहीं होता था, दर्शकों को नाच के लोभ की शहद में लपेटे रखने के उद्देश्य से इसे रखा जाता था। पूरे समय यह चर्चा का विषय रहता था कि इस साल कहाँ से बाई आनेवाली हैं? कौन उनसे साटे का लेनदेन करता था, कौन उन्हें लेने जाता था, कौन उनकी इन तीनों दिन देखरेख करता था, हमें नहीं पता। लड़कियों को यह सब जानने-समझने का अधिकार कहाँ? हमें तो सातवीं-आठवीं कक्षा के बाद दर्शक दीर्घा में बैठने का भी मौका नहीं मिला। दरअसल, दर्शक दीर्घा में महिलाओं के बैठने के लिए जगह बनाई तो जाती थी, मगर उसमें केवल दूर-दराज से आई गाँव की बूढ़ी महिलाएं ही बैठती थीं। बुड्ढों से हम सुरक्षित रहें या नहीं, लेकिन ये बूढ़ियाँ तब सुरक्षित मानी जाती थीं। उनके साथ की आई बहू-बेटियाँ हमारे साथ नाटक देखती थीं- घरों की छटों से। शहरी बहुएँ और बेटियाँ तो उधर पाँव रखने की सोच भी नहीं सकती थीं। और अपने घर की बेटियाँ हमेशा रक्षणीया होती हैं। सो, हम सबके लिए, पंडाल के आसपास बने घरों की छतें ही नसीब थीं, जिसपर खड़े होकर रात भर या अपनी खड़े होने की शक्ति के मुताबिक नाटक देखा जाता था। शायद ही कोई स्त्री रात भर नाटक देख पाती थीं। भोर होते ही नाटक देखकर लौटे थके-मांदे घर के महान पुरुषों के लिए उन्हें चाय-नाश्ता बनाना होता था, अष्टमी, नवमी की पूजा की तैयारी करनी होती थी और घर-द्वार,बाल-बच्चों की सँभाल तो रूटीन के मुताबिक करनी ही करनी होती थी।       मैंने देखा था, वे बाइयाँ नाचते हुए अश्लील इशारे भी करती थीं। जो जितने ज्यादा इशारे करतीं, वे उतनी ही पोपुलर होतीं। सभी उन्हें देखने के लिए बेताब रहते। मुझे याद है, एक बाई जी ने नाचने से पहले सबको प्रणाम किया और तनिक शास्त्रीय पद्धति से नाचना चाहा कि लोगों की फब्तियाँ शुरू हो गईं- “आप यहाँ से चली जाइए, हाथ जोड़ते हैं।“       “अनारकली ऑफ आरा” फिल्म देखने से पहले मैं इन यादों को ताज़ा करती रही। जाने कितने यूट्यूब वीडियो देखे। पॉर्न भी। और मैं हैरान कि इनकी दर्शक संख्या लाखों में है। कमबख्त हम अपने वीडियोज़ डालते हैं तो हजार पर भी संख्या नहीं पहुँचती। महेश भट्ट ने सही कहा था, “जबतक आप जख्म नहीं देखेंगे, हमें मर्डर बनाने पर मजबूर होते रहना पड़ेगा।“ ऐसा भी नहीं है कि इन वीडियोज़ की क्वालिटी बहुत अच्छी हो। लेकिन, इन लड़कियों को देखने और छूने की लालसा इतनी बलवती है कि सभी अपना मान-सम्मान भी भूल जाते हैं।       सवाल यह है कि आप अपना मान-सम्मान भूल जाएँ तो क्या ये लड़कियां भी भूल जाएँ? मान लिया जाए कि इन लड़कियों की कोई इज्ज़त नहीं? वे चूंकि सभी के सामने उत्तेजक नाच नाचती हैं तो वे सभी के लिए सहज उपलब्ध हैं? जिस देह और देह की आजादी का प्रेत हमारे तथाकथित सभ्य समाज की स्त्रियॉं को सताता रहता है, उसकी दीवार इन लड़कियों के सामने ढही होने के बाद भी ऐसा क्या है जो उन्हें उद्वेलित करता है? ....वह है,उनका अपना मान-सम्मान, जिसके लिए मैं अक्सर कहा करती हूँ कि इज्ज़त तो एक भिखारी और वेश्या की भी होती है।       आप मानें या न मानें, लेकिन यह सच है कि स्त्रियाँ कभी भी केवल देह के वशीभूत होकर कहीं नहीं जाती। अनारकली भी रंगीला से एक भाव के साथ ही बंधी है। स्त्री अपनी देह का सौदा करते हुए भी उसमें भाव खोजती रहती है और लोलुप आँखों और लार छुलाती देह हर तबके और वर्ग की स्त्री के मन में लिजलिजापन भरता रहा है। ऐसे में अनारकली क्या सिर्फ इस बिना पर समझौता कर ले कि वह रसीले, रँगीले गाने गाती और उनपर कामुक नृत्य करती है?       यहाँ सही कहा जा सकता है कि स्त्री मन को कोई नहीं समझ पाता। उसके लिए स्त्री का मन बनकर उसमें घुसना पड़ता है, प्याज के छिलके की तरह उसे परत दर परत खोलना पड़ता है, तब शायद एकाध प्याजी ललछौंह आपको मिले।       बाकी इस फिल्म को आप ठेठ बिहारी माहौल, गंध, गीत, रस, रास, साज, आवाज के लिए भी पसंद करेंगे। बिहारी बोल और तों, बिहारी मुहावरे और संदर्भ आपको गुदगुदाएंगे और आपको बिहार को समझने का मौका देंगे। आरा के लिए मशहूर उक्ति है, जो इस फिल्म में भी है कि- “आरा जिला घर बा, त’ कौना बात के डर बा?” और उसी तरह यह उक्ति भी बिहार के लिए बड़ी जबर्दस्त है-“एक बिहारी, सब पर भारी।“ और यह फिल्म तो बिहारियों का गढ़ है। यहाँ तक कि ठेठ राजस्थानी लेखक और कलाकार रामकुमार सिंह को भी इसने बिहारी बना दिया, इसके गीत लिखवाकर और इसमें अभिनय करवाकर।       रूपा चौरसिया का कॉस्ट्यूम कौतुक भरता है और पूरी फिल्म को सम्मोहन की गिरफ्त में ले लेता है। कास्टिंग कमाल की है, यहाँ तक कि घर की मालकिन और अनवर का बाप भी ऐसे मुफीद हैं कि आप उसमें बंधे रह जाते हैं। अलबता मकान-मालकिन की भूमिका में मैं खुद को खोजती और देखती रही एक कलाकार होने के नाते और अंतिम अभियान गीत की गायिका के रूप में भी- एक लोक प्रस्तोता होने के नाते।        यहाँ मैं फिल्म की नायिका स्वरा भास्कर के लिए कुछ नहीं लिखने जा रही, क्योंकि मुझे पता है, हर कोई उनके उम्दातं काम की तारीफ करेगा। मैं तो बस उन्हे इस साल के राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता के रूप में देख रही हूँ। मेरे यह कामना पूरी हो।       आइये, अन्य चरित्रों पर तनिक बात करें। हीरामन का चरित्र सही में तीसरी कसम के हीरामन की याद दिला देता है- भोला और अपनी अनारककली के प्रति आदर और श्रद्धा से भरा हुआ। उसका शुभचिंतक। रंगीला और अनारकली के रूप में पंकज त्रिपाठी और स्वरा भास्कर की केमिस्ट्री तो गज़ब ढा ही रही है, बुलबुल पांडे और वीसी साब के रूप में विजय कुमार और पंकज मिश्रा भी एक-दूसरे को कॉम्प्लिमेंट करते नजर आते हैं। फिल्म की सबसे अच्छी बात यह भी होती है कि वह अपने सभी कलाकारों को कितना स्पेस देती है और इस फिल्म ने सभी कलाकारों को अपने हिस्से का करने का पूरा स्पेस दिया है। सभी चरित्र अपना ध्यान खींचते हैं। वे आपके चेहरे पर मुस्कान भी लाते हैं, आपको रुलाते भी हैं और आपमें वह भाव भरते हैं कि बस, हो गई जुल्म की इंतहाँ कि “हर ज़ोर जुल्म के टक्कर में, संघर्ष हमारा नारा है!”       स्त्रियॉं का देह के प्रति का यह संघर्ष मिथकीय काल से चला आ रहा है और चलता रहेगा अनंत अनंत काल तक, क्योंकि जबतक स्त्रियॉं के प्रति हम अपना रवैया नहीं बदलेंगे, तबतक स्त्रियॉं की देह से परे जाकर कुछ भी सोचा नहीं जा सकता। घुटन के इसी गैस चेम्बर में से हर उस अनारकली की चीख एक ब्रह्म नाद की तरह निकलेगी, जो अपनी देह को भोग की वस्तु माने जाने से इंकार करती है और अपने अस्तित्व के लिए सचेत है।       यह फिल्म सभी को देखनी चाहिए। 18 की उम्र से लेकर हर आयु-वर्ग के लड़के- लड़कियों, स्त्री-पुरुषों को। केवल देखनी ही नहीं चाहिए, देखकर समझनी भी चाहिए और उसपर अमल भी करना चाहिए। “अनारकली ऑफ आरा” की पूरी टीम शत प्रतिशत बधाई की पात्र है। इस फिल्म के साथ तो ऐसा है कि अगर कोई मुझे दस बार भी कहे तो मैं देखने के लिए तैयार हूँ और यह भी आश्वस्त हूँ कि जितनी बार इसे देखूँगी, उतनी बार इसकी नई- नई परतें मुझे मिलेंगी। वैसे दो बार तो देख ही चुकी हूँ। आप सब भी देखकर आइये। और आगे जितनी बार भी मन करे, देखिये, कि कैसे एक फिल्म किसी मोनोटोनी को तोड़कर अपना एक नया इतिहास रचती है। “अनारकली ऑफ आरा” आज के लिए नहीं, कल के क्लासिक के लिए बनी आज की फिल्म है।  एक बात और, सफलता जब आती है तो सबसे पहले पर्दे के पीछे की औरत को ही बहाकर ले जाती है, जो जाने कितने कष्टों को सहकर सबका साथ देती रहती है। अविनाश की सफलता के पीछे खामोश भाव से लगी उनकी पत्नी स्वर्णकान्ता (मुक्ता) के योगदान को भी कतई नहीं भूला जाना चाहिए। #### 

मेरे प्रेम का पहला पाठ- राम और रोमियो !

 मुझे भारतीय संस्कृति से बड़ा गहरा प्रेम है। रामायण से तो और भी। आखिर को, सीता हमारे प्रदेश मिथिला से थीं। सीता हमारी बेटी थीं और बेटी हो या बेटा, समय के अनुसार सभी की उम्र बढ़ती ही है। उम्र हो जाती है तो ब्याह की चिंता भी हमारी भारतीय संस्कृति का अमिट हिस्सा है। लिहाजा, सीता की बढ़ती उम्र ने राजा जनक को भी चिंता से सराबोर कर दिया-            “जिनका घरे आहो रामा, बेटी होय कुमारी,             सेहो कैसे सुतले निचिंत!”
सो नींद राजा जनक की भी गुम हो गई। माता सुनयना की भी हुई ही होगी। स्त्रियॉं को तो ठोक-पीटकर उन सभी तरह की चिंताओं के लिए जिम्मेदार बना दिया जाता है, जिससे उनकी छवि प्रतिकूल हो तो हो, औरों की अनुकूल बनी रहे।
सीता ने न जाने कैसे धनुष उठा लिया और राजा जनक को एक बहाना मिल गया- सीता से बेहतर वर खोजने का। आखिर, वधू कैसे वर से श्रेष्ठ हो सकती है! हुई तो भी उसे अपनी श्रेष्ठता छुपानी या मारनी पड़ती है। राजा जनक से शस्त्र-शास्त्र की शिक्षा और माता सुनयना से घर-गृहस्थी की शिक्षा लेकर भी सीता राम से बड़ी नहीं हो सकती। इसलिए, अब तो वर वो हो, जो धनुष नहीं उठाए, बल्कि धनुष तोड़े।
विश्वामित्र जी भी राम को लेकर पहुँच गए। राम भाई के संग घूमते-घामते सीता वाटिका भी पहुँच गए। अब, ये न पूछिएगा कि लड़कियों के बाग में लड़कों का क्या काम! वे भगवान हैं। कोई रोमियो या मजनू या राँझा नहीं। वहाँ दोनों के नैन से नैन मिले, दिल धड़के, होठों पर मुस्कान आई, मन में कोमल भावना ने जन्म लिया और सलज्ज रेख दोनों के चेहरे पर खींच गई। यह तो बहुत ही स्वाभाविक है भाई। कुछ भी अच्छा लगने पर दिल में खुशी और चेहरे पर मुस्कान आती ही है।
मिथिला में राम –सीता के ब्याह से बढ़कर दूसरा ब्याह कोई नहीं। और सीता वाटिका में राम –सीता का मिलन प्रेम का पहला पुष्प तो नहीं था न-            “ये मेरे पहले प्यार की खुशबू....!”मन्नत मनाने की भी परंपरा हम यहीं से मान लें? गोसाई जी मानस में लिख भी गए हैं कि वाटिका में राम के दर्शन के बाद सीता जी गौरी पूजने जाती हैं। सीता जी मन्नत मानती हैं कि ये ही मुझे पति के रूप में मिलें और गौरी जी प्रकट होकर कहती हैं-             “सुनू सिय सत्य असीस हमारी, पूजही मन-कामना तुम्हारी!”
कामना फलीभूत हुई और यही कामना मय-सूद सोलह सोमवार के रूप में फलीभूत हुआ। हर सीता को राम जैसा पति चाहिए, इसलिए, सोलह सोमवार, सोलह शुक्रवार, महाशिवरात्रि आदि सब उसे ही करने चाहिए। मगर हर राम को? शायद कोई भी चलेगी? नहीं, नहीं! कोई भी नही चलेगी। जो चलेगी, वह उनकी पसंद की होनी चाहिए और उसके लिए उन्हें सोलह सोमवार, सोलह शुक्रवार, महाशिवरात्रि आदि करने की कोई ज़रूरत नहीं।
तो भैया! प्रेम की परिभाषा यहीं से गढ़ी गई। अब वाटिका में मिले राम को कोई लैला-मजनू, सीरी-फरहाद या रोमियो-जूलियट कहने लगे तो अपन को दोष मत दीजिएगा। वैसे भी राम और रोमियो नाम में उतना ही साम्य है, जितना लोग हनुमान और हैनिमन में मानते हैं। मुझे अपने मिथक और इतिहास का ज्ञान नहीं है- इसलिए कालीदास जैसे “शेक्सपियर ऑफ संस्कृत” कहलाते हैं, वैसे ही मेरे लिए ये दोनों लैला-मजनू, सीरी-फरहाद या रोमियो-जूलियट! अपने को तो प्रेम की दुनिया में फैलाव दिखाई दे रहा है। राम और सीता हमारे आदर्श हैं और हम उन्हीं के आदर्शों का पालन करेंगे। उन्होने प्रेम किया, हम भी करेंगे। शादी से पहले नजरें- दो-चार हुईं, हम भी करेंगे। शादी के लिए मन्नत मांगी, हम भी मांगेंगे। शादी के लिए स्वयंवर हुआ, हम भी स्वयंवर करेंगे। हम अपनी महान भारतीय संस्कृति की परंपरा के अनुसार ही कर रहे हैं। इसलिए, विश्व और देश के समस्त गुरु, योगी, भोगी! हमें आशीर्वाद दीजिये कि प्रेम के इस पाठ में हम भी सफल हों! बाद में भले राम को सीता का त्याग करना पड़े या सीता को धरती में समाना पड़े। लेकिन अभी तो हम प्रेम के सागर में गोता लगाने जा रहे हैं। गोता लगाने दीजिये-                   “मेरे पिय में साईं बसत हैं, हिय में बसत है सपना                  जाए छूट जो घर, मात-पितु, छूटे ना प्रेम का गहना!” 

आपकी आत्मा में किसी कला के लिए स्थान नहीं है, तो आप अपाहिज हैं : जीवन सिंह

लेखक मंच - Wed, 22/03/2017 - 00:04

डॉ. जीवन सिंह

डॉ. जीवन सिंह हिंदी के प्रतिष्ठित, प्रतिबद्ध और ईमानदार आलोचक हैं। अलवर राजस्थान में रहते हैं। अब तक आलोचना की तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। लोकधर्मी कविता के लिए जाने-जानी वाली पत्रिका ‘कृति ओर’ में वह निरंतर लिखते रहे। अलीबख्शी ख्याल और मेवाती लोक संस्कृति पर गहरी पैठ रखते हैं। अपने गांव जुरहरा (भरतपुर) की रामलीला में पिछले पैंतालीस वर्षों से जुड़ाव और रावण का अभिनय करते रहे हैं। 1968 से 2004 तक राजस्थान के विभिन्न राजकीय कॉलेजों में अध्यापन करते रहे। प्रस्तुत है उनसे फेसबुक के माध्यम से महेश चंद्र पुनेठा  की हुई लंबी बातचीत के कुछ अंश-

हमारे समाज में पढने की संस्कृति का जबरदस्त अभाव है। पढ़ना केवल परीक्षा पास करने के लिए जरूरी माना जाता है। पाठ्यपुस्तकों से इतर पढ़ना एक फालतू काम माना जाता है। इसके लिए बच्चों को हमेशा रोका जाता है। नयी पीढ़ी में पढ़ने की आदत विकसित करना किसी चुनौती से कम नहीं है। आपको पढ़ने की संस्कृति के अभाव के पीछे कौन से कारण नजर आते हैं? आप विदेशों में भी रहे हैं क्या वहां भी पढ़ने की संस्कृति की स्थिति भारतीय समाजों की तरह ही है?

मैंने न पढ़ने और अपने घरों में किताब न रखने की बात इसलिए कही है कि हम पहले उस समाज को जान सकें जिसमें हम छंद-रचित कविता के लोकप्रिय होने की बात अक्सर करते रहते हैं। जहां कविता को पढ़ाने वाले अध्यापक तक अपने घरों में पुस्तक रखने से परहेज करते हों, वहां कौन है जो कविताओं से प्रेम कर रहा है, कुछ पता तो चले। दरअसल, हम मिथकों में जीने के अभ्यासी हो चुके हैं, वास्तविकता में कम। जो वास्तविकता को कुछ बदले हुए रूप में लाने का प्रयास करता है, उस पर धावा बोल देते हैं। जब मिथक टूटता है तभी वास्तविकता प्रकट होती है।

हमारा हिन्दी समाज इकसार समाज नहीं है, दूसरे भी नहीं हैं। एक बहुत बड़ा निम्न मेहनतकश वर्ग तो रोजी-रोटी के संकट से ही मुक्त नहीं हो पाता। वह अपने जीवन के भावात्मक पहलुओं को अपने लोकसाहित्य (मौखिक साहित्य) में ही पाकर संतुष्ट हो लेता है। अब रहा मध्यवर्ग, इस वर्ग में ही पढ़ने-लिखने वाला वर्ग निकलता है, वह भी उंगलियों पर गिना जा सकता है। हमारे यहां एक कविता संग्रह की ज्यादा से ज्यादा पांच सौ प्रतियां रोते-धोते छपती हैं। इसी से पता चल जाता है कि हमारा समाज कितना साहित्य प्रेमी है?  लगभग पचास करोड़ हिन्दी भाषी होंगे, उसमें कितने लाख या करोड़ साहित्य प्रेमी हैं। जरा हिसाब लगाकर देखें तो सब कुछ पता चल जायगा। एक-दो लाख ज्यादा से ज्यादा होंगे। किताबों की खरीद से अन्दाज लगाएं तो यह संख्या हजारों में सिमट जाएगी। मध्यवर्ग में कोई आसपास आपको नजंर आता है, जो अपने बच्चों को इंजीनियर या डॉक्टर के अलावा कुछ बनाना चाहता है। कितने लोग हैं जो अपने बच्चों को मन से अध्यापक बनाना चाहते हैं और उसमें भी साहित्य का और वह भी हिन्दी का। हिन्दी आज कहीं प्राथमिकता में ही नहीं है। हमारा मन पूरी तरह से धन का गुलाम बन रहा है, जो साहित्य-संस्कृति सिर्फ धनार्जन को मानता है। सब कुछ को मैनेज करता है। तकनीक और प्रबंधन ने हमारे दिमागों को आक्रांत सा कर लिया है और यह पिछले पच्चीस वर्षों में बहुत तेजी से हुआ है। जब पूंजी ही जीवन का ध्येय बन जाती है तो अन्य सब कुछ उसके सामने गौण हो जाता है। पूंजी अपने लिए अलग एक नई सभ्यता और संस्कृति विकसित करती जाती है और अपने प्रभाव में दूसरे वर्गों को भी लेती जाती है।

जहां तक विदेशों की बात है, पढ़ने-लिखने की संस्कृति में वे पहले से हमसे आगे हैं। वहां उन्होंने अपने लिए सारे प्रबंध एक तार्किक प्रक्रिया के तहत लगातार किए हैं। वहां पढ़ना-लिखना न होता तो आज ज्ञान-विज्ञान और नई से नई तकनीक का विकास कैसे होता? विश्व संचार क्रांति कौन करता? उन्होंने अपने शिक्षा-प्रबंधन पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया है। हमारे यहां शिक्षा नहीं,  मानव-संसाधन का प्रबंधन चलता है। ऐसे में पढ़ने की सहज संस्कृति का विकास कैसे संभव है। हमारे राजनेता जो सारी बातों के नियंता हैं, वे क्या इन सवालों पर गंभीर हैं। जिन्दगी जीने का एक सामान्य नैतिक बोध और मानवीय आकांक्षाएं जब तक हमारी प्राथमिकताओं में नहीं आएंगी, तब तक जो चल रहा है वही चलता रहेगा। इसके लिए हर स्तर पर, खासकर प्राथमिक, माध्यमिक स्कूली स्तर पर बहुत बड़े अभियान और नवजागरण की आवश्यकता है, जो शिक्षा को पारम्परिक तौर पर नहीं वरन आधुनिक सेक्युलर पद्धति पर आगे ले जाए। हमको अपनी शिक्षा को महंगे तरीकों से नहीं, बहुत सस्ते और सादगी से पूर्ण तरीकों से आगे बढ़ाने की जरूरत है। हमारा गरीब समाज तभी शिक्षित हो सकेगा।

आप के पोते आस्ट्रेलिया में पढ़ते हैं। आपने उनके साथ समय भी व्यतीत किया है। क्या आप बता सकते हैं कि वहां पाठ्यपुस्तक के अलावा बच्चे अन्य पुस्तकें भी पढ़ते हैं? स्कूल या शिक्षक उन्हें इस बात के लिए कितना प्रोत्साहित करते हैं? वहां पर स्कूलों में पुस्तकालयों की स्थिति कैसी है?

पहली बात तो यह है कि वहां के बच्चों के मन पर शिक्षा का वैसा प्रतियोगी दबाव नहीं होता,  जैसा हमारे यहां बच्चों के दिमाग पर रहता है। वहां बच्चों के पढ़ना शुरू करने की आयु 6 साल है। इससे पहले खेलने के सिवाय और कुछ नहीं करता। हमारे यहां शिक्षा लेते हुए बच्चे शायद ही सहज रह पाते हों। दूसरी बात यह है कि स्कूल भी बच्चों के प्रति सहज सहानुभूति पूर्ण व्यवहार रखते हैं। मैं जब वहां था, तब अपने पौत्र को एक प्ले स्कूल में ले जाता था क्योंकि वह 6 साल का नहीं हुआ था। हम दोनों रेल से 15 किलोमीटर दूर एक प्ले स्कूल में जाते थे, जहां मैं चार घण्टे तक पास में स्थित एक पब्लिक लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ता था। उस लाइब्रेरी में सप्ताह में दो बार छोटे बच्चों को उनकी अध्यापिकाएं अपने साथ लेकर आती थीं। उनसे सामूहिक तौर पर छोटी-छोटी कविताएं भी बुलवाती रहती थीं। उनकी विशेषता इस बात में है कि वे.बच्चों को हमेशा हास्य-विनोद के वातावरण में रखते हैं। जगह-जगह बच्चों के खेलने-कूदने के पार्क हैं। उन पार्कों में पुस्तकालय भी हैं। स्कूल भी अपने बच्चों को उनमें सभी तरह के खेल खिलाने ले जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि शिक्षा मन के ऊपर न बोझ है न ही उसका प्रतियोगी आतंक है और न ही वहां डॉक्टर,  इंजीनियर बनाने की होड है। वहां सुनियोजित और बेहद तार्किक ढंग से सभी तरह के जरूरी प्रबंधन किए जाने की परम्परा है। बच्चे बड़ों से और अपने परिवार से भी बहुत कुछ सीखते हैं, इसलिए बूढ़े-बूढे़ लोग भी वहां पुस्तकालय में जाकर कुछ न कुछ पढ़ते रहते हैं। हमने पढ़ने की जगह केवल स्कूल को ही बना रखा है, जबकि बच्चे का पहला विद्यालय उसका अपना घर होता है। घर से ही वह पढ़ना सीखता है। मुक्तिबोध का एक निबंध है- मुझे मेरी मां ने प्रेमचंद का भक्त बनाया। हमारे यहां कुछ समय पहले तक स्त्री शिक्षा पर कितना बल था, हम अच्छी तरह से जानते हैं।

मैं फिर कहूंगा कि हमारे यहां कितने लोग अपने घरों में निजी पुस्तकालय बनाते हैं और किताबें खरीद कर पढ़ते हैं। घर में किताबें होंगी और मां-बाप भी कुछ न कुछ पढ़ते दिखेंगे तो बच्चा भी पढ़े बिना नहीं रह सकेगा। केवल स्कूल के भरोसे पुस्तकें पढ़ने का संस्कार डालना मुश्किल है। गनीमत है कि वहां पर वह अपना कोर्स ही पूरा और अच्छी तरह से पढ़ ले। स्कूलों में तो पुस्तकालय वहां हैं ही, खेलना भी है। इसके अलावा सार्वजनिक पुस्तकालय भी जरूरत के अनुसार खूब हैं।

वहां घरों में किताबों का क्या स्थान है? क्या वहां निजी पुस्तकालय दिखाई दिए? आप अमरीका भी कुछ समय रहे वहां पर क्या स्थिति है?

वहां के वासियों के घर देखने का कोई बड़ा अवसर तो मुझे नहीं मिला, किन्तु लाइब्रेरी से पुस्तकें इश्यू कराते और लौटाते देखा। जगह-जगह पुस्तकालय देखे, जिनका रखरखाव और अद्यतन सुविधाएं देखकर एक तरह की तसल्ली मिलती है और इच्छा भी होती है कि काश, हमारे यहाँ भी ऐसा हो। वैसे हमारे यहां ही अक्सर सुनने में आता है कि हमारी तुलना में बंगाली समाज अधिक पुस्तक प्रेमी व कला प्रेमी समाज है। अमरीका में पुस्तक स्टोर(माल) होते हैं जहां से यदि आपको पुस्तक पसंद न आए तो उसे पढ़कर निर्धारित अवधि में लौटा सकते हैं। मैं यहां सोवियत संघ का उदाहरण रखना चाहता हूं जिस व्यवस्था ने अपने देश में ही नहीं वरन हमारे जैसे देशों में भी एक पुस्तक प्रेमी समाज बना दिया था। सस्ती और सुन्दर पुस्तकों की एक नई संस्कृति विकसित करने की उन्होंने लगातार कोशिश की थी। इसलिए यह व्यवस्था का सवाल भी है कि आप कैसा समाज बनाना चाहते हैं। अभी तो हमारी व्यवस्था का लक्ष्य है कि एक बड़े पूंजी प्रेमी समाज का निर्माण करना, जो बहुत तेजी से किया जा रहा है। यह समाज की जिम्मेदारी भी है कि वह विभिन्न स्तरों पर स्वयं भी प्रयत्न करे कि उसे कैसा समाज बनना है और किस दिशा में जाना है। सब कुछ सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ देना चाहिए। सरकारें तो वही करेंगी, जो उनको करना है।

जिन देशों के आपने उदहारण दिए हैं, क्या वहां यह सरकारी प्रयासों से हुआ है या व्यक्तिगत प्रयासों से? आपने सस्ती और सुन्दर पुस्तकों की एक नई संस्कृति विकसित करने के सन्दर्भ में सोवियत संघ का उदाहरण दिया , इस बारे में कुछ और विस्तार से बताइए।

दरअसल, जितने भी सामाजिक कार्य हैं, उनको केवल सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता। समाज और सरकार दोनों की पारस्परिक सहयोग से ही इनमें सफलता हासिल की जा सकती है। यदि कोई पुस्तक पढ़ना चाहता है तो कौन सी ऐसी सरकार है, जो उसे पढ़ने से रोकने आती है। स्कूलों,  शिक्षकों को पुस्तक संस्कृति की शुरुआत करने में सबसे बड़ी और प्राथमिक भूमिका अदा करनी होगी,  क्योंकि सबसे ज्यादा पुस्तकों से वास्ता उन्हीं का पड़ता है। जिस समाज में शिक्षक स्वयं कोर्स के अलावा और कुछ पढ़ने और जानने की इच्छा शायद ही रखते हों, उस समाज में पुस्तक संस्कृति का विकास कर पाना बहुत मुश्किल है। एक ही तरह के प्रयास करने से सामाजिक और सामूहिक स्तर पर कुछ नहीं होता। व्यक्ति और समाज दोनों स्तरों पर काम करने से ही बदलाव आते हैं। इस मामले में विकसित देशों का वातावरण हमारे यहां के वातावरण से बहुत अलग है। ब्रिटेन के औपनिवेशिक शासन से मुक्ति पा लेने के बावजूद हमारे समाज की प्रकृति, परिस्थिति और जरूरतों के अनुसार बड़े और बुनियादी बदलाव करने के बजाय उन्हीं के द्वारा स्थापित व्यवस्था को अपना लिया। उसमें इतना सा बुनियादी बदलाव भी न कर पाए कि यहां पठन-पाठन की संस्कृति अपनी भाषाओं में विकसित हो। बच्चा भाषाओं को अपने परिवेश और वातावरण से सीखता है और उसी में बिना किसी दबाव के सहजता तथा आनंद भाव से अपनी विभिन्न प्रवृत्तियों का विकास करता है। अंग्रेजी दो सौ साल बाद भी हमारे अपने घर-परिवारों के वातावरण की भाषा कहां बन पाई है। उसे अर्जित करने के लिए अतिरिक्त अस्वाभाविक प्रयास करना पड़ता है। जबकि हम अपनी भाषाओं को मां के दूध के साथ सीख लेते हैं। इस वजह से भी बच्चे पढ़ने के प्रति अनमना और उदासीनता का भाव रखते हैं।

अपनी भाषा में लिखी किताब को पढ़ने की स्वप्रेरणा विकसित होने की संभावनाएं ज्यादा रहती हैं। सोवियत संघ का ध्येय था कि पूरी दुनिया में पूंजी बाजार की गलाकाटू प्रतिस्पर्धा खत्म हो और यह दुनिया सभी के रहने लायक एक सुखद शान्तिपूर्ण दुनिया हो। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शिक्षा से बेहतर कोई दूसरा माध्यम नहीं है। इसलिए अपने देश के अलावा मित्र देशों की भाषाओं में भी उन्होंने एक सस्ती, उन्नत और सुन्दर पुस्तक संस्कृति को सर्वत्र विकसित किया। उनके द्वारा मुद्रित पुस्तकें सस्ती ही नहीं,  दिखने में भी बहुत आकर्षक होती थीं। उनको देखते ही खरीदने का मन हो जाता था। बाल साहित्य भी बहुत सस्ता और आकर्षक होता था। वे जगह-जगह पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाते थे। इससे सामाजिक स्तर पर वातावरण बनता था। हर साल प्रदर्शनी का इंतजार रहता था। पूंजीवादी व्यवस्था में पढ़ना ही इतना मंहगा और प्रतियोगिता से बोझिल बना दिया जाता है कि इस वातावरण में सिर्फ धन कमाने वाली पढ़ाई करने के अलावा कोई कुछ सोच ही नहीं पाता।

सस्ता और अच्छा साहित्य पहुंचाने के लिए हमारे यहां सरकारी या व्यक्तिगत स्तर पर अब तक किस तरह के प्रयास आपको दिखाई दिए?

देश को आजादी मिलने के बाद पुस्तकें पढ़ने और जीवन को ज्ञान सम्पन्न करने का एक जज्बा लोगों में मौजूद रहा। मैं अपने एक छोटे से गांव का उदाहरण आपको बतलाता हूं। आजादी मिलने के दिनों में दो-तीन हजार की आबादी से ज्यादा गांव की आबादी नहीं होगी, लेकिन तब भी गांव का अपना एक पुस्तकालय और वाचनालय- सुधारिणी समिति के नाम से चलता था। इसमें हंस, माधुरी जैसी उस समय की पत्रिकाएं तक मंगाई जाती थीं। उस पुस्तकालय में अधिकांश किताबें स्वाधीनता के भाव को जगाने वाली थीं। हमारा गांव तत्कालीन भरतपुर रियासत का आखिरी गांव था, जो इस समय के हरियाणा और उस समय के पंजाब की सीमा से लगता था। उस समय की स्वाधीनता आंदोलन के सेनानी स्वाधीनता पाने के लिए पठन-पाठन को जरूरी मानते थे कि ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं है। इसी उद्देश्य से छोटे-छोटे गांवों में भी पुस्तकालय खोले गए थे। आजादी का भाव पैदा करने में इन पुस्तकालयों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। उस समय लालटेन की रोशनी में लोग इनमें रात्रि को भी पढ़ने जाते थे। तब यह सब एक बड़े आंदोलन के तहत हुआ है। ऐसे ही हमारे पास के कस्बों कामां, डीग, कुम्हेर आदि में पुस्तकालय और वाचनालय खुले हुए थे। डीग में हिंदी साहित्य समिति और उसका एक बड़ा पुस्तकालय था, जो आज भी मौजूद है किन्तु पहले जैसा जज्बा अब नहीं है। भरतपुर में एक जमाने में वहां की हिंदी साहित्य समिति एकमात्र ज्ञान चर्चा और पठन-पाठन का सबसे बड़ा केन्द्र थी। इसके एक सम्मेलन में शायद 1930 में रवींद्रनाथ टैगोर आए थे। वह वातावरण व माहौल ही अलग होता है, जो लोगों में बड़े स्तर पर ज्ञान की भूख जगाता है। आज का युवा पहले से कम पढा़कू नहीं है। वह खूब पढ़ता है। पढ़ने में रात-दिन एक कर अपनी जी-जान लगा रहा है, किन्तु अब उसके अध्ययन का उद्देश्य अच्छे से अच्छा व्यवसाय हासिल कर थोड़े समय में अधिकतम पूंजी हासिल करना हो गया है। अब वह समाज परिवर्तन की जगह बाजार में अपनी जगह बनाने के लिए खूब पढ़ता है। प्रयोजन बदल जाने से पुस्तकों की दिशा और उपयोगिता दोनों बदल जाती हैं।

यदि सर्वेक्षण किया जाए तो आज पहले से बहुत ज्यादा बड़ा पुस्तकों का बाजार है और शिक्षा पाने के प्रति भी लोगों में जागरूकता आई है। लोग अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए बहुत तेजी से गांवों को छोडकर शहरों में आकर बस रहे हैं। गांव बहुत तेजी से वीरान जैसे हो रहे हैं। जो किसी वजह से गांव में ही रहने को मजबूर हैं, वे ही अब गांवों में रह रहे हैं। गांव छोड़ने के पीछे उनका उद्देश्य बच्चों को अच्छी और ऊंचे स्तर की शिक्षा, खासकर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में दिलवाने का है। यह अलग बात है कि उस शिक्षा का गहरा रिश्ता सिर्फ बाजार से है।

सस्ता और सुरुचिपूर्ण साहित्य आज के माहौल के अनुकूल ही नहीं है। हर कोई अपने बच्चों को डॉक्टर,  इंजीनियर बनाने की होड में लगा हुआ है। पुस्तकें खूब हैं और उनको पढ़ने वाले भी। प्राइवेट स्कूलों में बहुत ऊंची फीस होने पर भी उनमें जगह खाली नहीं हैं। सरकारी संस्थानों पर से विश्वास स्वयं सरकारों ने ही उठा दिया है। वे सब कुछ को प्राइवेट हाथों में सौंप देने के लिए व्यग्र हो उठी हैं। अब तो केवल निजी प्रयास ही रह गए हैं।

आजादी मिलने के शुरूआती दिनों में पुस्तकें पढ़ने और जीवन को ज्ञान सम्पन्न करने का जो जज्बा था, उसके कम होने के पीछे आप मुख्य रूप से क्या कारण देखते हैं? एन.बी.टी. जैसे सरकारी प्रकाशन आज भी चल रहे हैं जो सस्ता और सुरुचिपूर्ण साहित्य प्रकाशित करने, उसको लोगों तक पहुंचाने और पढ़ने के लिए कुछ-कुछ कार्यक्रम करते रहते है। इसको आप किस रूप में देखते हैं?

मुख्य कारण है आजादी के बाद बदला हुआ माहौल और स्वाधीनता मिल जाने के बाद यह मान लिया जाना कि स्वाधीनता मिल जाने से अब सब कुछ अपने आप हो जाएगा। जबकि स्वाधीनता कभी एक दिन में नहीं आती, यह एक सतत प्रक्रिया है। आज जब आजादी मिले सत्तर साल होने को जा रहे हैं, तब भी हमारा समाज कितने ही तरह के सामाजिक-आर्थिक बंधनों से मुक्त नहीं हुआ है। इसलिए जहां-जहां भी दलित, स्त्री, आदिवासी और गरीबी,  गैरबराबरी जैसे अनेक मुद्दे हैं, उनका समाधान लगातार आंदोलन से ही संभव हो सकता है। जिस समाज में अनेक तरह के वर्ग होते हैं, उसमें आजादी का उपभोग व्यावहारिक तौर पर केवल उच्च वर्ग ही करता है। आजादी मिल जाने के बाद इन मुद्दों को लेकर संघर्ष तो अवश्य हुए, किंतु आजादी के समय का आन्दोलन जैसा जज्बा खत्म होता चला गया। इससे यहां के लोग सत्ता की हिस्सेदारी करने जैसी नयी प्रवृत्तियों में ज्यादा उलझ गये। मध्य वर्ग ऊंची नौकरी पाने, नए नौकरशाह आदि बनने की हिस्सेदारी करने में लग गया। यही वजह रही कि पुराने पुस्तकालयों की आवश्यकता की बात पुरानी पड़ने लगी। एनबीटी जैसा संस्थान इतने बड़े देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। दूसरे आम जन में रोजगारी साहित्य पढ़ने-पढ़ाने का भाव पहले से काफी बढ़ा है। पढ़ना-लिखना पहले से बढ़ा है, लेकिन नीचे का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी अपनी रोजी-रोटी के मसले से उबर नहीं पाया है। मध्यवर्ग व्यावसायिकता और सिर्फ बाजार की शिक्षा लेने तक सीमित होकर रहने की स्थिति में सिमट गया है। पुस्तक छापने और बेचने के कुछ-कुछ कार्यक्रम केवल नौकरी पूरी करना और एक तरह की रस्म अदायगी जैसे बनकर रह गए हैं। वे कुछ पढ़ने वाले लोगों की पूर्ति कर देते हैं। गीताप्रेस द्वारा जैसे धार्मिक साहित्य के बेहद सस्ते साहित्य प्रकाशन का अभियान चलाया गया। कुछ इसी तर्ज पर अन्य विषयों पर पुस्तक प्रकाशन के अभियान चलें और एक माहौल बने तो इन स्थितियों में बदलाव संभव है।

मध्यप्रदेश की शैक्षिक संस्था एकलव्य द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों को आप किस रूप में देखते हैं? क्या इस तरह के प्रयास राजस्थान में भी कोई संस्था कर रही है?

एकलव्य ने इस दिशा में बहुत बड़ा और प्रशंसनीय काम किया है जिसका सर्वत्र स्वागत हुआ है, किन्तु लगभग पचास करोड़ हिन्दी आबादी के लिए इस तरह के सौ कार्य भी पर्याप्त नहीं हैं। वास्तविकता यह है कि आज भी बहुत बड़ी आबादी शिक्षा से महरूम है। सच तो यह है कि समाज को बदलना है तो शिक्षा के सम्पूर्ण ढांचे में बुनियादी बदलाव जरूरी है जिससे वह अभावग्रस्त वर्ग के अनुकूल बन सके। कुल मिलाकर बात यह है कि हमारे यहां महौल अभी सच्ची शिक्षा के अनुकूल नहीं है। शिक्षा सरकार की प्राथमिकताओं में ही नहीं है। जबकि हिन्दुस्तान में हर बात सरकार के भरोसे छोड़ दिए जाने का रिवाज सा बन चुका है। सरकारें ऐसी शिक्षा क्यों देना चाहेंगी, जो समाज में उनका प्रतिरोध खड़ाकर एक और बड़ा एवं उदार जनतांत्रिक विकल्प खड़ा करने में मददगार हो। मुझे मालूम नहीं कि छुटपुट प्रयासों को छोड़कर राजस्थान में इस दिशा में कोई उल्लेखनीय कार्य हो रहा है। मेरी जानकारी में नहीं है। संभव है कोई गैर सरकारी संगठन इस क्षेत्र में काम कर रहा हो।

हमारे कवि मित्र राजेश उत्साही जो लम्बे समय तक बाल पत्रिका चकमकके संपादक और एकलव्य संस्था से जुड़े रहे, पिछले दिनों एक बातचीत में कहा कि बाजार ने एक भ्रम बनाया है कि हिंदी की किताबें बिकती नहीं हैं। जहां प्रयास हुए हैं, वहां यह भ्रम टूटा भी है। होशंगाबाद के एक मित्र हैं अशोक जमनानी। वे अब तक सात-आठ उपन्यास लिख चुके हैं। उन्होंने पहले किसी व्यावसायिक प्रकाशक को दिए थे। बाद में खुद जोखिम उठाकर छपवाए और खुद ही गांव-गांव जाकर बेचे। उनके उपन्यासों के छह से अधिक संस्करण निकल चुके हैं। यह एक उदाहरण भर है। एकलव्य द्वारा प्रकाशित किताबों में से कुछ की अब तक पचास हजार से ज्यादा प्रतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। हां, यह बात अलग है कि उनमें से अधिकांश सरकारी या थोक खरीद में जाती हैं। यह भी एक उदाहरण है। महाराष्ट्र  में बालसाहित्य में काम करने वाले लोग गांव-गांव जाकर अपनी किताबें बेचते रहे हैं। मुझे लगता है वर्तमान समय पढ़ने की आदत को टीवी जैसे माध्यम से बहुत कड़ी टक्कर मिल रही है। चाहे वह समाचार हो, या विचार। सब कुछ तो टीवी से आ रहा है। फिर भी यह कहना ठीक नहीं है कि पढ़ने की संस्कृति नहीं है। आप इस पर क्या टिप्पणी करेंगे? क्या बाजारू उपन्यासों या पत्रिकाओं का बड़ी संख्या में पढ़ा जाना इस बात का प्रमाण नहीं है कि अभाव पढ़ने की संस्कृति का नहीं, बल्कि किसी और बात का है?

जिस देश की आबादी एक अरब तीस करोड़ के आसपास हो उसमें इतना तो अवश्य होगा ही कि दो चार या दस पांच करोड़ लोग ठीक-ठाक ढंग से पढ़-लिख रहे हों। सवाल जब सौ-पचास करोड़ का आता है तो हिन्दी में आज किसी भी अच्छी किताब का एक-दो करोड़ का संस्करण होना चाहिए, लेकिन अभी तो यह लाखों तक भी नहीं पहुंची हैं। पढ़ना तो पहले से ज्यादा हुआ ही है। पुस्तकें भी पहले से ज्यादा प्रकाशित हो रही हैं और मुनाफा बटोरने वालों के पक्ष में जा रही हैं। पुस्तकों के व्यवसायी करोडों तभी कमा सकते हैं, जब पुस्तकें प्रकाशित करें इसलिए पुस्तकें तो छप रही हैं, किन्तु उनके अनुसार पाठक नहीं हैं। निसंदेह मुनाफाखोर प्रकाशक इस विभ्रम को फैलाता है किन्तु इसमें कुछ सचाई भी है। मैं तो इस धारणा की जांच अपने मोहल्ले के लोगों के बीच से करता हूं, जिसमें मेरे साथी पढ़े-लिखे समझे जाने वाले लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि आजकल आप क्या काम कर रहे हैं? मैं जब जवाब में कहता हूं कि मैं तो पढ़ता-लिखता हूं तो वे फिर पूछते हैं कि आप यह बतलाइए कि सेवानिवृत होने के बाद क्या काम करते हैं? पढ़ना-लिखना हमारे यहां काम करने की कोटि में नहीं आता। काम की परिभाषा में सिर्फ उसे ही काम कहा जाता है जिससे आपको धन की प्राप्ति होती है। यह है हमारे समाज का सामूहिक शैक्षिक मनोविज्ञान। हमारे आसपास अडोस-पडोस में रहने वाले सभी पढ़े-लिखे और खाते-पीते लोग हैं किन्तु लगभग सभी का दृष्टिकोण यही है कि सिर्फ और हमेशा धन कमाना ही काम करना होता है। वैसे तो आजादी मिलने के बाद से ही समाज का सामूहिक दृष्टिकोण कुछ इसी तरह का बना, किंतु जब से नवउदारवादी अर्थव्यवस्था का तेजी से प्रचलन हुआ है और एक नव धनाढ्य वर्ग पैदा हुआ है, तब से तो धन ही जीवन का एकमात्र प्रतिमान बना दिया गया है कि धन में ही विकास है और धन में ही गति है। अन्यत्र सभी जगह दुर्गति है। ऐसे माहौल में अपवाद स्वरूप ही एक समुदाय विशेष पुस्तक संस्कृति की लड़ाई लड़ता है। वह हमारे देश में भी चल रही है, उसको व्यापक जीवन स्तरों और जरूरत के अनुसार फैलाने की आवश्यकता है। हिन्दी जाति की तुलना में बंगाली और मराठी जातियां हमसे पहले से आगे रही हैं,  उनमें जातीय एकता का भाव सदा से ज्यादा रहा है। इस मामले में हिन्दी का कभी कोइ एक केन्द्र नहीं रहा। वह प्रशासनिक और राजनीतिक तौर पर बहुत बड़े और गहरे विभाजन का शिकार रही है। संस्कृति सभी तरह की होती है। पचास करोड़ आबादी में यदि पचास लाख लोग भी पढ़ने-दिखने लग जाएं तो यह संख्या बहुत बड़ी लगती है, किन्तु जब पचास करोड़ के सामने पचास लाख को रखते हैं, तब वास्तविकता मालूम पड़ती है।

बाजारू बातें हर युग में रही हैं। बाजारू साहित्य भी और उस सामान्य अभिरुचि का साहित्य और उसी तरह की पत्र-पत्रिकाएं भी। कई बार इसी में से रास्ता निकलता है। लेकिन इसके लिए समाज में लगाव की भावना होनी चाहिए, जबकि पूंजीवादी व्यवस्था का पहला ही पड़ाव होता है अलगाव और अजनबीपन। पूंजी जोड़ने के साथ-साथ तेजी से बांटने का काम भी करती है, जिससे सामूहिक भावना का क्षरण होता जाता है। जबकि कोई भी संस्कृति सामूहिकता के बिना संभव नहीं है।

बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने में परिवार की क्या भूमिका है? कैसे यह आदत विकसित की जा सकती है?

जीवन में किसी भी बेहतर प्रवृति के विकास के लिए एक सामाजिक-सांस्कृतिक और नैतिक वातावरण होता है,   कोई भी अच्छी प्रवृति तभी सामूहिक तौर पर विकसित हो पाती है। निजी और व्यक्तिगत तौर पर या छोटे-मोटे आंचलिक स्तरों पर भी अपवाद स्वरूप कुछ प्रवृत्तियां विकसित होने की संभावनाएं खूब रहती हैं और इस तरह के काम करने वाले भिन्न रुचियों वाले लोग सभी क्षेत्रों में होते हैं और अपना काम भी करते हैं । उन क्षेत्रों में वातावरण भी बनता है किन्तु वह बड़े समर्थन के अभाव में दीर्घजीवी नहीं हो पाता। बनता है और एक बिन्दु तक पँहुचकर खत्म हो जाता है। जैसे- निजी स्तर पर कुछ खिलाड़ी ओलम्पिक में पदक ले आते हैं । इसका मतलब यह नहीं कि हमारे देश में खेलों का कोई वातावरण बना हुआ है। यहाँ निजी स्तर पर तो बहुत कुछ है । प्रतिभाएं हैं, अपार धन दौलत है। आज के अखबार में ही आया है कि दौलत के मामले में हमारा देश दुनिया के सबसे अमीर देशों में सातवें पायदान पर है, लेकिन इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि हम गरीब देशों की श्रेणी में नहीं हैं। ऐसे ही अन्य बातों में भी हैं। पुस्तकें पढ़ने वाले खूब पढ़ रहे हैं किन्तु पढ़ने-लिखने का वातावरण नहीं है। इसकी प्रमुख वजह है कि गैरबराबरी से या अन्य किसी भी तरह की विषमता से मुक्ति पाने का कोई बड़ा आन्दोलन नहीं है। जितने बड़े आकार का आन्दोलन है, उतने ही आकार का पठन-पाठन भी है।  जब से देश में दलित आन्दोलन में तेजी आई, तब से उसका अलग साहित्य भी प्रकाशित हुआ और नए पाठक भी पैदा हुए। स्त्री साहित्य के बारे में भी यह बात कही जा सकती है। दरअसल, मुक्ति आन्दोलन के बिना व्यापक स्तर पर पुस्तक आन्दोलन भी नहीं चल सकता। मुक्ति आन्दोलन से एक स्पष्ट जीवनोद्देश्य सामने आ जाता है जिसकी पूर्ति के लिए लोगों में उससे सम्बंधित साहित्य, इतिहास आदि पढ़ने की जरूरत होती है। नई सोच विकसित होती है तो नई राष्ट्रीय चेतना का निर्माण करती है।

बच्चा हमेशा अनुकरण से सीखता है। वह वही भाषा बोलता है और वैसे ही सोचता और आचरण करता है जैसे उसके परिवार के दूसरे लोग करते हैं। बच्चे को कहाँ मालूम होता है कि वह किस जाति और धर्म का है । यह उसका वातावरण ही होता है जो उसे बड़ा होने पर जाति और धर्म दोनों सिखा देता है। फिर वह स्कूल जाता है तो वहाँ भी उसके ये परिवार से प्राप्त बंधन टूटने के बजाय और ज्यादा मजबूत होते हैं। यही बात पुस्तकों के बारे में भी है। सबसे पहले हमारे देश का सामान्य युवक बेरोजगारी से जूझता है और उसके लिए जी जान एक कर देता है। माता-पिता, अभिभावक आदि भी यही चाहते हैं कि वह सिर्फ वही पढ़े, जिससे रोजगार मिले।  रोजगार मिल जाने के बाद पढ़ने-लिखने का सारा काम खत्म हो जाता है। हमारे यहाँ रोजगार पा लेना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है, जो उसे अलौकिक स्तर की संतुष्टि से भर देती है। एक कहावत भी इस बारे में है- पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नबाव। जो समाज नबाव बनने के लिए पढे़गा, वह नबाव बन जाने के बाद किसलिए पढ़े। जहाँ तक इस आदत को विकसित करने का सवाल है कि यदि घर, परिवार से लेकर स्कूल स्तर तक यदि पढ़ने पढ़ाने का वातावरण मिले तो इसको विकसित किया जा सकता है। जब परिवार वाले और शिक्षक पढ़ते हुए दिखाई देंगे तो बच्चे पर इसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा।

इसके अलावा सार्वजनिक पुस्तकालय-वाचनालय श्रृंखला का विकास किया जाए और स्कूल स्तर पर पुस्तकें पढ़ने वालों के लिए हर साल ऐसे आयोजन हों जिनमें पाठ्येतर पुस्तकें पढ़ने वालों से उनके विचार व्यक्त कराये जाएं और उनको सार्वजनिक तौर पर सम्मानित किया जाए।

दीवार पत्रिकाओं में ऐसे पाठकों के लिए अलग से कालम हो कि वे आजकल क्या नया पढ़ रहे हैं। सुगम, सुबोध और रोचक साहित्य की आसान सुलभता निश्चित की जाए।

आपकी यह बात बिलकुल सही है कि हमारे परिवारों की भी यही धारणा बनी हुई है कि पढ़ना-लिखना सिर्फ रोजगार पाने के लिए होता है। इसके चलते केवल वही किताबें पढ़ी जाती हैं जो प्रतियोगिता परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी होती हैं। इसी तरह स्कूली शिक्षा के दौरान भी वही किताबें और पाठ पढ़े जाते हैं जो परीक्षा में अधिक अंक दिला सकें। सार रूप में कहा जाए तो हमारा पढ़ना परीक्षा केन्द्रित होता है। इस धारणा के चलते साहित्यिक किताबें बहुत कम पढ़ी जाती हैं। कहानी-कविता-उपन्यास तो मनोरंजन और समय व्यतीत करने के लिए ही पढ़े जाते हैं। स्कूली बच्चों के लिए तो ये समय बर्बाद करने वाली मानी जाती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं या अच्छे अंक प्राप्त करने की दृष्टि से क्या साहित्यिक किताबों की कोई उपयोगिता है? आखिर विज्ञान-गणित के विद्यार्थियों के लिए साहित्यिक पुस्तकों की क्या जरूरत है?

दरअसल, हमारी मौजूदा शिक्षा प्रणाली उन अंग्रेजी शासक वर्ग की बनाई हुई है, जो हमारे ऊपर लम्बे समय तक राज करते हुए यहाँ के मानवीय श्रम और प्राकृतिक सम्पदा का दोहन एवं शोषण करके अपने देश को सम्पन्न करने के उद्देश्य से यह सब कुछ करना चाहते थे। जो उन्होंने किया भी। उनके जमाने की शिक्षा पद्धति आज भी चली आ रही है, जो अंग्रेजी शासक वर्ग ने अपने लिए एक नौकरशाही निजाम तैयार करने के लिए बनाई थी, जिसके माध्यम से वे हिन्दुस्तान पर शासन कर सकें। उनका उद्देश्य यहाँ की जनता को ज्ञान-वि‍ज्ञान सम्पन्न और वास्तविक तौर पर शिक्षित करना था ही नहीं, कि यहाँ के निवासी अपनी रूढ़ियों से लड़ते हुए एक आधुनिक समाज का निर्माण कर सकें। अफसोस की बात यह है कि आजादी मिल जाने के बाद भी हमारी सरकारों का जितना ध्यान पूँजी के प्रभुत्व वाले विकास पर रहा, उतना श्रम शक्तियों की एकजुटता और जनजागरण पर नहीं। इस काम के लिए अँग्रेजी शिक्षा पद्धति को बुनियादी तौर पर बदलने की जरूरत लोकतांत्रिक शासक वर्ग ने समझी ही नहीं। इसी का परिणाम है कि आज का युवा वर्ग एक समग्र शिक्षा प्रणाली से महरूम है। वि‍ज्ञान पढ़ने वाले युवा को साहित्य, इतिहास, दर्शन का ज्ञान नहीं और साहित्य, इतिहास आदि पढ़ने वाले को विज्ञान से दूर रखा जाता है जबकि हमारा जीवन इस तरह से ज्ञान-वि‍ज्ञान के मामले में विभाजित नहीं होता। व्यक्ति का जीवन समग्र होता है। उसे सुविधा के लिए विभाजित जब से किया गया है, तब से वैसे ही चला आ रहा है। जबकि आज वि‍ज्ञान तकनीक को जाने बिना कोई एक कदम आगे नहीं बढ़ सकता। इसी तरह से हरेक व्यक्ति का काम मानवीय भावनाओं से पड़ता है। उस इतिहास,  दर्शन से पड़ता है, जिससे हर व्यक्ति अपनी जिन्दगी में गुजरता है। यह हमारे जीवन की समग्रता ही है कि व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र के ज्ञान की जरूरत है। ज्ञान का ऐसा संकायपरक विभाजन मनुष्य और उसकी मनुष्यता को विभाजित करने जैसा काम है। यह विभाजन किसी भी समय के शासक वर्ग के लिए फायदेमंद रहता है। वि‍ज्ञान वाला साहित्य से अलग और साहित्य वाला वि‍ज्ञान से कोसों दूर। यह बहुत कृत्रिम है।

जब इस पृथ्वी पर सोवियत संघ का अस्तित्व था, तब के शिक्षा के अनेक तरह के अनुभव निकल कर आए थे, जिनका ज्ञान और जागरण की दृष्टि से आज भी महत्व जरा सा भी कम नहीं हुआ है। उस समय शिक्षा के पहले जन-कमिसार लेनिन ने लुनाचार्स्की को बनाया था। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में विशेषज्ञता के साथ सामान्यता के रिश्तों पर विचार करते हुए बतलाया था कि शिक्षित आदमी वह है ,जिसे सबका सामान्य और संक्षिप्त ज्ञान होता है, लेकिन जिसके पास अपनी विशेषज्ञता भी होती है, जो अपने कार्य को भली भाँति जानता है और जो शेष चीजों के बारे में भी कह सकता है कि कोई भी मानवीय चीज मेरे लिए पराई नहीं है। वह आदमी, जिसे टेक्नोलॉजी, औषधि विज्ञान, कानून,  इतिहास के मूल तत्वों और निष्कर्षों का ज्ञान होता है, वास्तव में शिक्षित आदमी है। लुनाचार्स्की ने यह भी माना है कि किसी को भी अज्ञानी नहीं रहना चाहिए। सबको सभी विज्ञानों और कलाओं के मूल तत्वों का ज्ञान होना चाहिए। चाहे आप मोची हों या रसायन शास्त्र के प्रोफेसर। यदि आपकी आत्मा में किसी कला के लिए स्थान नहीं है, तो इसका मतलब है कि आप काने और बहरे की भाँति अपाहिज हैं। क्योंकि आदमी की शिक्षा वस्तुतः इसमें है कि वह सब कुछ, जिसमें मानव जाति अपने इतिहास और संस्कृति का निर्माण करती है, जो मनुष्य के लिए उपयोगी या सांत्वनाप्रद अथवा जीवन में आनंद प्रदान करने वाली कृतियों में प्रतिबिंबित होता है– यह सब कुछ प्रत्येक आदमी की पँहुच के भीतर हो, पर साथ ही उसके पास विशेषज्ञता भी हो। इस आधार पर कहा जा सकता है कि ज्ञान की दुनिया में सबको सबकी जरूरत होती है किसी एक विषय में विशेषज्ञता के साथ। ज्ञान और शिक्षा की दुनिया में कोई विभाजन नहीं होता।

प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से साहित्य किस तरह से मददगार है?

दुनिया में प्राप्त किसी भी क्षेत्र का ज्ञान सभी तरह की परीक्षाओं में कहीं न कहीं मददगार होता है। सामान्य ज्ञान के प्रश्न पत्र में भी साहित्य के बारे में कुछ न कुछ पूछा जाता है । इससे ज्यादा कुछ परीक्षाओं में यह विषय इन्टरव्यू में मदद करता है। दूसरे साहित्य पठन का असर भाषा के माध्यम से परीक्षार्थी के अभिव्यक्ति कौशल पर होता है। निबंध जैसे प्रश्न पत्र में निबंध लेखन की कला साहित्य के माध्यम से सीखी जा सकती है। साहित्य से जीवन के प्रति समग्र दृष्टिकोण का विकास होता है जो पाठक को इतिहास,  दर्शन, समाजशास्त्र आदि विषयों की जानकारी भी देता है। कुल मिलाकर बात यह है कि साहित्य पढ़ने वाला कभी नुकसान में नहीं रहता,  उसका जीवन के प्रति आत्मविश्वास बढ़ता है और वह विभिन्न चरित्रों के बीच स्वयं की स्थिति का आकलन आसानी से कर सकता है। लेकिन. आज ज्ञान क्षेत्रों में विशेषीकरण इस हद तक बढ़ गया है कि उसने व्यक्ति को समाज से अलग करके एकांगी और आत्मकेन्द्रित बना दिया है। ज्ञान के क्षेत्रों में बढ़ते विशेषीकरण ने मानव जीवन का रूप ही बिगाड़ दिया है। यह विशेषीकरण एक अच्छे भले इंसान को अपाहिज बना रहा है। इससे व्यक्ति की रचनात्मक भूमिका कमजोर होती जा रही है और वह ज्यादा से ज्यादा एय्याश तथा सामन्ती स्वभाव जैसा बनता जा रहा है। यही कारण है कि आज आसपास हमें सच्चे और सम्पूर्ण ढंग से शिक्षित लोग नहीं मिलते। शिक्षा के नाम पर आधे-अधूरे और अपाहिज लोग ज्यादा नजर आते हैं।

इसी वजह से हमारे यहाँ शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की सारी प्रणाली एकांगी एवं विशेषीकृत होने को अभिशप्त है।

प्रसिद्ध कथाकार मोपांसा ने अपने समय के अनुभव के आधार पर कभी कहा था कि आदमी हमेशा अकेला होता है और उसका सर्वोत्तम मित्र भी उसके लिए एक पहेली होता है। दरअसल, यह पहेली बनती है उस निजी पूँजी की व्यवस्था से, जो आदमी के ज्ञान को विशेषीकृत करते हुए उसे उसके सच्चे और वास्तविक जीवन से अलग करती जाती है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न भी आज विशेषीकृत ज्ञान से ज्यादा जोड़ दिए गये हैं। इससे समाज के भीतर ज्ञानात्मक विभाजन और विशेषीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है। इस वजह से भी आज के लोग अपने आज के साहित्य से दूर होते जा रहे हैं।

साहित्य की इस महत्वपूर्ण भूमिका को आज बिलकुल नजरंदाज किया जा रहा है। पब्लिक स्कूलों में तो हाईस्कूल के बाद साहित्य और मानविकी विषय पढा़ए ही नहीं जा रहे हैं। उच्च शिक्षा में भी केवल वही विद्यार्थी इन्हें पढ़ रहे हैं, जो विज्ञान और गणित जैसे विषयों को पढ़ने में अक्षम पाते हैं। मेरा तो मानना है कि विज्ञान वर्ग के हर विद्यार्थी के लिए साहित्य पढ़ना अनिवार्य होना चाहिए। आप क्या कहेंगे?

आपका मानना सही है। साथ ही साहित्य पढ़ने वालों को भी विज्ञान का सामान्य ज्ञान उतना ही आवश्यक है, जितना विज्ञान पढ़ने वालों को साहित्य का। ज्ञान की यात्रा कभी इकतरफा नहीं होती। सामान्य ज्ञान सभी को सबका और विशेष ज्ञान किसी एक क्षेत्र का। जीवन समग्र है और विशेष भी। मानव भावनाओं की जानकारी विज्ञान से नहीं हो पाती इसलिए साहित्य की जरूरत होती है। और दुनिया गतिशील कैसे रहती है, इसकी वस्तुस्थिति का पता विज्ञान से चलता है और ऐसी अनेक तरह का अदृश्य सचाइयों का भी, जो विज्ञान के बिना संभव ही नहीं थी। ज्ञान कभी इकहरा और सपाट नहीं होता। आदमी ने अपनी हजारों सालों की जीवन यात्रा में बहुत कुछ अपने अनुभवों से जाना है और उसे ही ज्ञान में परिवर्तित किया गया है। इसका उपयोग हर कोई अपने जीवन में करता है। पब्लिक स्कूल नामधारी प्राइवेट स्कूल अपना धंधा करने के लिए हैं, समाज को शिक्षित करने के लिए नहीं। उनके यहां वही माल तैयार किया जाता है, जो बाजार में बिकता है। साहित्य और मानविकी जिस रोज बाजार में बिकने लग जाएंगी, ये स्कूल उनको पढ़ाने लगेंगे। जनशिक्षा का असली काम कभी बाजार नहीं कर सकता। यह काम तो उन स्कूलों को करना होगा, जो जनशिक्षण की भूमिका में हैं। दरअसल, हमारे देश में युवकों और अभिभावकों पर एक ही दबाव है, रोजगार हासिल करने का। साहित्य और मानविकी बाजार और रोजगार के मामले में छोटी सी भूमिका में हैं। इस वजह से ऐसा हुआ है। दूसरी बात यह भी है कि पिछले बीस-पच्चीस सालों में विज्ञान और तकनीक की भूमिका बहुत अग्रणी और जरूरी हो गई है। हमारी सारी शिक्षा व्यवस्था सीधे रोजगार पाने का जरिया है इसलिए ऐसा हुआ है। सरकारें तो वही काम करने लगती हैं जो जनता की जरूरत बन जाता है। उनको वास्तविक जन-शिक्षण से ज्यादा लेना-देना नहीं होता। वास्तविक शिक्षा बहुत अलग बात है। वह पूँजी की शिक्षा से बहुत भिन्न होती है।

यह काम समाज के जागरूक और संवेदनशील लोगों को स्वयं आगे आकर और अपना सब कुछ दाव पर लगाकर करना पडे़गा। ऐसे स्कूल चलाने पडे़गे जो समाज को सम्पूर्ण मुक्ति की ओर ले जाएं। जो रोजगार देने के साथ समाज का शिक्षण मानवता के विश्व मानदंडों के आधार पर करें। तब ही इस समस्या का कोई हल निकल सकता है। सरकारी स्कूलों से यह काम तभी किया जा सकता है, जब शिक्षकों का दृष्टिकोण समग्रता वाला हो और जीवन के प्रति उनकी दृष्टि आधुनिक एवं वैज्ञानिक हो। शिक्षा में एक अलग तरह के राष्ट्रीय अभियान से ऐसा संभव किया जा सकता है। एक अलग तरह की स्कूली शिक्षा व्यवस्था चलाकर।

मोदी नहीं योगी मॉडल चाहिये ?

तो क्या इतिहास बीजेपी सत्ता को दोहरा रहा है या फिर एक नया इतिहास गढ़ा जा रहा है। दरअसल वाजपेयी आडवाणी की जोडी और मौजूदा वक्त में मोदी योगी की जोड़ी एक समान लकीर भी खींचती है, जिसमें एक सॉफ्ट तो दूसरा हार्ड । लेकिन वाजपेयी आडवाणी के दायरे को मोदी योगी की जोड़ी एक विस्तार भी देतीहै क्योंकि यूपी सरीखे राज्य का कोई प्रयोग केन्द्र सरकार को वैसे ही डिगा सकती है जैसे एक वक्त कल्याण सिंह ने पीवी नरसिंह राव को तो मोदी ने गुजरात सीएम रहते हुये वाजपेयी को डिगाया। और मोदी जब 2002 से आगे निकलते हुये दिल्ली पहुंच गये तो क्या पहली बार योगी के सामने भी ऐसा मौका आ खड़ा हुआ है, जहां गोरखपुर से लखनऊ और लकनऊ से दिल्ली का रास्ता भी तय हो सकता है। फिलहाल ये सवाल है । लेकिन इस सवाल के गर्त में तीन सवाल छुपे ही हुये हैं। मसलन पहला सवाल क्या मोदी की छवि योगी की छवि तलेबदल जायेगी। दूसरा, क्या मोदी की तर्ज पर योगी अपनी छवि बदलने के बदले विस्तार देंगे। तीसरा , यूपी 2019 के लिये दिल्ली का रास्ता बनायेगा या रोकेगा । ये सारे सवाल इसलिये क्योकि योगी के सीएम बनते ही राम मंदिर ,यूनिफॉर्म सिविल कोड और तीन तलाक़ के मुद्दे भी छोटे हो गये । यानी भारतीय राजनीति में जिन सवालो को लेकर सत्ता लुकाछिपी का खेल खेलती रही वह सवाल योगी की पारदर्शी राजनीति और छवि के आगे सिमट भी गयी । यानी चाहे अनचाहे हर वह प्रयोग जिससे मोदी सरकार पल्ला झाड़ सकती है और योगी सवालों को मुकाम तक पहुंचाकर खुद को ही बड़ा सवाल बनते चले जाते है । तो कौन सी छवि चुनावी लाभ पहुंचाती है जब एसिड टेस्ट इसी का होने लगेगा तब विपक्ष की राजनीति कहा मायने रखेगी। और 2019 में मोदी हो या 2022 तक योगी ही मोदी बन चुके हो इससे किसे फर्क पड़ेगा । क्योंकि कट्टर हिन्दुत्व की छवि मोदी तोड चुके है । कट्टर हिन्दुत्व की छवि योगी की बरकरार है । और संयोग से राम मंदिर निर्माण पर अदालत से बाहर सहमति का सुझाव देकर सुप्रीम कोर्ट ने मोदी-योगी की तरफ देश को देखने के लिये मजबूर तो कर ही दिया है ।
तो क्या इतिहास फिर खुद को दोहरायेगा । कभी मोदी के आसरे गुजरात को हिन्दुत्व के मॉडल के तौर पर एक वक्त देश ने देखा । और अब योगी के आसरे यूपी का हिन्दुत्व के नये मॉडल के तौर पर देखने का इंतजार देश कर रहा है । मोदी ने विकास की चादर ओढ ली है तो योगी अभी भी भगवा ओढ़े हुये हैं। और मोदी की तमाम सफलताओ का मॉडल विकास पर जा टिका है और इंतजार अब योगी मॉडल का हो रहा है। इसीलिये मोदी के ढाई बरस के दौर में जिस योगी को फ्रिंज एलीमेंट माना गया । संघ ने उसी फ्रिंज एलीमेंट पर सीएम का ठप्पा लगाकर साफ संकेत दे दिये कि हिन्दू एजेंडा दरकिनार हो वह उसे मंजूर नहीं । यानी संघ ने मोदी-योगी की जोडी से सपने तो यही संजोये है कि , " आर्थिक समृद्धि और दोहरे अंकों के विकास दर के साथ हिंदू युग का स्वर्णिम काल दिखायी दे । " और मोदी हिन्दू युग के स्वर्मिम काल के प्रतीक बनना नहीं चाहेंगे। लेकिन योगी इस प्रतीक को अपने तरीके से जिन्दा कर सकते है । क्योंकि चाहे अनचाहे राम मंदिर पर राजनीतिक निर्णय का वक्त आ गया है । और मोदी सरकार की खामोश पहल और फ्रिंज एलीमेंट से सीएम बने योगी क खुली पहल के बीच संघ परिवार महसूस कर रहा है कि मोदी मॉडल सत्ता के लिये चाहिये । लेकिन योगी मॉडल हिन्दु युग के स्वर्णिम काल के लिये चाहिये । क्योंकि याद कीजिये पिछले बरस 2 मार्च तो गोरखपुर के मंदिर में जब संतो की बैठक हुई । और इससे संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी भी शामिल हुये तो कहा गया, "1992 में 'ढांचा' तोड़ दिया गया। अब केंद्र में अपनी सरकार है। सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला हमारे पक्ष में आ जाए, तो भी प्रदेश में मुलायम या मायावती की सरकार रहते रामजन्मभूमि मंदिर नहीं बन पाएगा। इसके लिए हमें योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाना होगा" यानी ठीक एक बरस संघ ने राम मंदिर के लिये योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाने पर सहमति दे दी थी । जबकि संघ बाखूबी जानता समझता है कि योगी आदित्यनाथ संघ के स्वयंसेवक कभी नहीं रहे । तो क्या योगी मॉडल आने वाले वक्त में हिन्दुत्व को लेकर हिन्दू महासभा का वही मॉडल है, जिसपर एक वक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी सहमति नहीं थी । या फिर सत्ता और मंदिर के बीच अभी भी जब मोदी फंसे हुये है तो योगी को आगे कर संघ परिवार ने तुरुप का पत्ता फेंका है। ये सवाल इसलिये क्योकि राम मंदिर का सवाल हिन्दू महासभा ने पहले उठाया । रक्षपीठ के पूर्व मंहत दिग्विजय नाथ ने 1949 में ही राम जन्मभूमि का सवाल उठाया । आरएसएस ने 1964 में वीएचपी के जरीये हिन्दुत्व के सवाल उठाने शुरु किये । और सच यही है कि जिस दौर में हिन्दू महासभा के सदस्य बकायदा भारतीय रामायण महासभा के बैनर तले राम मंदिर का सवाल उठा रहे थे तब संघ परिवार की सक्रियता उतनी तीखी नहीं थी जितनी हिन्दु महासभा की थी । और दिग्विजय नाथ के निधन के बाद उनके शिष्य और आदित्यनाथ के गुरु अवैद्यनाथ ने आंदोलन को आगे बढ़ाया। विश्व हिन्दू परिषद की 1989 धर्म संसद में अवैद्यनाथ के भाषण ने ही इस आंदोलन का आधार तैयार किया था। जिसके बाद महंत अवैद्यनाथ बीजेपी में शामिल हुये । और राम मंदिर आंदोलन में अवैद्यनाथ की भूमिका का अंदाजा लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। आयोग की रिपोर्ट कहती है , ‘पर्याप्त मात्रा में पुख्ता सबूत दर्ज किए गए हैं... कि उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, परमहंस रामचंद्र दास, आचार्य धर्मेंद्र देव, बीएल शर्मा, ... महंत अवैद्यनाथ आदि ने भड़काऊ भाषण दिए.’ । तो इन्हीं अवैधनाथ के शिष्य आदित्यनाथ की तरफ संत समाज राम मंदिर बनाने के लिए टकटकी लगाए देख रहा है।
यानी राम मंदिर को लेकर इतिहास के पन्नो में एक परीक्षा प्रधानमंत्री मोदी की भी है । क्योंकि इससे पहले अयोध्या में राम मंदिर को लेकर जो भी पहल हिन्दू महासभा से लेकर विहिप या संघ परिवार ने की । हर दौर में केन्द्र में सत्ता कांग्रेस की थी । यानी हिन्दू संगठनों के आंदोलन ने बीजेपी को राजनीतिक लाभ पहुंचाया । हिन्दू वोट बैक बीजेपी के लिये ध्रुवीकरण कर गया । लेकिन अब बीजेपी की सरकार के वक्त हिन्दू संगठनों को निर्णय लेना है । संघ को निर्णय लेना है । और बीजेपी को भी राजनीतिक नफे नुकसान को तौलना है । क्योंकि दोनों तरफ बीजेपी भी खड़ी है । और संघ को मोदी नहीं राम मंदिर के लिये योगी भा रहे हैं। और सवाल यही है कि मोदी मॉडल का वक्त पूरा हुआ। अब योगी मॉडल का इंतजार है ।

धर्म से बड़ी कोई राजनीति नहीं...राजनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं

"धर्म से बड़ी कोई राजनीति नहीं .....और राजनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं" यूं ये बात तो लोहिया ने कही थी। और लोहिया का नाम जपकर समाजवाद के नाम पर सत्ता चलाने वालो को जब यूपी के जनादेश ने मटियामेट कर दिया। और पहली बार किसी धार्मिक स्थल का प्रमुख किसी राज्य का सीएम बना है तो ये सवाल उठना जायजा है कि क्या वाकई धर्म से बड़ी कोई राजनीति नहीं और राजनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं। क्योंकि जो शख्स देश के सबसे बड़े सूबे यूपी का मुखिया बना है वह गोरक्ष पीठ से निकला है। शिव के अवतार महायोगी गुरु गोरक्षनाथ के नाम पर स्थापित मंदिर से निकला है। नाथ संप्रदाय का विश्वप्रसिद्द गोरक्षनाथ मंदिर से निकला है। जो हिंदू धर्म,दर्शन,अध्यात्म और साधना के लिये विभिन्न संप्रदायों और मत-मतांतरों में नाथ संप्रदाय का प्रमुख स्थान है । और हिन्दुओं के आस्था के इस प्रमुख केन्द्र यानी गोरक्ष पीठ के पीठाधीश्वर महतं आदित्यनाथ जब देश के सबसे
बडे सूबे यूपी के सीएम हो चुके हैं, तब इस पीठ की पीठाधीश्वर मंहत योगीनाथ को लेकर यही आवाज है, "संतो में राजनीतिज्ञ और राजनीतिज्ञो में संत आदित्यनाथ"।

तो क्या आस्था का ये केन्द्र अब राजनीति का भी केन्द्र बन चुका है। क्योकि अतीत के पन्नो को पलटे तो गोरक्षनाथ मंदिर हिन्दू महासभा का भी केन्द्र रहा और हिन्दु महासभा ने कांग्रेस से लेकर जनसंघ की राजनीति को भी एक वक्त हिन्दू राष्ट्रवाद के दायरे में दिशा दी । तो क्या योगी आदित्नाथ के जरीये हिन्दू राष्ट्रवाद की उस अधूरी लकीर को ही मौजूदा वक्त में पूरा करने का ख्वाब भी संजोया जा रहा है। या फिर अतीत की राजनीति के दायरे में योगी आदित्यनाथ को पऱखना भूल होगी। ये सवाल इसलिये क्योंकि 1921 में कांग्रेस के साथ हिन्दू महासभा राजनीति तौर पर जुड़ी। जो 16 बरस तक जारी रहा। आलम ये भी रहा कि मदन मोहन मालवीय एक ही वक्त कांग्रेस की अध्यक्षता करते हुये हिन्दू महासभा को भी संभालते नजर आये। फिर हिन्दू महासभा से निकले श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में जनसंघ की  स्थापना की। तो क्या अतीत के इन पन्नों के आसरे योगी आदित्यनाथ को आने वाले वक्त में हिन्दू राष्ट्रवाद के दायरे में यूपी की सत्ता चलाते हुये देखा जायेगा । या फिर पहली बार सावरकर की हिन्दुसभा और हेडगेवार की  आरएसएस की दूरियां खत्म होगी । पहली बार संघ परिवार और बीजेपी की राजनीति की लकीर मिटेगी। पहली बार अयोध्या से आगे गोरखपुर की गोरक्ष पीठ हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनेगी। क्योकि कल तक गोरखनाथ मठ के महंत के तौर पर जाने जाने वाले सांसद योगी आदित्यनाथ अब मंदिर छोड बतौर सीएम लखनउ में मुख्यमंत्री निवास में रहेंगे। और 96 बरस से सक्रिय राजनीतिक तौर पर गोरखनाथ मठ की सियासी सत्ता की नींव सीएम हाउस में पड़ेगी। तो क्या यूपी महज जनादेश के आसरे एक नये सीएम आदित्यनाथ को देखेगा और बतौर सीएम आदित्यनाथ भी महज पारंपरिक गवर्नेस को संभालेंगे। जहां किसानों की कर्ज माफी से लेकर 24 घंटे बिजली का जिक्र होगा। जहां कानून व्यवस्था से लेकर रोजगार का जिक्र होगा य़ा फिर जहां गो हत्या पर पाबंदी से लेकर मंदिर निर्माण का जिक्र होगा। यकीनन जनादेश का आधार कुछ ऐसा हो सकता है लेकिन योगी आदित्यनाथ जिस छवि के आसरे राजनीति को साधते आये है और पहली बार संघ परिवार से लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने योगी आदित्यनाथ की राजनीति को मान्यता दी है। तो आने वाले वक्त में तीन राजनीति के तीन तरीके उभरेंगे ही।

पहला, विकास शब्द को हिन्दू सांस्कृतिक लेप के साथ परोसा जायेगा। दूसरा, किसानी या गरीबी को मिटाने के लिये हिन्दुत्व जीवन पद्धति से जोड़ा जायेगा। त सरा, कानून व्यवस्था का दायरा पुरानी तुष्टिकरण की नीति को पलट देगा। कह सकते हैं यूपी को चलाने के लिये हर समुदाय के लिये जो राजनीतिक कटघरा मायावती या मुलायम ने यूपी में खड़ा किया, वह कटघरा योगी आदित्यनाथ के वक्त 180 डिग्री में उलटा दिखायी देगा। लेकिन योगी को सिर्फ महंत से सीएम बनते हुये देखने से पहले यह योगी की उस राजनीतिक ट्रेनिंग को समझना होगा जो गोरखनाथ मठ की पहचान रही। महज दिग्विजय ने 1949 में संघ के स्वयंसेवकों को गोरखनाथ मंदिर से बाहर भी किया। 1967 में हिन्दू महासभा के टिकट से महंत दिग्विजय ने चुनाव भी लड़ा। 1989 में महंत अवैधनाथ ने हिन्दू महासभा की टिकट पर चुनाव लड बीजेपी को भी हराया । यानी हिन्दुत्व या राम मंदिर के नाम पर जो लकीर संघ खींचता आया है उसे हिन्दू महासभा ने हमेशा बेहद कमजोर माना । और जब बीजेपी को इसका अहसास हुआ कि हिन्दू महासभा के मंहत अवैधनाथ को साथ लाये बगैर हिन्दुत्व के ठोल पीटे नहीं जा सकते । या राम मंदिर का सवाल आंदोलन में बदला नहीं जा सकता तो 1991 में मंहज अवैधनाथ को मान मनौवल कर बीजेपी के टिकट से गोरखपुर में लड़ाया गया । यानी हिन्दुत्व के सवाल पर संघ और हिन्दू महासभा के बीचे दूरियो का रुख ठीक उसी तरह रहा जैसे एक वक्त हिन्दू रक्षा के सवाल पर गुरुगोलवरकर और सावरकर से लेकर मंहत दिग्विजय तक में भिन्नता थी। विभाजन के दौर में जब देश दंगो में झुलस रहा था तब हिन्दु महासभा का संघ पर आरोप था कि वह कबड्डी खेलने में व्यस्त है । यानी हिन्दु रक्षा की जगह सेवा भाव में ही संघ रहा । इसी लिये जिस वक्त अयोध्या आंदोलन उग्र हुआ तब महंत अवैधनाथ बीजेपी के साथ आये। और आज भी योगी आदित्यनाथ ये मानते है कि राम मंदिर निर्माण को सत्ता ने टाला। लेकिन हिन्दुत्व की योगी आदित्यनाथ की शैली क्या प्रधानमंत्री मोदी के लिये राहत है । ये सवाल इसलिये बड़ा हो चला है क्योकि गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक मॉडल उस दबंग राजनीति पर टिका है, जिस अंदाज को हिन्दू रक्षा के लिये एक वक्त सावरकर ने माना और यूपी में मंहज दिग्विजय ने अपनाया भी। यानी योगी के दौर में यूपी में कानून व्यवस्था की परिभाषा भी बदल जायेगी। क्योंकि जिस राजनीतिक मॉडल को योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में अपनाया। उसका सच ये भी है कि हिन्दू संघर्ष वाहिनी का अपने इलाके में अलग खौफ है। गोरखपुर में सांस्कृतिक सवालों के जरीये वाहिनी की दंबगई के आगे कानून व्यवस्था मायने नही रखती। खुद योगी आदित्यनाथ ने गोऱखपुर के कई ऐतिहासिक मुहल्लों के नाम मुस्लिम विरोध के बीच बदलवा दिए। उर्दू बाजार हिन्दी बाजार बन गया। अलीनगर आर्यनगर हो गया। मियां बाजार मायाबाजार हो गया। यानी योगी का अपना एजेंडा रहा-और उस एजेंडे में कानून अभी बाधा नहीं बना।

और योगी की दबंगई ही उनका यूएसपी है,जो गोरखपुर में लोगों को उनका मुरीद भी बनाता रहा।यानी योगी की गोरखपुर की पहचान का अगर विस्तार बतौर सीएम यूपी में होगा तो दंबग जातियों को दब कर चलना होगा। हिन्दू रक्षा के लिये कानून व्यवस्था अब काम करती दिखेगी। दबंग राजनेताओ की राबिन हुड छवि खत्म होगी । और मुस्लिम दबंगई पर तो बहस बेमानी है। यानी योगी की राजनीतिक धारा की दबंगई खुद ब खुद कानूनी मान्यता पायेगी और सड़क पर दंबग राजनीति में नयापन दिखायी देगा। ये तय है । ऐसे में जो हिन्दुत्व या राम मंदिर के अक्स तले योगी को समझना चाहते है तो फिर याद किजिये साल भर पहले यानी 2 मार्च 2016 को गोरखनाथ मंदिर में भारतीय संत सभा की चिंतन बैठक हुई थी, जिसमें आरएसएस के बड़े नेताओं की मौजूदगी में संतों ने कहा था---"1992 में 'ढांचा' तोड़ दिया। अब केंद्र में अपनी सरकार है. सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला हमारे पक्ष में आ जाए, तो भी प्रदेश में मुलायम या मायावती की सरकार रहते रामजन्मभूमि मंदिर नहीं बन पाएगा। इसके लिए हमें योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाना होगा"

ਦੁਰਯੋਧਨ ਅੱਜ ਮੈਂ ਹਾਂ

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(चुपचाप अट्टहास-27 का अनुवाद – जतिंदर कौर द्वारा)

ਰਾਜ-ਗੱਦੀ 'ਤੇ ਦੁਰਯੋਧਨ ਮੈਂ

ਜ਼ੁਬਾਨ ਹੰਭ ਗਈ ਏ
ਅੱਗ ਦੀਆਂ ਲਾਟਾਂ ਬੈਂਗਣੀ ਪੰਖੜੀਆਂ ਬਣ
ਮੇਰੇ ਸੁਫ਼ਨਿਆਂ ਵਿੱਚ ਆਉਂਦੀਆਂ ਨੇ
ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਤਾਰਿਆਂ ਨੂੰ ਮੈਂ ਭਸਮ ਕਰਨਾ ਲੋਚਿਆ,
ਉਹ ਟਿਮਟਿਮਾਉਂਦਿਆਂ ਮੈਨੂੰ ਚਿੜ੍ਹਾਉਂਦੇ ਨੇ
ਮਿਟਾਇਆਂ ਨਹੀਂ ਮਿਟ ਰਿਹਾ ਰਾਗ ਬਸੰਤ ਬਹਾਰ
ਹਰ ਰੋਜ਼ ਪੁੰਗਰਦਾ ਏ ਇੱਕ ਨਵਾਂ ਪੌਦਾ


ਸੁਣ ਵੇ! ਤੂੰ ਜੋ ਏਨੀ ਕਾਹਲ 'ਚ ਏਂ
ਭੁੱਲ ਨਾ ਜਾਵੀਂ ਕਿ ਇਹ ਦੌਰ ਮੇਰਾ ਏ
ਤਵਾਰੀਖ਼ ਦਾ ਪਹੀਆ ਮੇਰੇ ਹੱਥੋਂ ਘੁੰਮ ਰਿਹਾ ਏ
ਏਸ ਗੱਲੋਂ ਅਣਜਾਣ ਕਿ
ਅਖੀਰ ਆਉਂਦਾ ਏ ਹਰ ਨ੍ਹੇਰੇ ਦਾ
ਗੁਸਤਾਖ਼ੀ ਦੀਆਂ ਤਮਾਮ ਹੱਦਾਂ ਪਾਰ ਕਰ ਰਹੇ ਨੇ ਮੇਰੇ ਚੇਲੇ


ਹੁੰਦਾ ਹੋਵੇਗਾ ਅਖੀਰ ਹਰ ਨ੍ਹੇਰ ਦਾ
ਹਨੇਰੇ ਜੁਗ ਦੀ ਏਸ ਰਾਜ-ਗੱਦੀ 'ਤੇ ਬੈਠਾ
ਦੁਰਯੋਧਨ ਅੱਜ ਮੈਂ ਹਾਂ।


शाह को शह देकर योगी के आसरे संघ का राजनीतिक प्रयोग


ये बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को संघ की शह-मात है । ये नरेन्द्र मोदी की कट्टर हिन्दुत्व को शह-मात है । ये मुस्लिम तुष्टीकरण राजनीति में फंसी सेक्यूलर राजनीति को संघ की सियासी समझ की शह-मात है । ये मोदी का हिन्दुत्व राजनीति के एसिड टेस्ट का एलान है । ये संघ का भगवा के आसरे विकास करने के एसिट टेस्ट का एलान है । ये हिन्दुत्व सोच तले कांग्रेस को शह मात का खेल है, जिसमें जिसमें योगी आदित्यनाथ के जरीये विकास और करप्शन फ्री हालात पैदा कर चुनौती देने का एलान है कि विपक्ष खुद को हिन्दू विरोधी माने या फिर संघ के हिन्दुत्व को मान्यता दे। तो यूपी के नये सीएम के एलान के साथ कई थ्योरियों ने जन्म तो ले ही लिया है। और हर थ्योरी पहली बार उस पारंपरिक राजनीति से टकरा रही है, जिसे अभी तक प्रोफेशनल माना गया । लेकिन योगी आदित्यनाथ के जरीये राजनीतिक बदलाव की सोच पहली बार उसी राजनीति को शह मात दे गई जिसके दायरे में लगातार बीजेपी के कांग्रेसीकरण होने से संघ परेशान था । और संघ के भीतर सावरकर थ्योरी से हेडगेवार थ्योरी टकराने की आहट से बीजेपी परेशान रहती थी । तो जरा योगी आदित्यनाथ के जरीये इस सिलसिले को समझें कि आखिर बीजेपी अध्यक्ष ने ही सबसे पहले गवर्नेंस के नाम पर केन्द्रीय मंत्री मनोज सिन्हा के नाम पर मुहर लगायी। और संघ के पास सहमति के लिये मनोज सिन्हा का नाम भेजा। और ये मान कर भेजा कि संघ मनोज सिन्हा के नाम पर अपना मूक ठप्पा लगा देगा ।

क्योंकि संघ राजनीतिक फैसलों में दखल नहीं देता । लेकिन इस हकीकत को अमित शाह भी समझ नहीं पाये कि जिस तरह की सोशल इंजीनियरिंग का चुनावी प्रयोग यूपी में बीते तीन बरस के दौर में शामिल हुये बाहरी यानी दूसरे दलों से आये करीब सौ से ज्यादा नेताओं को बीजेपी का टिकट दिया गया । और यूपी के आठ प्रांत प्रचारकों से लेकर दो क्षेत्रवार प्रचारको की भी नहीं सुनी गई उसके बावजूद स्वयंसेवक यूपी में बीजेपी की जीत के लिये जुटा रहा तो उसके पीछे कही ना कही संघ और सरकार के बीच पुल का काम कर रहे संघ के कृष्ण गोपाल की ही सक्रियता रही, जिससे उन्होंने राजनीतिक तौर पर स्वयंसेवकों को मथा और चुनावी जीत के लिये जमीनी स्तर पर विहिप से लेकर साधु-संतों और स्वयंसेवकों को जीत के लिये गाव गांव में तैयार किया। ऐसे में मनोज सिन्हा के जरीये दिल्ली से यूपी को चलाने की जो सोच प्रोफनल्स राजनेताओं के तौर पर बीजेपी में जागी उस शह-मात के जरीये संघ ने योगी आदित्यनाथ का नाम सीधे रखकर साफ संकेत दे दिये सफलता संघ की सोच की है। और जनादेश जब संघ से निकले नेताओं की सोच में ढल रहा है तो फिर संकेत की राजनीति के आसरे आगे नहीं बढा जा सकता है ।

और यूपी के जो तीन सवाल कानून व्यवस्था, करप्शन और मुस्लिम तुष्टिकरण के आसरे चल रहे है, उसे हिन्दुत्व के बैनर तले ही साधना होगा । और अमित शाह के प्रस्ताव को संघ ने खारिज किया तो मोदी संघ के साथ इसलिये खड़े हो गये क्योंकि मंदिर से लेकर गौ हत्या और मुस्लिम तुष्टीकरण से लेकर असमान विकास की सोच को लेकर जो सवाल कभी विहिप तो कभी संघ के दूसरे संगठन या फिर सांसद के तौर पर साक्षी महाराज या मनोरंजन ज्योति उठाते रहे उनपर खुद ब खुद रोक आदित्यनाथ के आते ही लग जायेगी या फिर झटके में हिन्दुत्व के कटघरे से बाहर मोदी हर किसी को दिखायी देने लगेगें । और इसी के सामानांतर जब ये सवाल उठेगें कि मुस्लिम तो हिन्दु हो नही सकता लेकिन दलित या अन्य पिछड़ा तबका तो हिन्दु है तो फिर उसके पिछडेपन का इलाज कैसे होगा । तो विकास के दायरे में केशव प्रसाद मोर्य को डिप्टी सीएम बनाकर उसी राजनीति को हिन्दुत्व के आसरे साधा जायेगा जैसा राम मंदिऱ का शीला पूजन एक दलित से कराया गया था । यानी हिन्दुत्व के उग्र तेवर उंची नहीं पिछडी जातियों के जरीये उभारा जायेगा। और जो सवाल आरएसएस के भीतर सवारकर बनाम हेडगेवार के हिन्दुत्व को लेकर उग्र और मुलायम सोच तले बहस के तौर पर लगातार चलती रही उसपर भी विराम लगा जायेगा ।

क्योंकि योगी आदित्यनाथ की पहचान तो हिन्दु महासभा से जुडी रही है । और एक वक्त कट्टर हिन्दुत्व के आसरे ही योगी आदित्यनाथ ने बीजेपी की राजनीति को चुनौती अलग पार्टी बनाकर दी थी । और 50 के दशक में तो गोरखपुर  मंदिर तक नानाजी देशमुख को इसलिये छोड़ना पडा था क्योकि तब गोरखपुर मंदिर में हिन्दू महासभा के स्वामी दिग्विजय से वैचारिक टकराव हो गया था । और तभी से ये माना जाता रहा कि हिन्दुत्व को लेकर जो सोच सावरकर की रही उससे बचते बचाते हुये ही संघ ने खुद का विस्तार किया । लेकिन राम मंदिर का सवाल जब जब संघ के भीतर उठा तब तब उसके रास्ते को लेकर सावरकर गुट के निशाने पर बीजेपी भी आई । यानी मोदी की योगी आदित्यनाथ के नाम पर सहमति कही ना कही सरसंघचालक मोहन भागवत को भी शह मात है। और इन तमाम राजनीतिक धाराओं का सच ये भी है कि जिस तरह मोदी-संघ ने यूपी की राजनीति को जनादेश से लेकर विचार के तौर पर झटके में हजल दिया है । उसमें अगर कोई सामान्य तौर पर ये मान रहा है कि पिछड़ी जातियों की राजनीति या मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति में उभार आ जायेगा । तो फिलहाल कहा जा सकता है कि ये भूल होगी । लेकिन इतिहास के गर्त में क्या छुपा है और आने वाला वक्त कैसे यूपी को सियासी प्रयोगशाला बनाकर मथेगा । इसका इंतजार हर किसी को करना ही होगा । क्योंकि यूपी सिर्फ सबसे बड़ा सूबा भर नहीं है । बल्कि ये संघ की ऐसी प्रयोगशाला है जिसमें तपकर या तो देश की राजनीति बदलेगी या फिर हिन्दुत्व की राजनीति को मान्यता मिलेगी ।

चुपचाप अट्टहास - 27 :‌सिंहासन पर दुर्योधन मैं

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जीभ थक गई है
आग की लपटें बैंगनी पंखुड़ियाँ बन मेरे सपनों में आती हैं
जिन सितारों को मैंने भस्म करना चाहा,
वे टिमटिमाते मुझे चिढ़ाते हैं
मिटाए नहीं मिट रहा राग बसंत बहार
हर दिन चीखता है एक नया पौधा


अरे! तुम जो इतनी जल्दी में हो
भूलो मत कि यह दौर मेरा है
इतिहास का चक्का मेरे हाथों घूम रहा है


इस बात से अंजान कि
अंत होता है हर अंधकार का
उद्दंडता की हदें पार कर रहे हैं मेरे अनुचर


होता होगा अंत हर अंधकार का
अंधे युग के इस सिंहासन पर बैठा
दुर्योधन आज मैं हूँ।


My tongue cannot take it any more
Fire rises in my dreams as violet petals
The stars that I desired to burn down
They twinkle and tease me
And the Spring melody continues
Every day a new plant germinates


And you who are in such hurry
Forget not that these are my times
I wheel the history


My followers do not know that
All shades of dark end some day
And they are crossing limits of lumpen lust


Who cares if all darkness ends
I am Duryodhana
I sit on the throne in these dark times.

मुस्लिम-दलित-किसान कैसे फिट होगा "सबका साथ सबका विकास" तले ?

18 करोड़ मुस्लिम। 20 करोड़ दलित। खेती पर टिके 70 करोड़ लोग। और ऐसे में नारा सबका साथ सबका विकास। तो क्या प्रधानमंत्री मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुस्लिम-दलित-गरीब-किसान-मजदूर को नई राजनीति से साधना है। या फिर मुख्यधारा में सभी को लाना है। जरा सिलसिलेवार तरीके से इस सिलसिले को परखें तो आजादी के साथ विभाजन की लकीर तले मुस्लिमों की ये तादाद हिन्दुस्तान का ऐसा सच है जिसके आसरे राजनीति इस हद तक पली बढ़ी कि सियासत के लिये मुस्लमान वजीर माना गया और सामाजिक-आर्थिक विपन्नता ने इसे प्या  बना दिया। लेकिन जो सवाल बीते 70 बरस में मुस्लिमों को लेकर सियासी तौर पर नहीं वह सवाल आज की तारीख में सबसे ज्वलंत है कि क्या मोदी राज में मुस्लिम खुद को बदलेंगे। या फिर मुस्लिम सियासी प्यादा बनना छोड़ अपनी पहचान को भी बदल लेंगे। ये सवाल इसलिये क्योंकि जब 1952 के पहले चुनाव से लेकर 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के यूपी चुनाव तक में मुस्लिम को वोट बैक मान कर राजनीति अलग अलग धारा में बंटी। और जीत हार के बाद भी सवाल सिर्फ मुस्लिमों को लेकर ही खड़े किये जा रहे हैं। ऐसी आवाजें कई स्तर पर कई मुस्लिम नेताओं के जरीये यूपी चुनाव परिणाम के बाद सुनी जा सकती है। तो सवाल तीन हैं। पहला क्या मुस्लिम नेता के सरोकार आम मुस्लिम नागरिक से जुडे हुये नहीं है। दूसरा क्या नुमाइन्दी के नाम पर हमेशा मुस्लिम ठगे गये। तीसरा, क्या मुस्लिम समाज के भीतर की कसमसाहट अब मुस्लिम नेताओं से अलग रास्ता तलाश रही हैं। क्योंकि यूपी चुनाव का सच तो यही है कि बीजेपी बहुमत के साथ जीती। करीब 40 फीसदी वोट उसे मिले। लेकिन कोई मुस्लिम उसका उम्मीदवार नहीं था। और पहली बार यूपी विधानसभा में सबसे कम सिर्फ 24 विधायक मुस्लिम हैं। पिछली बार 69 मुस्लिम विधायक थे। यानी जो समाजवादी और मायावती मुस्लिमों को टिकट देकर खुद को मुस्लिमों की नुमाइन्दी का घेरा बना रही थी, मुस्लिमो ने उसी समाजवादी और मायावती के बढते दायरे को कटघरा करार दे दिया। असर इसी का हुआ कि सपा के 16 तो बीएसपी के 5 और कांग्रेस के 2 मुस्लिम उम्मीदवार विधायक बन पाये। तो इसके आगे के हालात ये भी है कि क्या चुनावी जीत हार के दायरे में ही मुस्लिम समाज को मुख्यधारा में लाने या ना ला पाने की सोच देश में विकसित हो चली है। क्योंकि ट्रिपल तलाक पर बीजेपी के विरोध के साथ मुस्लिम महिलायें वोट देने के लिये खडी हुई लेकिन ट्रिपल तलाक बरकरार है। वाजपेयी के दौर में मदरसों के आधुनिकीकरण के साथ मुस्लिम खड़े हुये लेकिन मदरसों के हालात जस के तस है। कांग्रेस के दौर में बुनकर से लेकर हज करने तक में बड़ी राहत दी गई। लेकिन दोनों सवाल आज भी जस के तस हैं। 
मुलायम-मायावती के दौर में मुस्लिमों को वजीफे से लेकर तमाम राहत दी गई। लेकिन रहमान कमेटी से लेकर कुंडु कमेटी और सच्चर कमेटी तक में मुस्लिम समाज के भीतर के सवालों ने एक आम मुस्लिम की जर्जर माली हालत को ही उभार दिया। तो फिर मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री मोदी के सामने भी ये सवाल है और मुस्लिम समाज के भीतर भी ये सवाल है कि अखिर मुख्यधारा से सरकार की नीतिया मुस्लिम समाज को जोड़ेगी या फिर मुस्लिम अपनी पहचान छोड जब एक आम नागरिक हो जायेगा तो वह मुख्यधारा से जुड़ेगा क्योंकि अगला सवाल दलितो का है। 20 करोड़ दलित का। और राजनीति ने दलित को एक ऐसे वोट बैक में तब्दील कर दिया,जहां ये सवाल गौण हो गया कि दलित मुख्यधारा में शामिल कब और कैसे होगा। यानी आंबेडकर से लेकर कांशीराम और मायावती तक के दौर में दलितो का ताकत देने के सवाल कांग्रेस की राजनीति से टकराता रहा। और कांग्रेस नेहरु से लेकर राहुल गांधी तक के दौर में दलितों के हक का सवाल दलितों के दलित पहचान के साथ जोड़े रही। तो क्या यूपी चुनाव के जनादेश ने पहली बार संकेत दिये कि दलित नेताओं की नुमाइन्दगी तले दलित खुद को ठगा हुआ मान रहा है। यानी दलित नेताओ के सरोकार दलितों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान से जुडे नहीं तो दलितों ने रास्ता अलग पकडा यानी जो सवाल मुस्लिमो की पहचान को लेकर उठा कि मोदी को लेकर मुस्लिम बदलेगें उसी तर्ज पर दलित भी अब अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान छोड कर मोदी सरकार के साथ खडे होगें । 
लेकिन संकट वहीं है कि क्या चुनावी जीत -हार तले दलितों की मुशिकल हालात सुधरेंगे । या फिर दलितो के लिये नीतिया मुख्यधारा में शामिल करने के अनुकूल बनेगी यानी मोदी के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ मुस्लिम अपनी राजनीतिक पहचान छोड़े दूसरी तरफ दलितों को सत्ता मुख्यधारा की पहचान दें। यानी सारे हालात बार बार सरकार की उन आर्थिक सामाजिक नीतियों की तरफ ले जाती है जो असमानता पर टिका है। और प्रधानमंत्री मोदी के सामने सबसे बडी चुनौती यही है कि वह कैसे असमान समाज के भीतर सबका साथ सबके विकास की अलघ जगाये। क्योंकि बीजेपी के अपने अंतर्विरोध हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को भी जीते हैं। यानी जाति और धर्म से टकराती हुये संघ से लेकर बीजेपी भी नजर आती है। ऐसे में अगला सवाल तो देश की असमानता के बीच सबका साथ सबका विकास तले गरीब किसान मजदूर का है। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में अब बीजेपी के वो पारंपरिक मुद्दे नज़र नहीं आते, जिनके आसरे कभी बीजेपी ने अपनी पहचान गढ़ी थी। अलबत्ता गरीब-किसान-मजदूर-दलित-शोषित-वंचित की बात करते हुए मोदी खुद को लीक से अलग ऐसे राजनेता के रुप में पेश करने की कोशिश में हैं,जिसके लिए हाशिए पर पड़े शख्स की जिंदगी को संवारना ही पहला और आखिरी उद्देश्य है।लेकिन देश की विपन्नता सबका साथ सबका विकास की समानता पर सवाल खड़ा करती है । क्योंकि देश का सच यही है कि सिर्फ एक फीसदी रईसों के पास देश की 58 फीसदी संपत्ति है । और दलित-मुस्लिम-किसान जो 80 फिसदी है उसके पास 10 फिसदी संसाधन भी नहीं है। यानी अर्थव्यवस्था के उस खाके को देश ने कभी अपनाया ही नहीं जहा मानव संसाधन को महत्व दिया जाये । यानी जो मानव संसाधन चुनाव जीतने के लिये सबसे बडा हथियार है। वहीं मानव संसाधन विकास की लकीर खींचे जाते वक्त पगडंडी पर चलने को मजबूर हैं। और उसके लिये किसी सरकार के पास कोई नीति है ही नहीं। यानी देश के हाशिए पर पड़ा समाज आज भी मूलभूत की लड़़ाई लड़ रहा है, और सबका साथ सबका विकास आकर्षक नारा तो बन जाता है लेकिन जमीन पर इसे अमलीजामा कैसे पहनाया जाए-इसका रोड़मैप किसी सरकार के पास कभी नहीं दिखा।

चित्रकार जे.पी. सिंघलः कुछ यादें : ओमा शर्मा

लेखक मंच - Fri, 17/03/2017 - 01:27

प्रसि‍द्ध चित्रकार और छायाकर जे.पी. सिंघल पर ओमा शर्मा का संस्मरण-

कुछ यादें आपके जेहन में हमेशा के लिए तारी हो जाती हैं और बारहा अनजाने ही। जे.पी. सिंघल साहब के साथ पहली मुलाकात की मुझे खूब याद है, जो वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा के घर एक दोपहर को हुई थी। जब मैं वहां पहुंचा तो लेखक-कलाकार मित्र प्रभु जोशी अपने सुपरिचित अंदाज में वहां उपस्थित मेहमानों को कला और साहित्य की अपनी समझ के किसी पहलू पर संबोधित कर रहे थे। वहां घुसने के बाद मैं चुपचाप एक सोफे पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे वहां उपस्थित मेहमानों से मिलवाया। पहली मुलाकात के समय जैसा होता है सभी ने एक नागरीय मुस्कुराहट के साथ परिचय की अदला-बदली की, सिवाय सिंघल साहब को छोड़कर जो पहली मुलाकात पर ही ऐसे गले मिले जैसे कि मैं उनका कोई भूला-बिछड़ा दोस्त रहा हूँ। मैं तब तक उनको नहीं जानता था। उसी दौरान उन्होंने हाजी अली स्थित घर पर आने का निमंत्रण भी दे डाला जो उन दिनों मेरे घर से चंद मिनटों की ही दूरी पर था।

अगले रोज जब मैं उनके घर पहुंचा तो मुझे बड़े विरल कलात्मक अनुभव का एहसास हुआ। लिफ्ट के पास ही उनकी कई पेंटिंग लगी थीं। प्रवेश द्वार के पास उनके खास कलात्मक हस्ताक्षर की लिपि पीतल में जड़ी थी हालांकि मैं तब तक उससे वाकिफ नहीं था। उसके ठीक ऊपर कोई पुराना भित्तीचित्र था। थोड़ी देर इंतजार के बाद किसी ने दरवाजा खोला और मुझे अंदर बुला लिया। उस चौकोर कमरे में मेरा बाद में भी कई मर्तबा जाना हुआ लेकिन उसमें ऐसी अद्भुत चित्रकारियां, शिल्पकृतियाँ, म्यूरल और तरह-तरह की इतनी सारी आकृतियां सजी रखी थीं कि मैं वहां बैठकर सिर्फ हैरान और सुकून महसूस कर सकता था क्योंकि वैसा कमरा न मैंने पहले कभी देखा था न बाद में। शायद इसका कारण यह भी रहा हो कि उस कमरे में सिर्फ अंतिम आकार लेती हुई चित्रकारियां ही नहीं, बल्कि कुछ ऐसी अधबनी भी थीं जो किसी मधुबनी से कम नहीं थीं। थोड़ी देर बाद वे अपने उसी खास अंदाज यानी गोल गर्दनवाले कुर्ते और पायजामे में मुस्कुराते हुए आये और फिर से लिपटकर गले मिले। मैंने उनका एक मेजबान का अपनापन महसूस किया। मुझे थोड़ा ताज्जुब हुआ क्योंकि वो इतने बड़े-बुजुर्ग कलाकार थे और ऐसे खुलकर स्नेह बरसा रहे थे जिसकी कोई वाजिब वजह मुझे समझ नहीं आ रही थी। हां, मुझे एक सच्चे कलाकार की इंसानियत का एहसास जरूर हो रहा था। उसके बाद भी कई मर्तबा मिलना हुआ इसलिए उस पहली मुलाकात की बहुत सारी चीजें मैं भूल गया हूँ। बस मुझे याद है तो ये कि वो डेढ़ घण्टे का वक्फा मानो पलक झपकते ही निकल गया था। उस समय वे 76 साल के जवान थे। जिंदगी और आवेग से भरे हुए और दुनियादारी से तो एकदम ही बेपरवाह। और तो और उनमें कोई कलाकार होने तक का भरम नहीं था। उस समय वे सिर्फ शरीफ इंसान थे जो अपनी जिंदगी पूरी आजादी से जी रहा हो। अलबत्ता ये आजादी पाने के लिए उन्होंने आधी सदी से ऊपर मशक्कत की थी। उनके दिमाग में उस समय अगर कुछ था तो बस यही कि अपने मेहमान को कैसे तवज्जो दी जाए। वे बातें करते और जैसे बेलगाम अतीत रास्तों में घुमक्कड़ी करने लगते। थोड़ी देर बाद ही मुझे लगा कि मैंने तयशुदा वक्त से कहीं ज्यादा उनका वक्त ले लिया है। जब मैं चलने लगा तो वो मेरे साथ लिफ्ट तक आ गये। लेकिन जब लिफ्ट आई, उसके बाद भी मेरे साथ उतर आये। मेरे लाख माना करने पर भी जब तक मैं अपने कार में नहीं बैठ गया उन्होंने मुझे नहीं छोड़ा (और यह क्रम हर बार दोहराया गया)। जब मैं घर लौटा तो उनसे हुई मुलाकात मुझे रह रहकर याद आने लगी। मुम्बई में कौन किसी से इस तरह मिलता है? इतने खुले मन से कौन गले लगता है? कौन इतने गरमजोशी के साथ बातें करता है? कौन ऐसे ही मिलने-मिलाने के लिए आमंत्रित करता है।

थोड़े दिन बाद उनका मेरे पास फोन आया कि भाई अरसा हो गया मिला जाए। मुझे पिछली मुलाकात अभी तक गुदगुदा रही थी। मैंने अपनी पत्नी को भी उनके घर जाने को राजी कर लिया ताकि वो भी महसूस कर सके कि एक सच्चे कलाकार से मिलना कितना ऊर्जा भरा होता है। सिंघल साहब और उनकी पत्नी श्रीमती माया सिंघल हमेशा बेहतरीन मेजबान थे। हम हमेशा उसी कमरे में बैठते जहां मैं पहली बार बैठा था। मैं किसी भित्तीचित्र के बारे में उनसे पूछता तो वह उसे हासिल करने तक की दास्तान छेड़ देते जिनकी तादात अच्छी खासी थी। पता नहीं उन्होंने ये बात छेड़ी या मैंने जिक्र किया, थोड़ी देर बाद हम उनके पेंटिंग रूम में चले गये जहां उनकी कई पेंटिंग्स अधबनी रखी थीं। एक तो ईजल पर ही रखी थी। एक बार तो मुझे लगा कि वह ईजल पर क्यों रखी है क्योंकि वह तो सम्पूर्ण हो चुकी है लेकिन उन्होंने थोड़ा सहमते करते हुए बताया कि अभी… इसका निचला हिस्सा थोड़ा खुरदुरा है…चेहरे के हाव-भाव में भी… ऊपर का आसमान बाकी चित्र से मेल नहीं खा रहा है। मुझे वाकई लगा कि मेरे देखने का नजरिया अभी कितना संकुचित है हालांकि मैं पॉल वालरी के इस कथन से वाकिफ था कि कोई भी कलाकृति कभी पूरी नहीं होती है; एक अवस्था के बाद वह दुनिया में समर्पित करनी होती है। शायद इसी को प्रभु जोशी ‘नष्ट होने का कगार’ कहते हैं। उसके बाद उन्होंने मुझे एक और पेंटिंग दिखाई जो एक स्त्री की थी। फकत काले रंग का इस्तेमाल। सांझ ढले के वक्त वह स्त्री किसी पहाड़ी पर आँखें मुंदे कुदरत और अपने आप से मगन थी। एक पारदर्शी हिजाब उसके ऊपर जरूर था लेकिन उसके रोम-रोम से मादकता रिस रही थी। अपनी कोहनी मोड़े वह औरत कमर के बल लेटी अपने ही खयालों में ऐसे खोयी थी जैसे- उसे अपनी दुनिया की या किसी और की कुछ पड़ी ही नहीं हो। या एक अबूझ आनन्द में डूबी हो। उस कमसिन की नाभी पूरी चित्रकारी को एक अतीव मादकता में घोले दे रही थी। इस तरह की चित्रकारी को देखना करिश्माई अनुभव था। यह एक बड़े आकार की पेंटिंग थी जिसमें सिर्फ एक ही रंग यानी काला और और उसमें अलग-अलग शेड्स इस्तेमाल किये गये थे। देखने में बहुत सहज लेकिन उतनी ही आकर्षक लग रही थी। मैं सोचने लगा फकत एक रंग और वह भी काले के सहारे कोई किसी के हावभावों को इतनी बारीकी से कैसे चित्रित कर सकता है? लेकिन हाथ कंगन को आरसी क्या? वह पेंटिंग तो मेरे सामने थी। तब तक मुझे पेंटिंग की बारीकियों के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी (अभी भी नहीं है) लेकिन उस पेंटिंग का असर सम्मोहित करने वाला था।

लेकिन ये तो उस शाम इस तरह के अनुभव से गुजरने की शुरुआत भर थी। मैंने कला दीर्घायें देखीं हैं लेकिन इस तरह का कला अनुभव, और वह भी किसी के घर के छोटे से कमरे के भीतर, कहीं नहीं हुआ था। उसके बाद उन्होंने वहीं पर आधा दर्जन रखी पेंटिंगों में से एक उठाई और मुझे दिखाने लगे। अपनी पेंटिंग को दिखाने का उनका लहजा और जज्बा क्या खूब था। मैं पेंटिंग को उठाने में उनकी मदद करता तो वे मुझे रोक देते और इसरार करते कि मैं कहां किस कोण पर खड़ा होकर उस पेंटिंग को देखूं ताकि उनके सृजन को महसूस कर सकूं। मुझे एक पेंटिंग की अभी भी याद है। वह एक आदिवासी महिला की थी जो अपने अधनंगे बच्चे को गोदी में उठाये आसमान की तरफ देख मुस्कुराए जा रही थी। चित्रकार की बारीक निगाह से कुछ छूटा हुआ लग ही नहीं रहा था… उनके फटैले कपड़े, अलग-अलग रंगों के मोती, तरह-तरह के रंग-बिरंगे कंगन, आँखों की चमक… बाजू में एक पेड़ भी था जिसके पत्तों के बीच से उतरी हुई धूप अलग-अलग आकारों में पसरी थी। वह महिला अपने बच्चे के साथ जहां खड़ी थी, उसका आस-पास भी चित्रकार ने पूरी बारीकी से दर्ज कर रखा था। प्रकृति की बारीकियों को इस तरह ‘चित्रित’ करना मेरे लिए बड़ा हैरत भरा था और वह आज भी है। कितनी देर तक काम किया गया होगा ताकि कुछ अखरे भी न और छूटे भी न… आखिर यही तो यथार्थवादी चित्रकारी की कसौटी होती है। बाद में मेरे मित्र भाई प्रभु जोशी ने बतलाया कि सिंघल साहब के यहां सूखे ब्रश का जिस अद्भुत और उस्ताद-परक ढंग से इस्तेमाल होता है, उसकी कहीं कोई मिशाल नहीं है। उनमें कहीं भी कोई ‘स्ट्रोक’ जैसी चीज गोचर नहीं हो सकती। इसलिए वे मानते हैं कि उनकी यथार्थवादी चित्रकारी समूचे बंगाल स्कूल की यथार्थवादी चित्रकारी पर भारी पड़ती है। उनको याद करते हुए जब मैं यह सब लिख रहा हूँ तो उस शाम देखी और दिखाई गयी दूसरी चित्रकारियां भी जेहन में आ रही हैं। लेकिन जो खास चीज याद आ रही है वह है सिंघल साहब का अपनी कला में यकीन। वो अपने रचे को ऐसी मार्मिक विनम्रता से दिखाते थे कि पता लगता कि उनके भीतर बैठा कलाकार कितना सच्चा और ईमानदार है। मेरे लिए तो यह जैसे कुबेर का खजाना था।
* *

धीरे-धीरे हम लोगों की खूब छनने लगी। किसी बड़े बुजुर्ग कलाकार जिसने पूरी जिन्दगी ही कला के सृजन में बिताई हो, उससे उसकी या दूसरों की कला या फिर जिंदगी के दूसरे पहलुओं पर बात करना बड़ा आस्वाद भरा था। सिंघल साहब क्योंकि उम्र और अऩुभव के किसी अऩ्तर को नहीं मानते थे इसलिए हम बड़े याराने ढंग से गुफ्तगू करते। उसी दौरान मुझे पता लगा कि वे अपने श्वेत-श्याम वाले छाया-चित्रों को एक जगह इकट्ठा कर कॉफी टेबल बुक तैयार करना चाह रहे थे। पिछले चालीस साल के परिदृश्य में एक भी तो अभिनेत्री ऐसी नहीं…सायरा बानो से लेकर रेखा-हेमा-जीनत और श्रीदेवी से लेकर माधुरी-ऐश्वर्य और कैटरीना तक… जो अपने कमसिन दौर में उनके कैमरे की गिरफ्त में न आयी हो। इनमें ज़्यादातर छाया चित्र उनके मशहूर होने से ठीक पहले के दिनों के रहे होंगे। उन्होंने मुझे बैलगाड़ी के पीछे बैठी एक तस्वीर दिखायी और पहचानने का इसरार किया। तस्वीर में मुझे बहुत कुछ पहचाना सा लग रहा था लेकिन मैं सुनिश्चित नहीं हो रहा था कि वह कौन हो सकती है। बारह-तेरह साल की उम्र में सभी उसी मासूमियत और भोलेपन से भरे होते है। मेरे असमंजस को ताड़ते हुए उन्होंने बताया कि ये नीतू सिंह है जो यकीनन कमसिन होते हुए संभावनाओं से भरी-भरी लग रही थी। कनखियों से देखती हुई उसकी अदा किसी को भी अपनी तरफ लुभा सकती थी। मैंने और दूसरे चित्र भी पलटे, हर चित्र अपने उस श्वेत-श्याम रूप में उस अभिनेत्री के बाहरी ही नहीं भीतरी सौंदर्य तक को छलका दे रहा था। एक चित्र को देखकर मैं रुक गया। उसमें वह युवती पत्तों से भरी जमीन पर दोनों हाथों को सिर की तरफ फैलाए ऐसे लेटी थी जैसे कुदरत ने इसे अभी-अभी किसी सुकून से नवाजा हो… शान्त, तृप्त और अपने में मगन। सिंघल साहब की यह भी एक खूबी थी कि वे सिर्फ प्राकृतिक रौशनी ही इस्तेमाल करते थे, कैमरे का फ्लैश नहीं। उस छायाचित्र को देखकर मैंने वाजिब सवाल किया कि उस चित्र के ऐंगल को देखकर उन्होंने कैमरे को कैसे सेट किया होगा। उन्होंने बताया कि इसके लिए उन्होंने कैमरे को लेकर पेड़ की टहनी के ऊपर बमुश्किल संतुलन बनाते हुए लेटना पड़ा था।
“लेकिन आप पेड़ पर चढ़े कैसे?”
उस दृश्य की कल्पना से मेरे भीतर जिज्ञासा हुई।
“अरे उस हिरोइन ने ही मुझे सहारा देकर ऊपर चढ़ाया था।”
उन्होंने चुश्की ली।

बातों के बीच में ये मजाहिया तेवर उनकी आदत थी। लेकिन जब बात उनकी कला या किसी की भी कला की बात हो तो वो एकदम गैर-समझौतावादी हो जाते। प्रभु जोशी के जल रंगों के वो ऐसे मुरीद थे कि कोई भी उनकी बातों से लहालोट हो जाए। उनके जलरंगों की इतनी तारीफ करते, उनकी बारीकियों को ऐसे मार्मिक ढंग से बताते कि कैसे धूसर रंगों का इस्तेमाल किया जा सकता है। कैनवस के एक-एक गोशे को किस अनुपात में पिरोया गया है कि प्रभु जोशी जैसा जलरंगी चित्रकार कोई दूसरा नहीं हो सकता। और यह सब कहते हुए किसी को ये लग ही नहीं सकता था कि वे खुद एक चित्रकार हैं। लेकिन एक बार जब उन्होंने प्रभु जोशी के गणेश श्रृंखला के चित्रों को देखा (जो बेशक मुम्बई के बाजार के लिए तैयार किये गये थे) तो वे उन्हीं प्रभु जोशी को लगभग लताड़ने में रत्ती भर नहीं हिचके!
“क्यों? तुम ये सब क्यों करते हो, क्या जरूरत है? इससे तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा…. और तो और वो पैसे भी नहीं जिसके लिए तुमने इन्हें बनाया है…”
मेरे सामने ही वे प्रभु जोशी पर दहाड़ने लगे।

इसी तरह एक बार जब वे मेरे घर आये और हुसेन साहब की बनी पेंटिंग को देखकर मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए बोले “… ये हुसेन साहब का बहुत चालू वाला काम है… हुसेन साहब ने इसे ज्यादा से ज्यादा एक घण्टे में बना दिया होगा… ये उनकी आदत थी, दोस्तों को खुश रखने की।”
मुझे उनकी बात और बारीकी पसन्द आयी।

जेपी सिंघल के साथ ओमा शर्मा।

उन्हीं दिनों भारतीय ज्ञानपीठ से मेरा कहानी संग्रह आने वाला था। मेरे मन में ऐसे ही बात उठी कि क्या किताब के कवर पर उनकी किसी पेंटिंग का इस्तेमाल हो सकता है? या वे कोई मेरी फोटो खींच सकते हैं? मैंने उनसे इस बात का जिक्र भर क्या कर दिया कि उनका दिल तो मदद के लिए उमड़ पड़ा। वे मुझे अपने दूसरे कमरे में ले गये जहां उनकी न जाने कितनी अमूर्त चित्रकारियां बनी रखी थी। एक यथार्थवादी चित्रकार की कूची ने जो अमूर्तन का संसार रचा हुआ था वह कम स्तब्धकारी न था। एक तरह से यथार्थवादी और अमूर्तन, पेंटिंग की दुनिया के दो छोर हैं। कला में अमूर्तन की जरूरत और महत्तव एक दिलचस्प विषय रहा है। अमूर्तन उत्तरोत्तर विकास का पैमाना माना जाता रहा है हालांकि बाज़ हल्कों में जो कलाकृति समझ में न आये या कुछ भी समझाती सी न लगे उसे सहजता से अमूर्त कह दिया जाता है। खैर, मैंने उनके भण्डारगृह से एक का चयन किया जो अंततः बहुत खुबसूरत ढंग से मेरे कहानी संग्रह “कारोबार” का कवर बनी। भारतीय ज्ञानपीठ में कार्यरत मेरे एक मित्र ने बताया कि उसको देखकर तत्कालीन संपादक गदगद हो गये थे क्योंकि इस तरह की चित्रकारी उनकी नजर में इसके पहले कभी नहीं आयी थी और न शायद इसके बाद। जहां तक फोटो लेने की बात थी वह भी उन्होंने उसी वक्त कह दिया कि शनिवार को खींचेंगे। अभी तक मेरी किताबों में गये मेरे चित्र किसी नुक्कड़ के फोटो स्टूडियो में पासपोर्ट साइज के बनवाये हुए थे। मैं यह तो नहीं कहूँगा कि मेरे भीतर किसी नामी या अच्छे फोटोग्राफर द्वारा चित्र खिंचवाने की इच्छा न थी क्योंकि मैं किसी ऐसे-वैसे से वाकिफ ही नहीं था। कोई फोटो खींचने में कितनी देर लगती है? लेकिन पहली बार पता चला कि फोटो खींचने का भी एक ‘सत्र’ होता है। और वो उस पूरे ‘सत्र ‘की तैयारी से ही उस शनिवार मेरे घर आये थे…हैट और सस्पेंडर चढ़ाए…तरह-तरह के लेंसों का जत्था उठाए। कभी वे मुझे खिड़की के पास खड़ा कर देते, कभी सोफे पर बिठाते, कभी खुद सोफे पर चढ़ जाते और कभी नीचे बैठकर, यहां तक की लेटकर अपने कैमरे का ऐंगल सेट करते। कई बार ये भी हुआ कि वे उस मुद्रा में यूँ ही पड़े रहे क्योंकि उनके मुताबिक मैं ‘रिलैक्स’ नहीं था।
“मैंने तुम्हारी कहानियां नहीं पढ़ी हैं, मगर पढ़ लूंगा… लेकिन तुम्हारे चेहरे में एक दार्शनिकपना(इदन्नमं) है … मैं उसे पकड़ना चाहता हूँ… इसलिए… कुछ जान-बूझकर सोचने या पोज बनाने की जरूरत नहीं है… जैसे हो वैसे ही रहो… क्योंकि मैं जानता हूँ तुम क्या हो।” वे कैमरा छोड़ बड़े मनुहार और संयम से मुझे समझाने लगते। कौन फोटोग्राफर, जिसके पास हिन्दी सिनेमा की एक से एक अभिनेत्री अपना फोलियो बनवाने को ललायित रहती रही हों, इस तरह कर सकता था? लेकिन सिंघल साहब तो सिंघल साहब थे। उन्हें कुछ करना होता था तो पूरे सलीके और स्नेह से करते थे। सृजन का अभिप्राय ही उनके लिये पूरे जी जान से अपने को समर्पित कर देना था। मैंने यह भी देखा कि उन्होंने जान लिया था की किस तरह तकनीकी के सहारे से( मैकेनटॉश कंप्यूटर) अपने सृजन में चार चांद लगाये जा सकते हैं। मेरी किताब को आये अब कई वर्ष हो चुके हैं। उसका दूसरा संस्करण भी आ गया जिसमें वही पेंटिंग और उनका खींचा गया मेरा चित्र है। इतना ही नहीं उस चित्र को मैंने उसके बाद आई दूसरी किताबों में भी इस्तेमाल किया। मुझे ही नहीं मेरे करीबी कई मित्रों को लगता है कि कोई दूसरा चित्र मुझे इससे बेहतर नहीं दिखा सकता है।
जो भी हो इस बहाने सिंघल साहब के साथ मेरी संगत बनी रहती है।

लेकिन उनके साथ बातें करना, उनके बताये अनुभव का गवाह बनना, उनके खयालात से वाकिफ होना या कभी-कभी उनकी तुनक मिजाजियों से गुजरना बहुत रोमांचक था। वे अपने यकीनों में पूरे जोश-खरोश से जीते थे जैसा बहुत सारे कलाकारों की फितरत होती है। एक बार जब मैं उनसे मिलने गया तो वो कुछ फोटोग्राफ्स का पुलिंदा लिये बैठे थे। बड़े अजीबो-गरीब ढंग के फोटोग्राफ्स थे। बम्बई और उसकी तमाम भीतरी-बाहरी पहचान को दर्ज करते हुए। कई वर्षों का काम रहा होगा। और फोटोग्राफ्स क्या थे? बम्बई की दीवारों पर लिखी गयी इबारतें और पोस्टर्स… कोई चारकोल से लिखा हुआ… कोई आधा मिटा हुआ… कोई एक दूसरे के ऊपर चढ़ा हुआ… कोई भीड़-भड़क्के के बीच दबा हुआ तो कोई सुनसान में पड़ा हुआ। क्या ऐसे वाहियात संदेशों–जिन्हें उस शहर को पढ़ने की फुर्सत नहीं– से कोई कला बरामद की जा सकती है? या कहें, कि क्या इस तरह की मामूलियत कला में ढाली जा सकती है? मैं सोचने लगा। लेकिन सिंघल साहब एक सोचते-विचारते कलाकार थे। जीवन के आंवे से अपना माल-पानी उठाते थे। उनके भीतर हरदम कुछ न कुछ चलता रहता था। पिछली सदी के सातवें और आठवें दशक में बंबई आकर अपनी कैलेंडर आर्ट के सहारे उन्होंने आर्थिक रूप से अपने को ठीक-ठाक सुरक्षित कर लिया था जिसे बाद में उनके फिल्मों से जुड़ने के कारण और पुख्तगी मिल गयी थी। वे मुख्य धारा की लगभग सौ फिल्मों से उनके पब्लिसिटी डिजाइनर के तौर पर जुड़े रहे। फिल्मी दुनिया का जिक्र करते वक्त उनका जायका कुछ कसैला सा हो जाता “… बड़ी कारोबारी दुनिया है भाई…एक से एक कमजर्फ वहां बैठा होता है…फिल्मों की दुनिया कलाकार की दुनिया नहीं हो सकती है… लेकिन मेरे को क्या मेरा तो इसने भला ही किया।” वे जैसे सब कुछ भूलते-भालते एक फलसफे के सहारे बाहर निकल चुस्की लेने लग जाते। लेकिन उनको अपने संघर्ष के दिन याद रहते थे। यानी लड़कपन में मेरठ के दिन और बम्बई में आने के शुरुआती दिन भी। आडवानी एण्ड ऑरलीकॉन में काम करते हुए उन्होंने अच्छा-खासा मकाम बना लिया था, लेकिन वे खुलेआम स्वीकारते कि वे अभी भी कई तरह की असुरक्षाओं के शिकार हैं। हर कलाकार को अपने को चलायमान रखने के लिए अपने तईं कुछ न कुछ करना पड़ता है, चाहे वह कोई मुगालता हो या कोई टोटका। अगर कोई लेखक बीस-तीस साल से लगातार लिख रहा है तो उसे कुछ नहीं तो उस नैरंतर्य के लिए ही सराहा जाना चाहिए। सिंघल साहब तो फोटोग्राफी और चित्रकारी की दुनिया से पचास साल से ऊपर से जुड़े हुए थे और फिर भी वे ‘प्रवाह’ में थे। उन्होंने अभी अपने हथियार नहीं फेंके थे… जैसे कलाकार होना उनका स्वभाव हो। जहांगीर आर्ट गैलरी में हुई उनकी कला प्रदर्शनी का मैं गवाह था। वह सचमुच एक विराट उपलब्धि थी। जहांगीर के नीचे के तीनों हॉल ही नहीं, पहली मंजिल पर बने दोनों कमरों को भी उन्होंने शामिल कर लिया था। मुम्बई का कला-जगत जैसे सकते में आ गया था। एक तरफ उनकी आदिवासियों की श्रृंखला थी तो दूसरी तरफ उनकी अजंता-एलोरा की। एक तरफ उनकी अमूर्त चित्रकारियां थी तो दूसरी तरफ कैलेंडरों के लिए बनायी गई चित्रकारियां। एक कमरे में तो उनके पिछले चालीस सालों की मुम्बई की तमाम खूबसूरत अभिनेत्रियों के ही श्वेत-श्याम छायाचित्र थे। उन दिनों बात करते हुए वे एक अजीब मस्ती के आलम में झूमते दिखते! कभी वे अपनी पेंटिंगों के बारे में ही बताते तो कभी उनके सृजन के रहस्य के बारे में और कभी अपनी खुद की ग्रन्थियों के बारे में। वे उम्र और कला के ऐसे मकाम पर थे जहां सराहना और आलोचना बेमानी हो जाते हैं। उन्हें कहीं दिली तसल्ली थी कि अपनी आदिवासी श्रृंखला में वे एक ठेठ भारतीयता को दर्ज कर पाये हैं और अपनी अजन्ता एलोरा श्रृंखला में उन्होंने उन तमाम बेनाम कलाकारों को श्रद्धांजली दी है जिन्होंने सदियों पहले ऐसा करिश्माई काम कर छोड़ा था। प्रदर्शनी का विमोचन अभिनेत्री श्रीदेवी ने किया जो मुझे बड़ा वाहियात लगा क्योंकि सारा मामला कम से कम कुछ समय के लिए कला की दुनिया से बेमेल हो चला था। लोगों के बीच अपनी बात रखते हुए उन्होंने कतर में बैठे मकबूल फिदा हुसेन से भी मोबाइल के जरिये आशीर्वचन लिये। मुझे वह गैरजरूरी लगा। मगर सिंघल साहब शायद हर सूरत उस प्रदर्शनी की सफलता देखना चाह रहे थे। जो भी हो प्रदर्शनी हर लिहाज से कामयाब थी। उन्हें भीतर कहीं ये भी सुकून था कि मुम्बई की कला की दुनिया में आखिर उन्होंने अपना झण्डा गाड़ दिया।
तो क्या वाकई उनका सपना पूरा हो गया?
क्या वाकई अब कुछ करने को नहीं बचा?
* *

पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे याद आता है कि अपने आखिरी दिनों में वे मुझसे कुछ कहना और बांटना चाहते थे… उनकी देखी-भाली कुछ कहानियां या वे अनुभव जिनसे वे गुजरे… जो उनके भीतर एक तड़प मचाये हुए थीं कि वे बाहर आयें। लेकिन सिंघल साहब के हाथ में कूची थी, कलम नहीं। एक बार मुझे देखकर लढ़ीयाते से बोले “… हम दोनों की जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसी होगी… एक सोचता है, दूसरा उसे अंजाम देता है।” वे बतायेंगे और मैं लिखूंगा। उन्होंने दक्षिण की अभिनेत्री का कई बार जिक्र किया जिसका बचपन में ही उसके पिता ने बलात्कार किया था। आज वह न सिर्फ एक जानी-मानी अभिनेत्री और सांसद रह चुकी हैं बल्कि उसके नाम का एक मंदिर तक है। मुझे यह संक्रमण दिलचस्प लगा। मगर किसी न किसी वजह से हम लोगों की वह देर तक चलने वाली मुलाकातें नहीं हो सकीं। मैं कभी उनसे इसका जिक्र करता तो वे कुछ टालमटोली सी कर जाते। मुझे कुछ नहीं सूझता क्योंकि यदि कुछ होने वाला था तो उसमें पहल उन्हीं की थी। अस्सी वर्ष के एक कलाकार व्यक्ति के साथ बर्ताव करते समय आपको खयाल ज्यादा रखना होता है (हुसेन के साथ मेरा तजुर्बा गवाह था!)। वे अब भी कला की दुनिया में विचरण करते थे लेकिन निजी चैनलों पर आने वाले कुछ अनाप-सनाप धारावाहिकों में रमने लगे थे। उन धारावाहिकों के कुटिल चरित्रों के साथ वे निजी दुश्मनी सी मानने लगते। भाभी जी यानी श्रीमती माया सिंघल ने मुझे हौले से सूचित भी किया कि वे उन धारावाहिकों के रिपीट शोज को भी उसी तन्मयता और आवेग से देखते हैं। उसके चरित्रों के साथ ऊपर-नीचे होते हैं।

“लेकिन सिंघल साहब ये टी.आर.पी.के लिए बनाये गये, खड़े किये चरित्र हैं, असली नहीं हैं…” मैंने हौले से उन्हें समझाने की कोशिश की।
“क्या ऐसे चरित्र हमारे आस-पास नहीं भटक रहे हैं, क्या तुम अखबार नहीं पढ़ते हो। कितना कुछ गलत हो रहा है दुनिया में।”  वे लगभग मुझ पर गरज से पड़े।
मैं सहम गया।
मुझे लगा जैसे उन पर कोई बाधा आ गयी है क्योंकि यह सब इतना अप्रत्याशित था। पता नहीं अपने दिल के भीतर वे किस रहस्यमयी झंझट में उलझे थे।
जिन्हें हम चाहते हैं कई हमें उनके गुस्से और अप्रत्याशित को स्वीकारना ही होता है।
* *

आठ मई, 2014 को मैं नाशिक में था जब फोटोग्राफर मित्र प्रदीप चन्द्रा का मेरे पास संदेश आया कि‍ प्रिय कला के हमारे एक दिग्गज सिंघल साहब नहीं रहे। मैं अवसन्न रह गया। पिछले चार वर्षों की मेल-मुलाकातों के बहुत सारे पल यकायक उमड़ने-घुमड़ने लगे। मेरे आस-पास एक बेचारगी तैर गई। उनके अप्रत्याशित रवैये का भी जैसे खुलासा सा हाथ लगने लगा। लेकिन मेरी चाहना थी कि उनके अन्तिम दर्शन अवश्य करूं। क्या यह मुमकिन होगा? संयोग से कनाडा में रहने वाले उनके छोटे पुत्र के आने से यह सम्भव हो सका।
जब मैंने उनको आखिरी बार देखा तो उनकी देह सिकुड़कर बहुत छोटी रह गयी थी। उन्होंने अपने संघर्षपूर्ण जीवन से कला की दुनिया को जो दिया था, उसकी अनूगूँज बनी हुई थी। लेकिन उनके दाह-संस्कार में शामिल होने वालों की तादाद बहुत कम थी। सिर्फ अंगुलियों पर गिनने लायक। कला की वह दुनिया जिसे उन्होंने जतन से इतना संवारा, उसे भी उनसे कुछ पड़ी नहीं रह गयी। क्या कहेंगे इसे? एक कलाकार का नसीब या मुम्बई की भागमभाग।
अलबत्ता, उनके चेहरे पर एक बच्चे की मासूमियत अभी भी तारी थी और मैं देख पा रहा था कि कैसे अपनी अंतिम सांस तक वे एक कलाकार की गरिमा बनाये रहे।

( ‘अकार’ से साभार)

जेपी (जयंती प्रसाद) सिंघल  का परि‍चय

चित्रकार जे.पी. सिंघल।

जन्म 24 अक्तूबर 1934, मेरठ, उत्तर प्रदेश। दस बरस की उम्र से चित्रकारी। आत्म दीक्षित। अठारह बरस की उम्र में मेरठ छोड़ बम्बई प्रस्थान। शेष जीवन मुम्बई में। बीस बरस की उम्र में ‘धर्मयुग’ में चित्र प्रकाशित। भारतीय देवी-देवताओं, लोक-कथाओं, मंदिरों, आदिवासियों और अजन्ता-एलोरा को लेकर कई कंपनियों के लिए कलैंडर बनाए जिनकी बिक्री की तादाद अस्सी करोड़ के ज्यादा। लगभग 2700 से अधिक मूल पेंटिंग्स। जितने अच्छे चित्रकार, उतने ही  अच्छे छायाकर। पिछले चालीस- पचास बरसों में देश की शीर्ष अभिनेत्रियों और मॉडल्स के छायाकर। राज कपूर की ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के लिए ज़ीनत अमान के किरदार को रूप देने में अहम योगदान। तभी से फिल्मों से जुड़ाव। ‘शान’, मिस्टर इंडिया’, ’हिना’ त्रिदेव’, ‘रॉकी’, ‘बॉर्डर’, ‘गदर’, और ‘बेताब समेत हिन्दी सिनेमा की सौ से अधिक फिल्मों की पब्लिसिटी डिजाइन। मकबूल फिदा हुसेन की फिल्म ‘मीनाक्षी’ में विशेष सहयोग। जे जे स्कूल और जहांगीर कला दीर्घा में प्रदर्शनियाँ। श्री राम(75-76), कृष्ण लीला(1977) के कलेंडरों पर भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार। कलेंडर आर्ट्स के लिए दूसरे राष्ट्रीय पुरस्कार भी। सात मई 2014 को हृदय गति रुकने से मुंबई में निधन।

राजनीति राष्ट्रीय पर्व है, चुनावी जीत देश का सबसे बड़ा लक्ष्य

52 करोड़ युवा वोटर। 18 से 35 बरस का युवा । 18 बरस यानी जो बारहवीं पास कर चुका होगा। और जिसके सपने खुले आसमान में बेफिक्र उड़ान भर रहे होंगे । 25 बरस का युवा जिसकी आंखों में देश को नये तरीके से गढने के सपने होंगे । 30 बरस का युवा जो एक बेहतरीन देश चाहता होगा। और अपनी शिक्षा से देश को नये तरीके से गढने की सोच रहा होगा। 35 बरस का यानी जो नौकरी के लिये दर दर की ठोकरें खाते हुये हताश होगा। लेकिन सपने मरे नहीं होंगे। तो क्या 2019 का चुनाव सिर्फ आम चुनाव नहीं बल्कि बदलते हिन्दुस्तान की ऐसी तस्वीर होगी जिसके बाद देश नई करवट लेगा। हर हाथ में मोबाइल । हर दिमाग में सोशल मीडिया। सूचनाओं की तेजी। रियेक्ट करने में कहीं ज्यादा तेजी। कोई रोक टोक नहीं। और अपने सपनों के भारत को गढते हुये हालात बदलने की सोच। तो क्या 2019 के चुनाव को पकडने के लिये नेताओ को पारंपरिक राजनीति छोड़नी पड़ेगी। या फिर जिसतरह का जनादेश पहले दिल्ली और उसके बाद यूपी ने दिया है उसने पारंपरिक राजनीति करने वाली पार्टियो ही नही नेताओं को भी आईना दिखा दिया है कि वह बदल जाये । अन्यथा देश बदल रहा है ।

लेकिन युवा भारत के सपने पाले हिन्दुस्तान का ही एक दूसरा सच डराने वाला भी है। क्योंकि जो पढ़ रहे है । जो आगे बढने के सपने पाल रहे है । जो प्रोफशनल्स हैं। उनसे इतर युवा देश का एक सच ये भी है कि कि 52 करोड युवा वोटरों के बीच बड़ी लंबी लाइन युवा मजदूरों की होगी। युवा बेरोजगारों की होगी । युवा अशिक्षितों की होगी। 24 करोड़ युवा मनरेगा से कस्ट्रक्शन मजदूर और शारीरिक श्रम से जुड़ा होगा। 6 करोड रजिस्टर्ड बेरोजगार। तो 9 करोड रोजगार के लिये सडक पर होंगे। 11 करोड़ से ज्यादा युवा 5वीं पास भी नहीं होगा। तो क्या युवा भारत के सपने संजोये भारत को युवा चुनावी वोट से गढ़ता हुआ सिर्फ दिखायी देगा। और जिस बूढ़े हिन्दुस्तान को पीछे छोड युवा भारत आगे बढने के लिये बेताब होगा उसकी जमीन तले लाखों किसानों की खुदकुशी होगी। 30 करोड से ज्यादा बीपीएल होंगे। प्रदूषण से और इलाज बगैर मरते लाखों दूधमुंहें बच्चों के युवा पिता होंगे। ये सारे सवाल इसलिए क्योंकि राजनीतिक सत्ता पाने की होड देश में इस तरह मच चुकी है कि बाकि सारे संस्धान क्या करेंगे या क्या कर रहे है इसपर किसी की नजर है ही नहीं । और सत्ता के इशारे पर ही देश चले तो उसका एक सच ये भी ही कि 1977 में यूपी की 352 सीट पर जनता पार्टी ने 47.76 फिसदी वोट के साथ कब्जा किया था । लेकिन यूपी की तस्वीर और यूपी का युवा तब भी उसी राजनीति के रास्ते निकल पडा छा जहा देश को नये सीरे से गढने का सपना था । और 2017 में यूपी की 312 सीट पर बीजेपी ने 39.71 फिसदी वोट के साथ कब्जा किया है । और फिर युवाओ के सपनो को राजनीति के रंग में रंगने को सियासत तैयार है । तो आईये जरा इतिहास के इस चक्र को भी परख लें क्योंकि 43 बरस पहले का युवा आज सत्ता की डोर थामे हुये है। और बात युवाओं की ही हो रही है।

18 मार्च 1974 को छात्रों ने पटना में विधानसभा घेरकर संकेत दे दिये थे कि इंदिरा गांधी की सत्ता को डिगाने की ताकत युवा ही रखते है और उसके बाद जेपी ने संपूर्ण क्रांति का बिगुल फूंका था। और 43 बरस बाद 18 मार्च 2017 यानी परसो जब बीजेपी समूचे यूपी में जीत का दिन बूथ स्तर तक पर मनायेगी। तो संकेत यही निकलेंगे कि सत्ता में भागेदारी या परिवारत्न के लिये युवा को आंदोलन नही बूथ लेबल की राजनीति सीखनी होगी। तो क्या 43 बरस में छात्र या युवा की परिभाषा भी बदल गई है। क्योंकि याद कीजिये 18 मार्च 1974 । जब 50 हजार छात्रों ने ही पटना में विधानसभा घेर लिया तो राज्यपाल तक विधानसभा पहुंच नहीं पाये । यानी तब छात्र आंदोलन ने सडक से राजनीति गढी । और उसी आंदोलन से निकले चेहरे आज कहा कहा खडे है । नीतिश कुमार , रविशंकर प्रसाद , राजनाथ सिंह , रामविलास पासवान, लालू यादव सरीखे चेहरे 43 बरस पहले जेपी आंदलन से जुडे और ये चंद चेहरे मौजूदा वक्त में सत्ता के प्रतीक बन चुके हैं। ध्यान दीजिये ये चेहरे बिहार यूपी के ही है। यानी यूपी बिहार की राजनीति से निकले इन चेहरों के जरीये क्या युवा राजनीति को मौजूदा वक्त में हवा दी जा सकती है। और प्रधानमंत्री मोदी आज जब 2019 के चुनाव के लिये बारहवीं पास युवाओं को जोड़ने का जिक्र कर रहे है और दो दिन बाद 18 मार्च को यूपी में जीत का जश्न बीजेपी मनायेगी तो नया सवाल ये भी निकलेगा कि यूपी का युवा बूथ लेबल पर चुनावी राजनीति की निगरानी करेगा या फिर आंदोलन की राह पकडेगा । यानी सिर्फ चुनावी राजनीति को ही अगर देश का सच मान लें तो ये सवाल खडा हो सकता है कि युवाओ को राजनीति साथ लेकर आये । लेकिन जब सवाल युवाओ के हालातों से जुडेंगे तो फिर अगले दो बरस की बीजेपी की चुनौती को भी समझना होगा। क्योंकि शिक्षा संस्धानो को पढाई लायक बनाना होगा । यूनिवर्सिटी के स्तर को पटरी पर लाना होगा ।

करीब सवा करोड डिग्रीधारियो के लिये रोजगार पैदा करना होगा। सरकारी स्कूल को पढ़ाई लायक बनाना होगा , जहा तीन करोड बच्चे पढ़ते हैं । तो क्या वाकई युवाओ को साधने का राजनीतिक रास्ता इतना आसान है कि नेता छात्र से संपर्क साधे और जमीनी तौर पर यूपी की बदहाली बरकरार रहे । या फिर राजनीति ने जब सारे हालात चुनाव के जरीये सत्ता पाने और सत्ता बोगने पर टिका दिये है तो कही नये हालात एक नये छात्र आदोलन को तो देश में खडा नहीं कर देगें । क्योंकि याद किजिये जेएनयू , डीयू , हैदराबाद , पुणे फिल्म इस्टीयूट , जाधवपुर यूनिवर्सिटी , अलीगढ यूनिवर्सिटी में छात्र संघर्ष बीते दौ हरस के दौर में ही हुआ । और कमोवेश हर कैंपस म वही मुद्दे उठे जो राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करते । यानी सवाल दलित का हो या सवाल साप्रदायिकाता बनाम सेक्यूलरिज्म का । सवाल राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह का हो या फिर शिक्षा का ही हो । संघर्ष करते ये छात्र राजनीतिक दलों की विचारधारा तले बंटते हुये नजर आये । लेकिन छात्र इस सवाल को कभी राजनीतिक तौर उठा नहीं पाये कि सत्ता के लिये नेता राजनीतिक विचारधारा को छोड़ क्यों देते हैं। यानी उत्तराखंड हो या गोवा या मणिपुर । या फिर यूपी-पंजाब में भी ऐसे नेताओ की पेरहिस्त खासी लंबी है जो कल तक जिस राजनीतिक धारा के खिलाफ थे । चुनाव के वक्त या चुनाव के बाद सत्ता के लिये उसी दल के साथ आ खडे हुये । तो क्या छात्र इस सच को समझ नहीं पा रहे है । क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी जब अपने नेताओं को छात्रों से जोडने के लिये कह रहे हैं तो दो सवाल है । पहला छात्र भी राजनीति लाभ के लिये है । और दूसरा-कालेज में कदम रखते ही अब छात्रो को अपनी राजनीतिक पंसद साफ करनी होगी । यानी देश में हालात ऐसे है कि राजनीति ही सबकुछ है । क्योकि हर सरोकार को राजनीतिक लाभ में बदलने का जो पाठ संसदीय दल की बैठक में प्रादनमंत्री ने 16 मार्च को पढाया उसके संकेत साफ है अब राजनीति राष्ट्रीय पर्व है और चुनावी जीत देश का सबसे बडा लक्ष्य ।

ਕੋਈ ਰੂਹਾਨੀ ਫ਼ਲਸਫ਼ਾ ਨਹੀਂ ਬਚੇਗਾ - चुपचाप अट्टहास-26 का पंजाबी अनुवाद

प्यारी साथी जतिंदर ने पिछली पोस्ट वाली कविता का पंजाबी में अनुवाद किया है।

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ਕੋਈ ਰੂਹਾਨੀ ਫ਼ਲਸਫ਼ਾ ਨਹੀਂ ਬਚੇਗਾ


ਮੈਂ ਭਵਿੱਖ
ਮਾਨਤਾਵਾਂ, ਮੁੱਲਾਂ ਨੂੰ ਖਾਰਿਜ ਕਰਦਾ
ਖ਼ਾਲਸ ਲਹੂ ਦੀ ਤ੍ਰੇਹ ਨੂੰ ਮੂਹਰੇ ਰੱਖਦਾ
ਨਵਾਂ-ਨਵੇਰਾ ਭਵਿੱਖ।


ਜਿਹੜੇ ਹਾਲੇ ਤੱਕ ਕਾਲੇ ਮੀਂਹ ਦੀ ਵਾਛੜ 'ਚ ਨਹੀਂ ਭਿੱਜੇ
ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਅਜੇ ਪਿਆਰ ਦਾ ਆਸਰਾ ਹੈ
ਤਿਆਰ ਹੋ ਜਾਓ ਕਿ
ਤੁਹਾਡੀ ਖੱਲ ਤੋਂ ਅੰਬਰ ਤੀਕ ਫੈਲਣਗੇ ਵਿਰਲਾਪ ਕਰਦੇ ਬੱਦਲ਼
ਗਹਿਰੇ ਹੁੰਦੇ ਜਾਂਦੇ ਅੰਨ੍ਹੇ ਖਾਲੀਪਣ ਵਿੱਚ
ਮੇਰਾ ਸਾਥ ਰਵੇਗਾ ਹਰ ਪਲ ਤੁਹਾਡੇ ਨਾਲ
ਹਰ ਪਲ ਤੁਫ਼ਾਨ ਦਾ ਖ਼ਦਸ਼ਾ ਹੋਵੇਗਾ
ਹਰ ਪਲ ਰੁਕੀ ਹੋਵੇਗੀ ਹਵਾ
ਅੱਖਾਂ ਵਿੱਚ ਜ਼ਹਿਰ ਘੁਲਦਾ ਚਲਿਆ ਜਾਵੇਗਾ
ਮੇਰੀਆਂ ਵਿਉਂਤਾਂ ਫੈਲ ਜਾਣਗੀਆਂ ਪਿੰਡ, ਸ਼ਹਿਰ,ਹਰ ਪਾਸੇ
ਕਿਤੇ ਕੋਈ ਪਿਆਰ ਨਹੀਂ ਬਚੇਗਾ
ਕੀੜੀਆਂ ਵਾਂਗ ਰੇਂਗਣਗੀਆਂ ਇਨਸਾਨੀ-ਫ਼ੌਜਾਂ


ਕੋਈ ਰੂਹਾਨੀ ਫ਼ਲਸਫ਼ਾ ਨਹੀਂ ਬਚੇਗਾ
ਰੂਹ ਲਫ਼ਜ਼ ਬਾਕੀ ਨਹੀਂ ਰਹੇਗਾ


ਮੈਂ ਭਵਿੱਖ
ਮਾਨਤਾਵਾਂ,ਮੁੱਲਾਂ ਨੂੰ ਖਾਰਿਜ ਕਰਦਾ
ਖ਼ਾਲਸ ਲਹੂ ਦੀ ਤ੍ਰੇਹ ਨੂੰ ਮੂਹਰੇ ਰੱਖਦਾ ਨਵਾਂ,ਨਵੇਰਾ,ਭਵਿੱਖ।


(चुपचाप अट्टहास-26 का अनुवाद – जतिंदर कौर द्वारा)

जनादेश गढ़ रहा है सियासी लोकतंत्र को

10 करोड़ से ज्यादा बीजेपी सदस्य। 55 लाख 20 हजार स्वयंसेवक, देश भर में 56 हजार 859 शाखायें। 28 हजार 500 विद्यामंदिर। 2 लाख 20 हजार आचार्य। 48 लाख 59 हजार छात्र । 83 लाख 18 हजार 348 मजदूर बीएमएस के सदस्य। 589 प्रकाशन सदस्य । 4 हजार पूर्ण कालिक सदस्य । एक लाख पूर्वसैनिक परिषद । 6 लाख 85 हजार वीएचपी-बंजरंग दल के सदस्य । यानी देश में सामाजिक-सांगठनिक तौर पर आरएसएस के तमामा संगठन और बीजेपी का राजनीतिक विस्तार किस रुप में हो चुका है, उसका ये सिर्फ एक नजारा भर है। क्योंकि जब देश में राजनीतिक सत्ता के लिये सामाजिक सांगठनिक हुनर मायने रखता हो, तब कोई दूसरा राजनीतिक दल कैसे इस संघ -बीजेपी के इस विस्तार के आगे टिकेगा, ये अपने आप में सवाल है। क्योंकि राजनीतिक तौर पर इतने बडे विस्तार का ही असर है कि देश के 13 राज्यों में बीजेपी की अपने बूते सरकार है। 4 राज्यों में गठबंधन की सरकार है। और मौजूदा वक्त में सिर्फ बीजेपी के 1489 विधायक है तो संसद में 283 सांसद हैं। और ये सवाल हर जहन में घुमड़ सकता है कि संघ-बीजेपी का ये विस्तार देश के 17 राज्यो में जब अपनी पैठ जमा चुका है तो फिर आने वाले वक्त में कर्नाटक-तमिलनाडु और केरल यानी दक्षिण का दरवाजा कितने दिनों तक बीजेपी के लिये बंद रह सकता है।

तो सवाल चार हैं। पहला, क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी अर्थहीन हो चली है। दूसरा, हाशिये पर पडे बहुसंख्यक तबके में जातिगत राजनीति खत्म हो चली है। तीसरा,बहुसंख्यक गरीब तबका मुख्यधारा से जुड़ने की आकांक्षा पाल चुका है। चौथा, राज्यों को केन्द्र की सरकार के साथ खड़ा होना ही होगा। यानी जो राजनीति मंडल से निकली, जिस राजनीति को आंबेडकर ने जन्म दिया, जो आर्थिक सुधार 1991 में निकले। सभी की उम्र पूरी हो चुकी है और नये सीरे से देश को मथने के लिये मोदी-भागवत की जोड़ी  तैयार है। क्योंकि इनके सामने विजन सिर्फ अगले चुनाव यानी 2019 का नहीं बल्कि 2025 का है। जब आरएसएस के सौ बरस पूरे होंगे। और सौ बरस की उम्र होते होते संघ को लगने लगा है कि बीजेपी अब देश को केसरिया रंग में रंग  सकती है। क्योंकि पहली बार उस यूपी ने जनादेश से देश के उस सच को ही हाशिये पर ठकेल दिया जहां जाति समाज का सच देश की हकीकत मानी गई। और इसीलिये 18-19 मार्च को कोयबंटूर में संघ की प्रतिनिधि सभा में सिर्फ 5 राज्यों के चुनाव परिणाम के असर से ज्यादा 2025 को लेकर भी चर् होने वाली है। और इस खांचे में मुस्लिमों कैसे खुद ब खुद आयेंगे, इसकी रणनीति पर चर्चा होगी।

तो क्या वाकई संघ-बीजेपी के इस विस्तार के आगे हर तरह की राजनीति नतमस्तक है। या फिर 2017 ने कोई सीख विपक्ष की राजनीति को भी दे दी है। क्योंकि 2014 में मोदी लहर में बीजेपी को 31 फीसदी वोट मिले। और यूपी की सियासत को ही उलटने वाले जनादेश में बीजेपी को 39.7 फिसदी वोट मिले। यानी 2014 में 68 फिसदी वोट विपक्ष में बंटा हुआ था। और यूपी में अगर मायावती भी अखिलेश राहुल के साथ होती तो कहानी क्या कुछ और ही हो सकती थी। क्योंकि मायावती को मिले 22.2 फिसदी वोट सिवाय बीजेपी को जिताने के अलावे कोई काम कर नहीं पाये। लेकिन विपक्ष के वोट मिला दे तो करीब 50 फिसदी वोट हो जाते। तो क्या वाकई अब भी ये तर्क दिया जा सकता है कि जिस तरह कभी गैर इंदिरावाद का नारा लगाते हुये विपक्ष एकजुट हुआ और इंडिया इज
इंदिरा या इंडिया इज इंदिरा का शिगुफा धूल में मिला दिया। उसी तरह 2019 में मोदी इज इंडिया का लगता नारा भी धूल में मिल सकता है। या फिर जिस राजनीति को मोदी सियासी तौर पर गढ रहे है उसमें विपक्ष के सामने सिवाय राजनीतिक तौर तरीके बदलने के अलावे कोई दूसरा रास्ता बचता नहीं है । क्योंकि कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण का रास्ता पकड़ा। मंडलवाद-आंबेडरकरवाद ने जाति को बांटकर मुस्लिम को साथ जोडा । लेकिन दलित-पिछडे-मुस्लिमों की सामाजिक-आर्थिक हालात और बिगड़ी। तो क्या नये हालात में ये मान लिया जाये कि जैसे ही चुनावी राजनीति के केन्द्र में मोदी होंगे, वैसे ही वोट का ध्रुवीकरण मोदी के पक्ष में होगा। क्योंकि मोदी ने देश की उस नब्ज को पकड़ा, जिस नब्ज को राजनीतिक दलो ने सत्ता पाने के लिये वोट बैंक बनाया। तो ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि विपक्ष की वापसी तभी होगी जब मोदी से पैदा हुई उम्मीद टूट जाये। ध्यान दें तो कांग्रेस की राजनीति सियासी इंतजार पर ही टिकी है। और मायावती से लेकर अखिलेश तक उन चार सवालो का राजनीतिक रास्ता कोई नहीं पाये जिसे मोदी ने चुनावी भाषणों में हर जहन में पैदा दिया। पहला परिवारवाद, दूसरा जातिवाद, तीसरा भ्रष्टाचारवाद, चौथा तुष्टीकरण। विपक्ष कह सकता है बीजेपी भी इससे कहा मुक्त है लेकिन पहली बार समझना ये भी होगा कि मोदी ने अपने कद को बीजेपी से बड़ा किया है और सियासी राजनीति के केन्द्र में बीजेपी या संघ की राजनीतिक फिलास्फी नहीं बल्कि मोदी की राजनीतिक समझ है।

लेकिन दिल्ली और यूपी की सत्ता पर काबिज होने के बाद नया सवाल यही है कि क्या जनादेश की उम्मीदपर बीजेपी खरी उतरेगी या उतरने की चुनौती तले मोदी की राजनीति बीजेपी में भी घमासान को जन्म दे देगी । क्योंकि यूपी का सच यही है कि उसपर बीमारु राज्य का तमगा । और कमोवेश हर क्षेत्र में यूपी सबसे
पिछडा हुआ है । तो क्या मौजूदा वक्त में 22 करोड़ लोगों का राज्य सबसे बडी चुनौती के साथ मोदी के सामने है। और चुनौती पर पार मोदी पा सकते है इसीलिये उम्मीद कही बडी है या फिर इससे पहले के हालातों को मोदी जिस तरह सतह पर ले आये उसमें हर पुरानी सत्ता सिवाय स्तात पा कर रईसी करती दिखी इसीलिये जनता ने सत्ता पाने के पूरे खेल को ही बदल दिया। क्योंकि राज्य की विकास दर को ही देख लें तो अखिलेश के दौर में 4.9 फिसदी। तो मायावती के दौर में 5.4 फिसदी । और मुलायम के दौर में 3.6 पिसदी । यानी जिस दौर में तमाम बीमारु राज्यो की विकास दर 8 से 11 फिसदी के बीच रही तब यूपी सबसे पिछडा रहा । और खेती या उघोग के क्षेत्र में भी अगर बीते 15 बरस के दौर को परखे तो खेती की विकास दर मुलायम के वक्त 0.8 फिसदी, तो मायावती के वक्त 2.8 फिसदी और अखिलेश के वक्त 1.8 फिसदी । और उघोग के क्षेत्र में मुलायम के वक्त 9.7 फिसदी , मायावती के वक्त 3.1 फिसदी , अखिलेश के वक्त 1.3 फिसदी है। यानी चुनौती इतनी भर नहीं है कि यूपी के हालात को पटरी पर कैसे लाया जाये । इसके उलट यूपी को उम्मीद है कि करीब 8 करोड गरीबों की जिन्दगी कैसे सुधरेगी । जाहिर है हर नजर दिल्ली की तरफ टकटकी लगाये हुये है । क्योंकि एक तरफ देश में प्रति व्यक्ति आय 93231 रुपए है,जबकि यूपी में यह आंकड़ा महज 44197 रुपए है । देश की 16 फीसदी से ज्यादा आबादी होने के बावजूद यूपी का जीडीपी में योगदान महज 8 फीसदी है । दरअसल, सच यह है कि बीते 20 साल में यूपी का आर्थिक विकास किसी सरकार की प्राथमिकता में रहा ही नहीं। लेकिन मुद्दा सिर्फ आर्थिक विकास का नहीं है। ह्यूमन डवलपमेंट के हर पैमाने पर यूपी फिसड्ड़ी है। यानी गरीबों-दलितों-वंचितों की बात करने वाली हर सरकार ने अपनी सोशल इँजीनियरिंग में उन्हीं के आसरे सत्ता हासिल की-लेकिन गरीबों को मिला कुछ नहीं। आलम ये कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट कहती है कि यूपी के 44 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं । स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति सार्वजनिक खर्च गोवा और मणिपुर जैसे राज्यों से भी कम है। शिशु मृत्यु दर देश के औसत से कहीं ज्यादा है । यानी किसी भी पैमाने पर यूपी की छवि विकासवादी सूबे की नहीं रही और इन हालातों में जब यूपी के जनादेश ने सियासत करने के तौर तरीके ही बदलने के संकेत दे दिये है तो भी जिन्हे जनता ने अपनी नुमाइन्दगी के लिये चुना है उनके चुनावी हफलनामे का सच यही है कि 402 में से 143 विधायकों का आपराधिक रिकॉर्ड है और इनमें 107 विधायकों पर तो गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं । और यूपी अब इंतजार कर रहा है कि उसका मुखिया कौन होगा यानी सीएम होगा कौन । और सीएम के लिये फार्मूले तीन है । पहला कोई कद्दावर जो यूपी का सीएम हो जाये । दूसरा यूपी का दायित्व कई लोगो में बांटा जाये। तीसरा, यूपी पूरी तरह पीएमओ के रिमोट से चले। इन तीन फार्मूलो के अपने अंतर्विरोध इतने है कि अभी नाम के एलान का इंतजार करना पडेगा ।

क्योंकि कोई कद्दावर नेता दायित्वो को बांटना नहीं चाहेगा । दायित्वों को बांटने का मतलब दो डिप्टी सीएम और रिमोट का मतलब पीएमओ में नीति आयोग की अगुवाई में तीन से पांच सचिव लगातार काम करें । यानी संघ और बीजेपी का सामाजिक राजनीतिक विस्तार चाहे देश को केसरिया रंग में रंगता दिखे लेकिन सच यही है कि लोकतंत्र का राग चुनावी जीत तले अकसर दब जाता है। और यूपी सरीखा जनादेश लोकतंत्र को नये तरीके से गढने के हालात भी पैदा कर देता है।

26. कोई रुहानी फलसफा नहीं बचेगा

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मैं भविष्य

मान्यताओं, गुणवत्ताओं को खारिज करता

खालिस ख़ून की प्यास को सबसे पहले पेश रखता

नव-नव्य भवितव्य।




जो अभी तक काली बारिश के छींटों में भीगे नहीं हैं

जिन्हें अब तक किसी के प्यार का सहारा है

तैयार हो जाओ कि

तुम्हारी चमड़ी से आस्मान तक फैलेंगे विलाप करते बादल

गहराते अँधेरे खालीपन में मेरा साथ होगा हर पल तुम्हारे साथ

हर पल तूफान का अंदेशा होगा

हर पल थमी होगी हवा

आँखों में ज़हर घुलता चलेगा

मेरी योजनाएँ होंगी गाँव शहर हर ओर

कहीं कोई प्यार नहीं बचेगा

पिपीलिकाओं सी चलेंगी मानव-सेनाएँ

कोई रुहानी फलसफा नहीं बचेगा

रूह लफ्ज़ बाक़ी न होगा

मैं भविष्य

मान्यताओं, गुणवत्ताओं को खारिज करता

खालिस ख़ून की प्यास को सबसे पहले पेश रखता

नव-नव्य भवितव्य।




I am the future

I dismiss the norms, the values

I am the new, the newer, future

I ask for a drink of pure blood first.



For those who are yet to feel the black rain

Those who still live with love

I say get ready

For mournful clouds will emerge from your skin and 
reach the skies

You will not every moment of the deepening dark 
emptiness escape me

Every moment you will fear a storm

Every moment there will be a lull

And poison will deepen in your eyes

My schemes will span all villages, towns and 
elsewhere

Love will find no place anymore

Armies of humans will parade like ants

No thought spiritual will survive

The word soul will be obliterated





I am the future

I dismiss the norms, the values

I am the new, the newer, future

I ask for a drink of pure blood first.  
Syndicate content

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)