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१९७५ की इमरजेंसी देश की राजनीति का काला और क्रूर अध्याय है

जंतर-मंतर - Sat, 24/06/2017 - 08:32


शेष नारायण सिंह 
४२ साल पहले अपनी सत्ता बचाए  रखने के लिए  तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दिया था.  संविधान में लोकतंत्र के  लिए बनाए गए सभी प्रावधानों को सस्पेंड कर दिया  गया था और देश में तानाशाही निजाम  कायम कर दिया गया  था. राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी के लिए इमरजेंसी की घटनाओं को समझना हमेशा से ही बहुत ही दिलचस्प  कार्य रहा है . इमरजेंसी के बारे में पिछले  ४० वर्षों में बहुत कुछ लिखा पढ़ा  गया है लेकिन एक विषय के रूप में इसकी उत्सुकता कभी कम नहीं होती.  १९७५ के जून में इमरजेंसी इसलिए लगाई गयी थी कि इंदिरा गांधी को लग गया था की जनता का गुस्सा उनके खिलाफ फूट पड़ा है और उसको रोका नहीं जा सकता  . इसके बहुत सारे कारक थे लेकिन जब १९७४ में इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले ने  लोकसभा की सदस्य के रूप में उनके चुनाव को ही खारिज कर दिया तो हालात बहुत जल्दी से इंदिरा गांधी के खिलाफ बन गए . इमरजेंसी वास्तव में स्थापित सत्ता के खिलाफ जनता की आवाज़ को दबाने के लिए किया  गया एक असंवैधानिक प्रयास था जिसको जनता के समर्थन से इकठ्ठा हुए राजनीतिक विपक्ष की क्षमता  ने सफल नहीं होने दिया .१९७१ में हुए मध्यावधि चुनाव में  इंदिरा गांधी को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का अवसर मिल गया था. लेकिन चार साल के अन्दर ही उनको  इमरजेंसी  लगाकर अपनी सत्ता बचानी  पडी,यह राजनीति का बहुत ही दिलचस्प आख्यान है . आज इमरजेंसी की बरसी पर इसी  गुत्थी को समझने की कोशिश की जायेगी .
१९७१ में भारी बहुमत से जीतने के बाद इंदिरा गांधी ने इस इरादे से काम करना शुरू कर दिया था कि अब उनके राज को कोई हटाने वाला नहीं है. बहुमत की सरकार बन जाने के बाद उन्होने जो सबसे बड़ा काम किया वह था , पाकिस्तान के  पूर्वी भाग को एक अलग देश के रूप  में मान्यता दिलवा देना.बंगलादेश की आज़ादी में भारत का योगदान  बहुत की अधिक है . पकिस्तान के साथ भारत की सेना की जीत का श्रेय इंदिरा गांधी को मिला  जोकि जायज़ भी है क्योंकि उन्होंने उसका कुशल नेतृत्व किया था .  बंगलादेश में पाकिस्तान को ज़बरदस्त शिकस्त देने के बाद इंदिरा गांधी की पार्टी  के सामने  विपक्ष की कोई हैसियत नहीं थी , जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी  ने तो उनको दुर्गा तक कह दिया था . शास्त्री जी द्वारा शुरू की गयी हरित क्रान्ति को  इंदिरा गांधी ने बुलंदी तक पंहुचाया था , इसलिए ग्रामीण भारत में  भी थोड़ी बहुत सम्पन्नता आ गयी थी.  कुल मिलाकर १९७२-७३ में माहौल इंदिरा गांधी के पक्ष  में था . लेकिन १९७४   आते आते  सब कुछ  गड़बड़ाने लगा .  और इसी गुत्थी को  समझने में इंदिरा गांधी की राजनीतिक विफलता और इमरजेंसी की समस्या  का हल छुपा हुआ है . इसी दौर में इंदिरा गांधी के दोनों बेटे बड़े हो गए थे . बड़े बेटे  राजीव गांधी थे जिनको इन्डियन एयरलाइंस में पाइलट की नौकरी मिल गयी थी और वे अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ  संतुष्टि का जीवन बिता रहे थे . छोटे बेटे संजय गांधी थे जिनकी पढाई लिखाई ठीक से  नहीं  हो पाई थी और वे पूरी तरह से माता पर ही  निर्भर थे . इस बीच उनकी शादी भी हो गयी थी . कोई काम नहीं था . इंदिरा जी के एक दरबारी  बंसी लाल थे जो हरियाणा के  मुख्यमंत्री थे. उन्होंने संजय गांधी को एक छोटी कार कंपनी शुरू करने की प्रेरणा दी. मारुति लिमिटेड नाम की इस कंपनी को उन्होंने दिल्ली से सटे  गुडगाँव में ज़मीन अलाट कर दी .संजय गाँधी की शुरुआती योजना यह थी कि उद्योग जगत में सफलता हासिल करने के बाद राजनीति का रुख किया जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ . मारुति के  कारोबार में वे बुरी तरह से असफल रहे. उसी दौर में दिल्ली के उस वक़्त के काकटेल सर्किट में सक्रिय लोगों ने उनसे मित्रता कर ली .संजय  गांधी के नए  मित्रों ने उन्हें कमीशन खोरी के धंधे में लगा दिया .इस सिलसिले में वे इंदिरा गाँधी के कुछ चेला टाइप अफसरों के सम्पर्क में आये और नेता बन गए. भारतीय राजनीति का सबसे काला अध्याय संजय गाँधी के साथ ही शुरू होता है. इसी के साथ ही इमरजेंसी  की भूमिका बनी और संविधान को दरकिनार करके इमरजेंसी लगा दी गयी .
इमरजेंसी के राज में बहुत ज्यादतियां हुईं नतीजा यह  हुआ कि १९७७ का चुनाव कांग्रेस बुरी तरह से हार गयी .  कांग्रेस ने बार बार इमर्जेंसी की ज्यादतियों के लिए माफी माँगी लेकिन इमरजेंसी को सही ठहराने से बाज़ नहीं आये . २०१० में  कांग्रेस के 125 पूरा करने के बाद इमरजेंसी को गलत कहते हुए कांग्रेस ने दावा किया कि  उसके लिए संजय गाँधी ज़िम्मेदार थे , इंदिरा गाँधी नहीं .  ऐसा शायद इसलिए किया जा रहा है कि संजय गांधी के परिवार के  लोग आजकल बीजेपी में हैं .  उनकी पत्नी तो केंद्रीय मंत्री  हैं जबकि बेटा भी सांसद है और पार्टी के  महामंत्री पद भी रह चुका  है .जहां तक इमरजेंसी का सवाल है ,उसके लिए मुख्य रूप से इंदिरा गाँधी ही ज़िम्मेदार हैं और इतिहास यही मानेगा . इमरजेंसी को लगवाने और उस दौर में अत्याचार करने के लिए संजय गाँधी इंदिरा से कम ज़िम्मेदार नहीं है लेकिन यह ज़िम्मेदारी उनकी अकेले की नहीं है . वे गुनाह में इंदिरा गाँधी के पार्टनर हैं .यह इतिहास का तथ्य है . अब इतिहास की फिर से व्याख्या करने की कोशिश न केवल हास्यास्पद है बल्कि अब्सर्ड भी है .
 नरेंद्र मोदी के आने के बाद तो खैर विमर्श की भाषा बदल गेई है और संजय गांधी के पक्ष  या विपक्ष में  कोई ख़ास तर्क वितर्क नहीं दिए जाते लेकिन इसके पहले अडवाणी युग में संजय गांधी को इमर्जेंसी के अपराधों से मुक्त करने की कोशिश बहुत   ही गंभीरता से चल रही थी.  इसको विडंबना ही माना जाएगा क्योंकि  दुनिया जानती है कि इंदिरा गांधी के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन को उन प्रदेशों में ही सबसे ज्यादा ताक़त मिली थी जहां आर एस एस का संगठन मज़बूत था . आज की बीजेपी को उन दिनों जनसंघ के नाम से जाना जाता था. इमरजेंसी की प्रताड़ना के शिकार आज की बीजेपी वाले ही हुए थे. अटल बिहारी वाजपेयी ,लालकृष्ण आडवाणी , अरुण जेटली आदि  बीजेपी नेता  जेल में थे . यह सज़ा उन्हें संजय गाँधी की कृपा से ही मिली थी. यह बात बिलकुल सच है और इसे कोई भी नहीं झुठला सकता . बाद में  लाल कृष्ण आडवानी के नेतृव में बीजेपी वालों ने संजय गाँधी को इमरजेंसी की बदमाशी से बरी करने की कोशिश बड़े पैमाने पर की थी. लाल कृष्ण आडवाणी ने तो यहाँ तक कह दिया था कि इमरजेंसी अपराधों के लिए संजय गाँधी को बलि का बकरा बनाने की कोशिश की जा रही है ..अपने बयान में आडवाणी ने कहा था कि , 'अपने मंत्रिमंडल या यहां तक कि अपने कानून मंत्री और गृहमंत्री से संपर्क किए बगैर उन्होंने [इंदिरा गांधी ने] लोकतंत्र को अनिश्चितकाल तक निलंबन में रखने के लिए राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद से अनुच्छेद 352 लगवाया।' उनका कहना है कि इंदिरा गांधी इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पचा नहीं पाईं और उन्होंने आपातकाल लगा दिया।
 इमरजेंसी  में सारे नागरिक अधिकारों को ख़त्म कर दिया गया था . जेल में डाले गए लोगों की संख्या एक लाख 10 हजार आठ सौ छह थी। उनमें से 34 हजार 988 आतंरिक सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में लिए गए लेकिन कैदी को उसका कोई आधार नहीं बताया जाता था . पिछले ४२ वर्षों में इमरजेंसी , उसकी ज्यादतियों और उसके पक्ष और  विपक्ष में बहुत कुछ लिखा पढ़ा जा चुका है . बीजेपी की योजना है कि कांग्रेस मुक्त भारत के अपने  सपने को पूरा  करने के लिए पार्टी पूरी तरह से  राहुल गांधी की दादी की इतनी कमियाँ  गिनाएगी कि जनता इन्दिरा गांधी को ही इमर्जेंसी  की ज़िम्मेदार माने . जनता और इतिहास उनको ज़िम्मेदार मानता है लेकिन इमरजेंसी की बात जब भी होगी इंदिरा गांधी के साथ संजय गांधी का नाम जरूर लिया जाएगा. अब  संजय गांधी का परिवार बीजेपी में बड़े  पदों पर  है तो उनके खिलाफ  बोलने से बीजेपी वाले कैसे बच सकेंगे
इमरजेंसी का सबक यह है कि चाहे जितना भारी बहुमत हो अगर केवल नारों का सहारा लिया जाएगा तो जनता १९७१ की भारी जीत और बांग्लादेश  की विजय के तमगे को भी नज़रंदाज़ कर देती है. इमरजेंसी के बाद जब जनता पार्टी आई तो वह किसी पार्टी की जीत  नहीं थी. वह जनता की ताक़त थी जिसने आपस में  लड़ रहे विपक्ष को एक साथ खड़े होने को मजबूर कर दिया , उनकी नई पार्टी को   जिता दिया, सरकार बनवा दी  और जनता के  साथ किए गए वायदों को पूरा न करने की सज़ा इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी को दे दी. सच्ची बात यह  है कि जब  जनता पार्टी की जीत हुयी थी तब तक पार्टी भी नहीं बनी थी और १९७७ के दौरान जिस चुनाव निशान से  जनता  पार्टी के लोग चुनाव जीत कर आये थे वह चौधरी चरण सिंह   की भारतीय लोकदल का चुनाव निशान, " हलधर किसान " था. इमरजेंसी का सबसे बड़ा सबक यही  है , जनता को गरीबी हटाने के वायदा करके इंदिरा गांधी ने १९७१ में  भारी बहुमत पाया था और जब उन्होंने  वायदा पूरा करने की कोशिश   भी नहीं की और अलग तरह से देश की अवाम को प्राभावित करने की  कोशिश की तो खंडित विपक्ष के बावजूद भी देश ने राजनीति संन्यास ले चुके जयप्रकाश नारायण को सन्यास से बाहर आने को मजबूर किया और  इंदिरा गांधी की स्थापित सत्ता के खिलाफ एक मज़बूत  विपक्ष  तैयार कर दिया 

पार्टी व शॉपिंग- पति पत्नी के जोक्स का उल्टा-पुल्टा रूप -33

शाॅपिंग में मशगूल बीवी का सब्र से साथ देना भी मुहब्बत है गालिब...!.ज़रूरी नहीं हर कोई "ताज-महल" बनवाता फिरे...!
पार्टी में मशगूल मियां का सब्र से साथ देना भी मुहब्बत है गालिब...!.ज़रूरी नहीं हर कोई "सावित्री" बनी फिरे...!

Maheshpur Azamgarh ka

इयत्ता - Wed, 21/06/2017 - 23:46
महेशपुर (आजमगढ़ )
  - हरिशंकर राढ़ी समाज में आए व्यापक परिवर्तनों से कोई अछूता रह गया हो, यह संभव नहीं है। भौतिक प्रगति के साथ वैचारिक बदलाव हर जगह दिख रहा है और उसके साथ-साथ जीवन पद्धति में भी बड़ा बदलाव आया है। रूढ़ियां तो टूटी ही हैं, कुछ अच्छी परंपराएं भी बिखरी हैं। आदमी सुविधाभोगी हुआ है और उसके अनुसार उसने सिद्धांत और व्यवसाय भी बदला है। अन्य क्षेत्रों की भांति राढ़ियों के दोनों गांवों में व्यवसाय और सोच में काफी परिवर्तन आया है। नयी पीढ़ी बेहतर सुविधाओं और रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रही है, खेती पर निर्भरता कम हुई है। किंतु सबसे अधिक असर जातिगत तानेबाने पर हुआ है और उसमें भी सकारात्मक ताने-बाने पर। बिरादरी की परंपराओं का जो जुनून और कानून 30-40 साल पहले तक था, वह बिखर रहा है।

महेश और विष्णु में बड़ा भाई कौन था, इसे निश्चित रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता। महेश ने महराजगंज से उत्तर देवारा क्षेत्र चुना और बस गए। उनके बसाए गांव का नाम महेशपुर हुआ। वह जमाना निश्चित ही सुविधाओं के घोर अभाव का रहा होगा। न कोई रास्ता, न यातायात और न कोई नगरीय जुड़ाव। न जाने महेश बाबा की क्या मानसिकता रही होगी कि छोटी सरयू और बड़ी सरयू (घाघरा) के बीच के कछार क्षेत्र में उन्होंने बसने की ठानी होगी, जबकि दो-तीन सौ साल पहले देश में न कृषियोग्य भूमि की कमी थी और न इतनी आबादी का घनत्व। ऊपर से दूर आए हुए ज्ञानी ब्राह्मण। शायद उन्हें प्रकृति का सान्निध्य प्रिय रहा हो, बड़े साहसी रहे हों या एकांतवासी।
 महेशपुर  में शस्य साम्राज्य :                  छाया हरिशंकर राढ़ी जो भी हो, मेरे बचपन का महेशपुर आज से बहुत भिन्न था। महराजगंज बाजार के पुराने चैक से बनियों और कुम्हारों के मोहल्ले से होते हुए छोटी सरयू नदी को पार करिए और वहां से एक पतली सी गहरी कच्ची सड़क (जिसे हम खोर कहते थे, खोर की कोई सही उत्पत्ति मुझे तो नहीं मिली, हो सकता है कि खोह का अपभ्रंश हो क्योंकि यह रास्ता किसी खोह जैसा ही गहरा था।) सर्पीले आकार में चली जाती थी। कुल जमा चैड़ाई एक बैलगाड़ी निकलने भर को। खोर के दोनों ओर सरपत और मेउड़ी की बाड़। मेउड़ी अब नहीं दिखती और न मैं इस वनस्पति शास्त्र का इतना बड़ा ज्ञाता हूँ कि उसका सर्वव्यापी या वानस्पतिक नाम बता सकूँ। इतना याद है कि इस मेउड़ी का उपयोग टोकरियां (जिन्हें आजमगढ़ मंे खांची कहा जाता है) बनाने में किया जाता था क्योंकि इसके लरछे बड़े मजबूत और चिम्मड़ होते थे। इसके अतिरिक्त छप्पर का बंधन बांधने में भी ये काम आती थीं, जलावन भी होता था किंतु मेउड़ी का सर्वाधिक सदुपयोग अध्यापकों द्वारा छात्रों की पिटाई और चमड़ा उतारने में किया जाता था। यह सर्वसुलभ शस्त्र था और इससे देश की शिक्षा व्यवस्था आगे बढ़ती थी। मैं इस मामले में सौभाग्यशाली था कि मुझे इसके प्रहार का स्वाद नहीं मिला था। कारण दो थे-- एक तो मेरी माता जी उसी विद्यालय में पढ़ाती थीं और दूसरे यह कि मैं अपने काम में किसी प्रकार की कमी नहीं रखता था। हाँ, बाकी बहुत से सहपाठियों को मेउड़ी का प्रहार सहते जरूर देखा था। पूरे मन से पढ़ाने और पीटने के मामले में तब प्राइमरी पाठशाला के अनेक शिक्षक बहुत विख्यात होते थे।

 महेशपुर  में लेखक का पैतृक आवास                  छाया :        हरिशंकर राढ़ीमहराजगंज और महेशपुर के बीच पुराने बाजार से लगभग दो किमी की दूरी थी। इस बीच में न कोई घर और न कोई ठांव। राहगीर अकेला हो और हिम्मती न हो तो उसका मालिक भगवान ही। हाँ, लगभग बीच में मुंडीलपुर गांव जरूर पड़ता था, कितु रास्ते से काफी दूर। बीच में पकवा इनार (पक्का कुआं)। पकवा इनार मुड़ीलपुर के ठाकुर जगन्नाथ सिंह का बगीचा और उसमें बना ऊंची जगत का पक्का कुआं जो शायद आम के बाग के लगने के समय सिंचाई के लिए बनवाया गया होगा। वहां से आगे निकले तो बौलिया नामक एक पोखरी और पेड़ों की घनी झुरमुट। कोढ़ में खाज यह कि बौलिया पर भूतों और चुड़ैलों का बसेरा होने का अंधविश्वास। बच्चे तो क्या, बड़ों की हिम्मत नहीं पड़ती थी शाम ढलते ही वहां से गुजरने की। कुछ लोग थे जो रात में देर से आते, उन्हें बड़ा हिम्मती मर्द माना जाता था। मौसम गर्मियों का हो तो, गनीमत। सबसे भयंकर दृश्य होता था बारिश के मौसम का। छोटी सरयू उफान पर और वहां से गांव तक की खोर पानी से भरी हुई। घुटनों तक पानी, तैरते हुए सांप बिच्छू और उनमें से होकर निकलना। मुझे ठीक से याद है कि बरसात के चार महीनों में हम बच्चों का बाजार जाना बिलकुल बंद। घर का कोई बड़ा सप्ताह में एक दिन बाजार जाता तो नमक, मिट्टी का तेल और माचिस जैसी आवश्यक वस्तुएं ले आता। दो-चार पड़ोसी भी कुछ न कुछ लाने को दे दिया करते। जहां तक मुझे याद है, सन् 1975 के बाद कच्ची सड़क पटनी शुरू हुई थी और सन 1984 में छोटी सरयू पर लकड़ी का पुल बनकर तैयार हुआ था।

महेशपुर आज एक विकसित गांव है और बैंक के अलावा सारी सुविधाएं मौजूद हैं। भारतीय स्टेट बैंक भी लगभग खुल गया था किंतु गांव के प्रभावी लोगों के झगड़े में निरस्त हो गया। महेशपुर में कुल सात पुरवे हैं जिसमें दक्षिण का पूरा और उत्तर के पूरा में राढ़ी ब्राह्मणों के कुल मिलाकर 40 घर होंगे। इसके अतिरिक्त गांव में जातिगत आबादी में यादव बहुसंख्यक हैं। अनुसूचित जाति, कोइरी और गड़ेरिया जाति की भी जनसंख्या अच्छी है। महेशपुर गांव के लोग सामान्यतः शांतिप्रिय हैं और जाति आधारित विवाद कभी भी नहीं हुआ है। जो भी विवाद हैं, वे संपत्ति से संबंधित हैं और न्यायालय के अलावा हिंसा के स्तर पर प्रायः नहीं आते। जातिगत मतभेद या जातिवाद चुनावों के अतिरिक्त कभी मुखर नहीं होता। एक -दूसरे के सुख-दुख में शरीक होने के पुरानी भारतीय संस्कृति अभी भी इस गांव में चल रही है।

जनगणना विभाग के आंकड़ों के हिसाब से (2011की जनगणना, जो वेबसाइट पर उपलब्ध है) इस गांव में कुल 212 परिवार हैं और कुल आबादी 1526 है जिसमें 762 पुरुष और 764 महिलाएं हैं। महेशपुर की साक्षरता दर 66.4 है जो औसत से जरा सा कम है किंतु लिंगानुपात सकारात्मक है। समुद्रतल से ऊँचाई 91 मीटर है।
वैसे वेबसाइट सर्च के दौरान मुझे महेशपुर के विषय में जो जानकारियां मिलीं, वे बड़ी हास्यास्पद और अविश्वसनीय थीं। न जाने किन लोगों ने किस आधार पर कहां से सूचना एकत्रित की तथा पूरी तरह से दिग्भ्रमित करने का प्रयास किया है। उदाहरण के तौर पर एक वेबसाइट ने बताया कि महेशपुर महराजगंज तहसील में पड़ता है जबकि महराजगंज तहसील है ही नहीं। पता नहीं किस जिले के महराजगंज को महेशपुर की तहसील बना दिया। मैंने इस वेबसाइट को काफी पहले मेल भी लिखा किंतु उनके कान पर जूँ नहीं रेंगी। इसी प्रकार एक दूसरी वेबसाइट ने महेशपुर का निकटतम अस्पताल बलरामपुर लिखा है जो गोंडा जिले में है और निकटतम हवाई अड्डा अकबरपुर बताया है जबकि अकबरपुर मे हवाई अड्डा है ही नहीं। इन भ्रामक सूचनाओं के आधार पर कोई महेशपुर के विषय में क्या जानकारी इकट्ठा करेगा, सोचने वाली बात है।

मेरा बचपन और पूरी किशोरावस्था इसी महेशपुर में गुजरी है। युवावस्था का प्रथम चरण भी कमोवेश यहीं बीता है और इस गांव की मिट्टी मेरे तन-मन में बसी है। इस गांव में एक प्राइमरी स्कूल था, कालांतर में एक इंटर कालेज बना। पहली से लेकर आठवीं तक की शिक्षा गांव के प्राथमिक पाठशाला और आदर्श इंटर काॅलेज में हुई। तब यह दसवीं तक ही था। विज्ञान पढ़ने के लिए मैं नौवीं कक्षा में इंटर काॅलेज महराजगंज चला गया किंतु महेशपुर की यादें साथ लगी रहीं। अपने शुरुआती दिनों में आदर्श इंटर काॅलेज वाकई आदर्श रहा। यह बात अलग है कि बाद में विभिन्न कारणों और स्वार्थों के चलते यह अपने नाम का पूरा विरोधी हो गया। गांव में शाखा डाकघर, सहकारी खाद-बीजगोदाम, पशु चिकित्सालय, सरकारी नलकूल और न जाने कितनी सरकारी योजनाएं तबसे हैं जब ये विरली होती थीं। इनमें अधिकांश विकास कार्य एवं संस्थाओं की स्थापना स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व0 पं0 लक्ष्मीकंात मिश्र के अथक प्रयासों एवं प्रभाव से हुई थीं। आदर्श इंटर काॅलेज की स्थापना भी इन्हीं की देन है जिसमें विवाद के चलते अलग होना पड़ा। इसके बाद पं0 लक्ष्मीकांत मिश्र जी ने दक्षिण पूरा में इंटर काॅलेज की जमीन पर सन 1986 के आसपास बालिका विद्यालय की नींव डाली। उनके समय तक बालिका विद्यालय में विकास कार्य होता रहा, अनेक कमरे बने किंतु 90 के दशक में उनका निधन हो जाने के बाद विद्यालय उसी स्थिति में रह गया। उनके सामाजिक अवदान को देखते हुए महराजगंज के नए  पर चौक  उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। वह समय बदलाव का था। निजीकरण शुरू हो गया था, शिक्षा संस्थान समाज सेवा न होकर आय के स्रोत बन गए, सरकारी विद्यालयों का स्तर गिरने लगा, सरकार ने अनुदान देना बंद कर वित्तविहीन मान्यता देनी शुरू कर दी। व्यावसायिक बुद्धि न रखने वाले समाजसेवी पिछड़ते गए और शिक्षा पूर्णरूपेण शिक्षा माफिया के हाथों में चली गई।
 महेशपुर  में अपने पैतृक आवास पर लेखक                  छाया :      हरिशंकर राढ़ी
गांव का व्यासायिक और सामाजिक ताना-बाना बदलता गया। कुछ राढ़ी जो जमींदार थे, जमींदारी उन्मूलन के बाद जमीन पर आ गए। खेतों की सीमा निर्धारित कर दी गई और कालांतर में चकबंदी भी हो गई। महेशपुर के राढ़ियों में सबसे बड़ी जमींदारी रामानंद-रामशरण राढ़ी की थी जो देवारा कदीम से लेकर मथुरा ठेकेदार के पूरा तक फैली थी। समय की मार और कुप्रबंधन ने इनके बिखरने में बहुत योगदान दिया। यह मलाल इस पूरे खानदान को अभी भी सालता है और यह लेखक भी उनकी चौथी पीढ़ी का हिस्सा है। बिखराव के बाद चौथी पीढ़ी ने स्वयं को संभाला और अपनी मेधा और शिक्षा के बल पर अब इनमें से अधिकांश विकसित या विकास की ओर अग्रसर हैं। वैसे भी इस गांव के अनेक राढ़ियों ने मेधा और शिक्षा के बल पर तमाम सरकारी नौकरियां प्राप्त कीं और उच्च पदों पर रहे। इनमें से उत्तर के पूरा  कई लोग उल्लेखनीय हैं। पुरानी पीढ़ी में उत्तर के पूरा में रमाशंकर मिश्र की भी ख्याति थी। आज महेशपुर गांव में अनेक लोग पीएच. डी और उच्च पदस्थ हैं।

महेशपुर का पश्चिमी पूरा यहां की कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा है। इसे पहले इसे ‘सनपुर’ के नाम से जाना जाता था। कागजों में इसे महेशपुर भले ही लिखा जाता हो, स्थानीय लोग इसे सनपुर के नाम से ही जानते हैं। सनपुर की अधिकांश आबादी यादवों की है और मुख्य महेशपुर से इसकी दूरी एक किमी से अधिक ही होगी।
महेशपुर और सनपुर को जोड़ने वाला रास्ता अब पक्की के सड़क के रूप में है और इसके मध्य में श्री मोतीलाल यादव (पूर्व ब्लंाॅक प्रमुख) द्वारा स्थापित स्व0 ईशदत्त स्मारक डिग्री काॅलेज है। हालांकि यह देवारा कदीम के नाम से पंजीकृत है किंतु वास्तव में महेशपुर में स्थापित होने से महेशपुर की शोभा और गरिमा को यह चार चांद लगाता है। गांव की लड़कियों को अब उच्च शिक्षा आंगन में ही मिलने लगी है। चूंकि श्री मोतीलाल यादव के पुत्र श्री राकेश यादव गुड्डू इस क्षेत्र से एमएलसी हैं, अतः विकासकार्य को गति मिलना स्वाभााविक है।

सनपुर से अविछिन्न खेमानंदपुर महेशपुर का छोटा भाई सा लगता है और इन दोनों गांवों  को  मिलाकर ग्रामपंचायत का निर्माण हुआ है। पड़ोसी गांव सादातपुर और खोजापुर आकार और आबादी में बहुत छोटे हैं इसलिए ये भी महेशपुर के अभिन्न अंग से लगते हैं। आपसी भाई-चारा और न्योता-भोज में ये महेशपुर से अलग नहीं होते। दरअसल, दूर के क्षेत्रों में इन दोनों गांवों के लोग स्वयं को महेशपुर का ही निवासी बताते हैं....महेशपुर ख्यातिप्राप्त तो है ही।

 महेशपुर  में शस्य साम्राज्य                           छाया  :     हरिशंकर राढ़ीअब वे असुविधाओं वाले दिन गए। गांव से सटती हुई सड़क घाघरा के बांध सहदेव गंज तक जाती है जिस पर बढ़ते यातायात को देखकर देश की प्रगति का विश्वास होता है। लगभग हर घर में दुपहिया वाहन,  अनेक ट्रैक्टर, गाड़ियां और आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित हो चुका है महेशपुर। अब न वो बाढ़, न खोर और न सांप-बिच्छू। दिन-रात फर्राटे भरती गाड़ियों को देखकर और महराजगंज आजमगढ़ को पैरों के तले देखकर बड़ा संतोष मिलता है, नहीं मिलते तो यहां की पगडंडियों पर बिताए बचपन केे दिन... मेरे बचपन का महेशपुर....

dhanyavad

एक पैर रखता हूँ कि सौ राहें फूटतीं

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'अनहद' के ताज़ा अंक में प्रकाशित आलेख p { margin-bottom: 0.25cm; line-height: 120%; }
p { margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; color: rgb(0, 0, 10); line-height: 120%; text-align: left; }p.western { font-family: "Liberation Serif",serif; font-size: 12pt; }p.cjk { font-family: "Droid Sans Fallback"; font-size: 12pt; }p.ctl { font-family: "Lohit Marathi"; font-size: 12pt; } मुक्तिबोध के लेखन में वैज्ञानिक सोच
हमें बचपन से बतलाया जाता है कि हमारा युग विज्ञान का युग है। विज्ञान, वैज्ञानिक सोच या चेतना या दृष्टि, तकनोलोजी, ये सारी बातें अलग-अलग अर्थ रखती हैं, पर यह माना जाता है कि इनमें गहरा संबंध है। युग विज्ञान का है तो हर इंसानी हरकत में विज्ञान या वैज्ञानिक सोच को ढूँढना लाजिम हो जाता है। सच यह है कि साहित्य पर चर्चा करते हुए विज्ञान ढूँढना कोई मायने नहीं रखता है। ज्ञान प्राप्त करने के कई तरीकों में से विज्ञान एक है, जिसकी कुछ खास विशेषताएँ हैं। वैज्ञानिक पद्धति की कुछ खासियत हैं जो हमें सत्य के आस-पास तक पहुँचने में मदद करती हैं। पर अंतिम सत्य क्या है. यह सवाल खुला रह जाता है। किसी कृति में वैज्ञानिकता या वैज्ञानिक सोच है या नहीं, इस बात का मतलब अक्सर यह होता है कि रचना में तर्कशीलता पर जोर दिया गया है या कि इसके विपरीत रचना की संरचना और इसके कथ्य में भावनात्मकता या आस्था का असर अधिक है। यह बात शुरु में ही समझ लेनी चाहिए कि वैज्ञानिक तर्कशीलता एक खास किस्म की तर्कशीलता है। इससे अलग भी तर्क की संरचनाएँ होती हैं। धर्म, परंपरा आदि के अपने तर्क होते हैं, जिनका विज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए यह पूछना कि किसी साहित्यिक कृति में वैज्ञानिक तर्कशीलता है या नहीं दरअसल साहित्य के रूप का नहीं बल्कि सरोकारों का सवाल है। रूप के नियम होते हैं, जैसे रसशास्त्र के नियम हैं, इन नियमों का विज्ञान से कोई संबंध नहीं है। सरोकारों में भी महज तार्किकता का होना ही विज्ञान की पहचान नहीं है। जहाँ विज्ञान पहली शर्त हो वह कथा, कविता, नाटक आदि विधाओं का साहित्य नहीं होता। यहाँ तक कि विज्ञान-कथा भी विज्ञान नहीं होती, हालाँकि उसमें वैज्ञानिक जानकारियाँ - सच या काल्पनिक – हो सकती हैं। इसलिए बुनियादी या तात्विक अर्थ में साहित्य में विज्ञान ढूँढना निरर्थक है।
इसलिए मुक्तिबोध की रचनाओं में विज्ञान कहाँ है, इस बात का कोई खास अर्थ नहीं है। एक सचेत रचनाकार होने के नाते अपने समय की वैज्ञानिक जानकारियों का ज्ञान उन्हें निश्चित ही रहा होगा। पर हम अधिक से अधिक यही पूछ सकते हैं कि उन्होंने लिखते हुए वैज्ञानिक सोच का इस्तेमाल किया या नहीं। आज विज्ञान से हमारा मतलब आधुनिक विज्ञान से है, जिसका हाल की सदियों में यूरोप और अमेरिका में तेजी से विकास हुआ है। दार्शनिकों ने इस बात पर खूब बहस की है कि विज्ञान क्या है, इसकी विशेषताएँ क्या हैं; काफी हद तक इस पर समझ बन चुकी है, पर कोई आखिरी समझ तक हम आ पहुँचे हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। विज्ञान से अलग वैज्ञानिक सोच के बारे में समझ में स्पष्टता और भी कम है। विज्ञान क्या नहीं है, यह हम जानते हैं, यहाँ तक कि जो विज्ञान नहीं है और जिसे ज़बरन विज्ञान कहने की कोशिश की जाती है, उस सूडो या छद्म विज्ञान के स्वरूप पर भी अच्छी समझ है। पर इस अर्थ में विज्ञान का संबंध वैज्ञानिक पद्धति से है। सोच पद्धति नहीं होता।
तो फिर साहित्य में वैज्ञानिक सोच से हम क्या अर्थ निकाल सकते हैं? साहित्य को विज्ञान के बरक्स खड़ा करने के लिए हमें इसे ज्ञान प्राप्त करने के तरीके या साधन या एपिस्टीम के रूप में देखना पड़ेगा। ज्ञान का मकसद सत्य की खोज है। निश्चित सत्य की खोज हो सकती है, होती है, पर निश्चित सत्य क्या होता है, कुछ होता भी या नहीं, यह बुनियादी सवाल है। दो और दो मिलकर चार होते हैं, कुछ अर्थों में यह एक निश्चित सत्य है, पर हमेशा नहीं। प्रत्यक्ष ज्ञान में किस पैमाने की अनिश्चितता होती है, इस बारे में एक निश्चित समझ हमें विज्ञान से मिलती है। साहित्य और कला इस अनिश्चितता को मापे बगैर हमें जीवन, प्रकृति के रहस्यों और समाज की सच्चाइयों के रुबरु करते हैं। हर तरह की ज्ञान-मीमांसा अंतत: किसी जीवन-दृष्टि से जुड़ी होती है। इस अर्थ में विज्ञान भी हमें एक जीवन-दृष्टि देता है। इसलिए हम साहित्य पढ़ते हुए यह पूछ सकते हैं कि हमें स्थूल जानकारियों से लेकर सूक्ष्म एहसास तक जो कुछ भी मिल रहा है, क्या वह वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि से संगति रखता है। इसका कोई मतलब है भी या नहीं, यह सवाल फिर भी रह जाता है, पर इस पर सोचने-परखने में कोई हर्ज़ नहीं है। साथ ही यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि किसी साहित्यिक कृति का कद उसमें वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि होने या न होने से नहीं मापा जाता।
बदकिस्मती से अधिकतर लोग वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि को सतही तार्किकता और आधुनिक तकनोेलोजी से संपन्न जीवन-शैली मान लेते हैं। यह विज्ञान का सरलीकरण और न्यूनीकरण (reduction) है। अगर यह सही है कि हाल की सदियों में विज्ञान में अभूतपूर्व तरक्की हुई है तो उसका असर हमारी जीवन-दृष्टि में आए बदलावों में दिखना चाहिए। कौन सी बड़ी वैज्ञानिक बातें हाल की सदियों में सामने आई हैं? आम समझ में अक्सर लोग वैज्ञानिक खोज का श्रेय किसी एक व्यक्ति के साथ जोड़ देते हैं। दरअसल किसी भी वैज्ञानिक खोज के पीछे कई सालों तक काम कर रहे कई सारे लोगों का श्रम होता है। सौ साल पहले जो तीन नाम वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि के संदर्भ में लिए जाते थे, वे मार्क्स, डार्विन और फ्रॉएड के हैं । इनमें से फ्रॉएड का संदर्भ काफी हद तक भुलाया जा चुका है, पर जिस खास तरह के मनोवैज्ञानिक विशलेषण को फ्रॉएड ने लोकप्रिय बनाया, उसका व्यापक प्रभाव साहित्य और कलाओं पर पड़ा। धीरे-धीरे फ्रॉएड की जगह फूको, लाकान आदि समाज वैज्ञानिकों ने ले ली और मनोवैज्ञानिक विशलेषण के नए आयाम सामने आए, जो व्यक्ति और समाज के रिशतों की पड़ताल करते हैं। फ्रॉएड के काम की वैज्ञानिकता पर शंकाएँ सामने आईं और अब दिमाग के साइंस की समझ बढ़ने के साथ उनकी कुछ खोजों पर दुबारा चर्चा हो रही है। पिछली सदी के अंत तक इन तीन नामों के अलावा जिन दूसरे नामों को वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि बनाने या बढ़ाने में लिया जाने लगा, उनमें आइन्स्टाइन, श्रोडिंगर, हाइजेनबर्ग, फाइनमैन और हॉकिंग प्रमुख हैं।
मार्क्स और डार्विन के नाम जल्दी मिटने वाले नहीं हैं। डार्विन ने गालापागोस द्वीप में देखे जंतुओं के आकार और स्वभाव के अभूतपूर्व विश्लेषण के साथ जैविक विकास के सिद्धांत को प्रतिष्ठित करते हुए कायनात में इंसान के अस्तित्व पर पहले से मौजूद समझ को झकझोर डाला। यह सचमुच की वैज्ञानिक क्रांति थी और इसका जो असर हमारी जीवन-दृष्टि पर पड़ा है, उस झटके को शांत होने में कई सदियाँ लगेंगी। मार्क्स ने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और इसकी ऐतिहासिक भूमिका को प्रतिष्ठित करते हुए मानव-मूल्यों और सामाजिक-आर्थिक ढाँचों के बीच संबंधों को उजागर किया। डार्विन के सिद्धांतों को वैज्ञानिक क्रांति मानने पर कोई सवाल नहीं उठता, पर फ्रॉएड के निष्कर्षों को आज वैज्ञानिक नहीं माना जाता और मार्क्स का विश्लेषण वैज्ञानिक है या नहीं, इस पर विवाद है। इससे इनका दर्जा कम नहीं हो जाता, और साथ ही यह बात भी मिट नहीं जाती कि इन दोनों धाराओं ने वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वैज्ञानिक पद्धति की कुछ खासियत है जो हमें सत्य के आस-पास तक पहुँचने में मदद करती हैं। पर अंतिम सत्य क्या है, यह सवाल खुला रह जाता है। या यूँ कहें कि सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हम मंज़िल के और करीब पहुँचते रहते हैं, पर मंज़िल ही जैसे स्थिर नहीं रहती। मुक्तिबोध को अक्सर उस अर्थ में वैज्ञानिक सोच से लैस माना जाता है जैसे मार्क्सवाद को वैज्ञानिक विचारधारा कहा जाता है। मार्क्सवाद से अपेक्षा यह है कि एक आखिरी सामाजिक संरचना तक जाने की राह हम जान सकें। हालाँकि मार्क्स ने सामाजिक बराबरी पर व्यापक तौर पर जो बातें कही हैं, उससे अलग किसी स्पष्ट संरचना को या आखिरी मंज़िल तक पहुँचने के किसी एक रास्ते को परिभाषित किया हो, यह कहना मुश्किल है। जिन संरचनाओं को उन्होंने नकारा है, उनको समझना आसान है।
वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि के लिहाज से मुक्तिबोध की 'जन-जन का चेहरा एक' कविता का ध्यान सबसे पहले आता है। इस कविता पर चर्चा कम ही हुई है। इसकी पहली पंक्तियों से ही बार-बार हुए तज़ुर्बों पर आधारित (inductive) निष्कर्ष झलकता है - 'चाहे जिस प्रांत पुर का हो, जन-जन का चेहरा एक।' आज जब राष्ट्रवाद और आतंकवाद के नाम पर भिन्न धर्मों या संस्कृतियों के लोगों को अपने से अलग देखने की प्रवृत्ति को बढ़ाया जा रहा है, यह सरल कविता बड़ी प्रासंगिक है। इसमें वैज्ञानिक दृष्टि कहाँ है? जाहिर है कि 'जन-जन का चेहरा एक' से मतलब यह नहीं है कि धरती पर हर इंसान दूसरे का 'क्लोन' है। हम जानते हैं कि हर इंसान विशिष्ट होता है। उसकी बाक़ी और सब प्राणियों से अलग अपनी खास पहचान होती है। न केवल अपने जीवन-काल में, बल्कि अतीत में जन्मे और भविष्य में जन्म लेने वाले हर इंसान से वह अलग है। फिर 'चेहरा एक' का मतलब क्या है? 'चेहरा' से मतलब शक्ल से नहीं है, जिसका स्वरुप हमारे जीन (genes) में तय है, जो हमारे माता-पिता से हमें मिले हैं। इसका मतलब कविता में आगे समझाया गया है - दुनिया के हर देश में जो धूप इंसान के शरीर पर पड़ती है, वह एक है। दु:खों कष्टों का बोझ एक है, जिनसे जूझने में इंसान की शिद्दत एक है। हर जगह इंसान का एक 'पक्ष' है। यहाँ कइयों को यह शिकायत होगी कि यहाँ विज्ञान की वह सरलीकरण की पद्धति ( reductionist) दिखती है, जो विज्ञान की सीमा है। दरअसल विज्ञान को संपूर्ण मीमांसा की तरह न जानकर उसे महज न्यूनीकरण के यांत्रिक औजारों तक सीमित करना (reduction) कई समाज-वैज्ञानिकों की अधकचरी समझ रही है। जटिल को समझने के लिए reduction एक औजार ज़रूर है, पर यह मीमांसा का एक पक्ष मात्र है, कहानी यहाँ खत्म नहीं होती है। मुक्तिबोध के इंसान की जीवन-धारा धरती पर बहती नदियों की धारा सी एक-सी है। जाहिर है कि गंगा-यमुना और मेकॉंग का बहाव एक जैसा हो, ज़रूरी नहीं है, पर जो बात एक है, वह यह कि वे बहती हैं। कवि ने अपने जीवन के सीमित दायरे में जिन इंसानों को देखा, अपने उन बार-बार किये (inductive‌) अवलोकनों की शृंखला के जरिए वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि 'जन-जन का चेहरा एक'। इसके बाद यह और निष्कर्षों की निष्पत्ति (deduction) की बुनियाद बन जाता है। अगर कोई चाहे तो यहाँ कह सकता है कि वर्ग-जाति-लिंग आदि प्रताड़नाएँ एक ही हैं? क्या यह वाम की बड़ी ग़लती नहीं रही है कि इनको एक ही मान लिया गया है? कवि ने सिर्फ यह कहने की कोशिश की है कि हर ओर संपन्न-ताकतवरों और विपन्न-उत्पीड़ितों के बीच जंग चल रही है। बराबरी के लिए इंसान हर कहीं लड़ रहा है। जब हम सूक्ष्मतर द्वंद्वों की ओर बढ़ते हैं तो हमारे मॉडल में हमें और बातें जोड़नी पड़ती हैं - यह वैज्ञानिक पद्धति का हिस्सा है। इंसान की सामान्य सोच भी कुदरती तौर पर ऐसी ही होती है। इसलिए जिन्हें लगता है कि जटिल को सहज संरचना में देखना ही विज्ञान है, वे वैज्ञानिक पद्धति को बिना जाने ही अनुमान लगा रहे होते हैं। सवाल उठता है कि क्या वैज्ञानिक सोच या दृष्टि हमें अनुमान, अवलोकन, कुदरत के नियम से सिद्धांतों तक की यात्रा पर नहीं ले चलती? सही है कि वैज्ञानिक पद्धति में इन बातों का होना ज़रूरी है, इनमें शामिल होते हुए हम वैज्ञानिक सोच का इस्तेमाल कर रहे होते हैं। या यूँ कहें कि वैज्ञानिक सोच के बिना हम इस यात्रा में आगे नहीं बढ़ सकते, पर सोच ही पद्धति नहीं है। वैज्ञानिक खोज की प्रवृत्ति बुनियादी इंसानी फितरत है, पर कोई सिद्धांत तभी वैज्ञानिक कहलाता है, जब वह उन विशेषताओं पर खरा उतरे, जो वैज्ञानिक पद्धति के साथ जुड़ी हैं। साहित्य का काम वैज्ञानिक सिद्धांत गढ़ना नहीं है, इसलिए साहित्य में वैज्ञानिक पद्धति के सभी पहलू नहीं ढूँढना चाहिए।
वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि में एक खास बात है कि हर सोच आगे नई सोच को जन्म देता है। मुक्तिबोध की कविता में हम पढ़ते हैं - 'मुझे क़दम-क़दम पर/ चौराहे मिलते हैं/ बाहें फैलाए!!' डी एन ए के युग्म-हीलिक्स संरचना की खोज से जो नई राहें निकलीं, वे आज भी आगे और नई राहों में बढ़ती जा रही हैं। बुनियादी इंसानी फितरत – नए रास्तों को ढूँढने और उन पर चलने की बेचैनी - 'एक पैर रखता हूँ कि सौ राहें फूटतीं, / व मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ;/ बहुत अच्छे लगते हैं/ उनके तज़ुर्बे और अपने सपने .../ सब सच्चे लगते हैं;/ अजीब सी अकुलाहट दिल में उभरती है / मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ ;/ जाने क्या मिल जाए?' - यह बेचैन उत्सुकता या कौतूहल वैज्ञानिक सोच का अंग है।
'अँधेरे में' पर चर्चा न हो तो पाठकों को लगेगा कि मुक्तिबोध पर बात ही पहाँ हुई। इस कविता पर कई दिग्गज आलोचकों द्वारा विषद चर्चा की गई है। पिछली आधी सदी के हिन्दी साहित्य में यह कविता एक मील का पत्थर है। इसकी संरचना या कथ्य में अनोखापन है। समकालीन राजनैतिक समस्याओं के साथ मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी की तड़प का सामंजस्य है। जो दिखता है, उसके परे जा कर प्रत्यक्ष अवलोकन में निहित अंत:कारणों की पड़ताल वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि का हिस्सा है। अगर यह पड़ताल आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य तक सीमित रह जाती, तो वह एक अलग दृष्टि होती, वह सही होती या ग़लत, सवाल यह नहीं है - वह अलग है। इस बात को समझना ज़रूरी है, वैज्ञानिक दृष्टि के पीछे गहन अध्यात्म काम कर रहा हो सकता है, पर वह हमें भौतिक जगत में हो रही घटनाओं में भौतिक कारणों को ढूँढने को कहती है। यही नहीं, जहाँ तक हो सके, वह हमें प्रत्यक्ष अवलोकनों में कारण-कारक संबंध ढूँढने को और इस तरह मिले निष्कर्षों को सैद्धांतिक समझ तक ले चलने को विवश करती है। मूर्त से अमूर्त की यह यात्रा यहीं खत्म नहीं होती है। वैज्ञानिक दृष्टि में अमूर्त सिद्धांतों का औचित्य तभी है, जब वह हमें मूर्त सच में होने वाली परिघटनाओं की कल्पना करने और उनके सचमुच घटित होने की संभावनाओं का ऐसा विवरण सामने रखती हैं, जिन्हें हम न केवल गुणात्मक रूप से समझ सकें, बल्कि जिनमें जो कुछ भी माप-तौल लायक हो, उसे माप सकें, यानी परिमाणात्मक रूप से समझ सकें। साहित्य में इतनी लंबी भौतिक यात्रा नहीं होती, होना ज़रूरी भी नहीं है। कोई भी रचनाकार सचेत रूप से ऐसी कोशिश नहीं करता है, पर हम चाहें तो इसके होने या न होने को ढूँढ सकते हैं।
'अँधेरे में' चालीस के दशक के आखिरी सालों के बाद के डेढ़ दशक की उन सच्चाइयों का दस्तावेज है, जो आगामी काल में लगातार बढ़ते राज्य के आतंक का संकेत थीं। एक ओर आज़ाद मुल्क के नए संविधान के मुताबिक व्यापक लोकतंत्रीकरण के संघर्ष थे, दूसरी ओर इनको कुचलने के लिए राज्य की मशीनरी का खुलेआम दुरुपयोग होने लगा था (जो बाद के सालों में औसत रफ्तार से बढ़ता ही चला और आज हम तक़रीबन फासीवादी तानाशाही तक पहुँच चुके हैं)। अपनी सोच को ठोस द्वंद्वात्मकता तक ले जाने के लिए कवि ऐसे औजारों का इस्तेमाल करता है, जैसे अक्सर वैज्ञानिक भी खोज के पूर्वाभास में जाने-अंजाने करते हैं। इसे 'context of discovery (खोज का प्रसंग)' मान कर, 'context of justification (औचित्य का प्रसंग)' की तार्किकता से अलग किया जा सकता है। 'अँधेरे में' की इन पंक्तियों में हम यह ढूँढ सकते हैं - 'वह कौन, सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई!/ इतने में अकस्मात गिरते हैं भीत से/ फूले हुए पलस्तर/ खिरती है चूनेभरी रेत / खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह - / खुद-ब-खुद कोई बड़ा चेहरा बन जाता है / स्वयमपि मुख बन जाता है दिवाल पर' या 'सलिल के तम-श्याम शीशे में कोई श्वेत-आकृति / कुहरीला कोई बड़ा चेहरा फैल जाता है .../'
मुक्तिबोध मुख्यतः राजनैतिक कवि के रूप में जाने जाते हैं और बेशक उनकी रचनाओं में सियासी खयाल खूब आते हैं। मसलन 'पूँजीवादी समाज के प्रति' कविता में पूँजीवाद के ध्वंस की घोषणा पढ़कर ('तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ/ तेरा ध्वंस केवल, एक तेरा अर्थ') कट्टर मार्क्सवादियों को लग सकता है कि यही है - विशुद्ध मार्क्सवादी वैज्ञानिक सच। पर न तो मार्क्स ने ही पूँजीवाद की ऐसी सरलीकृत व्याख्या की है और न ही ऐसी सोच वैज्ञानिक है। कवि जब कविता में बयान देना चाहता है तो उसके पास सीमित विकल्प होते हैं। यही सीमा हमें ऐसे कविताओं में दिखती है। मुक्तिबोध की प्रारंभिक कविताओं में ऐसा उच्छवास प्रचुर है। जब आग्रह से मुक्त होकर उन्होंने लिखा तो प्रारंभिक काल में भी गहरे एहसासों वाली कविताएँ लिखीं - जैसे 'प्रथम छंद' कविता में देखिए – 'युगारम्भ के प्रथम छंद ये / पीले राह-दग्ध मैदानों से युग-जीवन के मटमैले / तप्त क्षितिज पर/ धुँधले, छितरे, गहरे, कोले मेघ अन्ध ये/ तूफानी उच्छवास गन्ध ले / भावी के विकराल दूत हैं, काल-चिह्न ये / दुनिया के आराम नींद के मधु-स्वप्नों में / क्षुब्ध, निपीड़ित, दमित भावनाओं के गहरे श्याम विघ्न ये ।' यहाँ उनकी द्वंद्वात्मक सोच साफ दिखती है, जब वे 'आराम-नींद' या 'राह-दग्ध' जैसे युग्मों को 'प्रथम छंद' के साथ रखते हैं। ऐसे ही 'जीवन की लौ' कविता में 'घूरने लगते हैं बरगद पथराई आँखों से, फैले रीतेपन की विराट लहरों को/ त्यों मन के अंदर प्राण खो चले' जैसी पंक्तियों में वह महाकवि मुक्तिबोध दिखता है, जो बदलते हुए समकालीन भारतीय समाज में युवामन की गहरी पीड़ाओं को अप्रतिम रूप से अभिव्यक्त कर पाता है। स्वयं मुक्तिबोध का कहना है - 'मनुष्य का मन जगत के संवेदना-विम्बों को संगृहीत और संपादित करता रहता है। यदि वह ग़लत ढंग से सम्पादित करता रहा, तो रचनाकार की दृष्टि में विक्षेप होगा और उसकी कला घटिया किस्म की होगी।' यानी सपाट राजनैतिक बयानों को वे अच्छा लेखन नहीं मानते थे। समकालीन विश्व-साहित्य और बौद्धिक उथल-पुथल पर उनकी अद्भुत पकड़ थी। अपने समय में उपलब्ध विज्ञान की जानकारियों को और सचेत रचनाकारों की तरह मुहावरों की तरह मुक्तिबोध ने भी इस्तेमाल किया है। जैसे 'दिमाग़ी गुहाअँधकार का ओरांगउटांग' या और दीगर उदाहरण हैं। उनकी एक अधूरी कहानी में पति और पत्नी के बीच संवाद में शनि ग्रह के चारों ओर मौजूद वलयों का जिक्र आता है।
वैज्ञानिक सोच का एक पहलू यह है कि वह हमें अपने और दूसरों की, समाज और परिवेश की बेहतरी के लिए उकसाता है (इसके बावजूद कि विज्ञान या तकनोलोजी से पर्यावरण का विनाश हुआ है, यह बात सच है)। इसी बेचैनी को हम मुक्तिबोध में देखते हैं, 'ओ मेरे आदर्शवादी मन/ ओ मेरे सिद्धांतवादी मन/ अब तक क्या किया?जीवन क्या जिया?' एक और पहलू ऐसे वर्गीकरण का है, जिसमें पहले से उपलब्ध वर्गीकरणों से अधिक स्पष्टता हो। 'संवेदनात्मक ज्ञान' और 'ज्ञानात्मक संवेदना' जैसे मुहावरों के इस्तेमाल में यही पद्धति दिखती है। पर वैज्ञानिक पद्धति में भावनात्मकता की जगह नहीं होती, यह विज्ञान की ताकत है और यही उसकी सीमा भी है। यह सही है कि संवेदना हमेशा सही निष्कर्ष तक ले जाए, ऐसा कहना मुश्किल है। पर संवेदना के न होने पर सही निष्कर्ष के पास तक पहुँचना भी असंभव ही है। इन मुहावरों के कहते ही मुक्तिबोध उस मार्क्सवाद से अलग हो जाते हैं, जो महज आर्थिक- राजनैतिक है। इन मुहावरों के जरिए वे मार्क्स के अराजक पक्ष से जुड़ जाते हैं। अराजक विश्व-दृष्टि के बिना कोई रचनाकार क्रीएटिव नहीं हो सकता। फेयराबेंड के अनुसार वैज्ञानिक भी अपनी सोच में मूलत: अराजक होते हैं। एक मार्क्सवादी व्यक्ति भी जब साहित्यिक होता है तो अपने लेखन में वह अराजक होता है।मार्क्सवादी सोच राजनैतिक धरातल पर एक खास तर्क को खड़ा करती है, पर वह मार्क्स का अराजक मानवतावादी पक्ष है जो मुक्तिबोध और उनकी परंपरा के बाद के रचनाकारों में तीखी संवेदना की अभिव्यक्ति पैदा करती है।
वैज्ञानिक सोच में सबसे बड़ी बात यह है कि वह प्रतिष्ठित मान्यताओं (paradigm) को तोड़कर नई मान्यताओं को निर्मित करता है। मान्यताओं के टूटने-बनने की इस प्रक्रिया की बुनियाद सवाल उठाने का साहस (अक्सर दुःसाहस) है। इसलिए जब मुक्तिबोध कहते हैं - 'अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे।/ तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब', हम कह सकते हैं कि वैज्ञानिक दृष्टि की सबसे सशक्त पहचान सामने आती है। यही पहचान है जो हमें ब्रह्मांड की देश-काल विशालता के सामने निडर होकर खड़े होने की ताकत देती है। यही पहचान हममें यह एहसास लाती है कि मानव होना, प्राणी होना, ब्रह्मांड में होना और इस होने को जान पाना कितना सुंदर है। इसीलिए तो मुक्तिबोध कहते हैं - 'जिस व्यक्ति से मेरी जितनी अधिक घनिष्टता है, मैं उस व्यक्ति का उतना ही बड़ा आलोचक हूँ।' ऊपर उद्धृत पंक्तियाँ 'अब तक क्या किया, ...!' और 'अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे ...' किसी भी पाठक के लिए ललकार बन कर आती हैं। यह ललकार सिर्फ समाज से नहीं खुद से लड़ने की ललकार भी है। इसे हम अँधेरे से उजाले तक जाने का संघर्ष कह सकते हैं। यह संघर्ष वैज्ञानिक नहीं, नैतिक है।
मुक्तिबोध परंपरा से कटे नहीं थे। अक्सर यह कहा जाता है कि जो वैज्ञानिक है, वह निजी जीवन में भी धार्मिक और कर्मकांडी नहीं हो सकता। जाहिर है कि ऐसी दुनिया में जहाँ धर्मों का बोलबाला हो, यह संभव नहीं है। मुक्तिबोध की रचनाओं में धर्म-चर्चा नहीं है, उनकी कहानियों को पढ़कर लगता है कि वे आधुनिक नास्तिक विचारों से प्रभावित थे, पर ऐसे मुहावरों का भरपूर प्रयोग हमें उनकी रचनाओं में दिखता है जो धर्म और धर्म-परंपरा से आए हैं। खासतौर से उन परंपराओं को जिन्हें सामूहिक रूप से हिंदू धर्म कहा जाता है, उनका संबंध गहरा था। यह बात उनकी संस्कृतनिष्ठ भाषा से लेकर 'ब्रह्मराक्षस' जैसे मुहावरों तक के प्रयोग में दिखती है। इसकी वजह यह है कि जहाँ साहित्य नैतिक सवालों को उठाता है या हमें फंतासी की दुनिया में लो जाता है, वहाँ हम विज्ञान से परे चले जाते हैं। नैतिक सवाल दार्शनिक सवाल हैं, वैज्ञानिक सोच पर दर्शन हावी हो सकता है, पर ये दोनों एक बात नहीं हैं। नैतिक निर्णयों को वैज्ञानिक सोच की कसौटी पर परखा जा सकता है, पर दोनों को गड्ड-मड्ड नहीं किया जाना चाहिए। इसी तरह जहाँ साहित्य में फंतासी का प्रयोग है, वहाँ ऐसी बेमेल बातें दिखेंगी, जो वैज्ञानिक नहीं हैं, पर वे ज़रूरी हैं। फंतासी तर्कशीलता से परे हो, ऐसा नहीं है, पर किसी निश्चित और नियमों में बँधी संरचना में सिमटी हो, ऐसा नहीं हो सकता। मुक्तिबोध की कहानियाँ पढ़कर लगता है कि वे अपने समकालीन अस्तित्ववादी विचारों से प्रभावित थे। इसका मतलब यह है कि उनके जीवन में निजी संघर्षों की उलझनें रही होंगीं। उनकी कहानियों में 'सतह से उठता आदमी' में यह संघर्ष सबसे तीखा बन कर सामने आता है। 'अँधेरे में' और 'ब्रह्मराक्षस' जैसी कविताओं में भी यह दिखता है, पर कविता की अपनी शर्तें हैं और इसलिए वहाँ सीधे-सीधे कुछ भी कहना मुश्किल हो जाता है।
अंत में यह कहना ज़रूरी है कि वैज्ञानिक पद्धति की सार्वभौमिकता पर भले ही शंकाएँ कम हों, वैज्ञानिक सोच को सांस्कृतिक ज़मीन से पूरी तरह अलग करना मुश्किल है। इसलिए अक्सर उत्पीड़त तबकों से यह माँग आती है कि वे स्थानीय मुख्यधारा की संस्कृति का सब कुछ छोड़ना चाहते हैं। इस सब कुछ में भाषा और साहित्य भी है। इसलिए वैज्ञानिक सोच हो या साहित्य को परखने का कोई और दीगर तरीका हो, हमें यह मानकर चलना चाहिए कि कोई अदीब अपनी ज़मीन से कटा नहीं होता और परिवेश में मौजूद पूर्वग्रहों से वह कभी पूरी तरह मुक्त नहीं होता है। अधिक से अधिक वह इस बारे में सचेत हो सकता है और इसे ध्यान में रख कर अदब में घुसपैठ कर सकता है। -(अनहद – मार्च 2017; आलेख में कुछ पंक्तियाँ 'सापेक्ष' के मुक्तिबोध विशेषांक में प्रकाशित मेेरे नोट्स में से ली गई हैं)

*on occasion of Yoga day. Tips :*पति पत्नी के जोक्स का उल्टा पुल्टा रूप-32


पत्नी कुछ भी कहे तो
गर्दन को दो बार ऊपर से नीचे करें ,
*ये सर्वश्रेष्ट योग  है,*

यह योग न सिर्फ आपको बीपी, अनिद्रा, बेचैनी, चिढ़चिढ़ापन इत्यादि रोगों से बचाता है बल्कि  यह योग आपके खुशहाल जीवन की कुँजी है....

नोट : *गर्दन को कभी भी दाँये से बाँये न घुमावें,  ये जानलेवा हो सकता है*.....

योग- पति पत्नी के जोक्स का उल्टा-पुल्टा रूप-31

बहुत जगह यह जोक चल रहा है। हँसने हंसाने के आवाहन के साथ। जैसा कि हमेशा करती हूँ, पति के बदले पत्नी कर दिया है। हंसिए। बताइयेगा कि कितना हंसे/हंसीं।

 एक शादीशुदा की दुखी कलम से योग दिवस ।

योग दिवस को मैं , कुछ इस तरह से मना रहा हूँ,
रात को उसके पैर दबाए थे अब पोंछा लगा रहा हूँ।

धो रहा हूँ बर्तन और बना रहा हूँ चपाती,
मेरे ख्याल से यही होती है कपालभाति।

एक हाथ से पैसे देकर, दूजे हाथ में सामान ला रहा हूँ मैं,
और इस प्रक्रिया को अनुलोम विलोम बता रहा हूँ मैं।

सुबह से ही मैं , घर के सारे काम कर रहा हूँ,
बस इसी तरह से यारों प्राणायाम कर रहा हूँ।

मेरी सारी गलतियों की जालिम ऐसी सजा देती हैं,
योगो का महायोग अर्थात मुर्गा बना देती हैं।

हे योग देव अगर आप गृहस्थी बसाते,
तो हम योग दिवस नहीं पत्नी दिवस मनाते।

 एक शादीशुदा की 'दुखी' कलम से योग दिवस की मासूम सी योग गाथा ।

हँसते रहिये , हँसाते रहिये ।

एक शादीशुदा की दुखी कलम से योग दिवस ।

योग दिवस को मैं , कुछ इस तरह से मना रही हूँ,
रात को उसके पैर दबाए थे अब पोंछा लगा रही  हूँ।

धो रही हूँ बर्तन और बना रही हूँ चपाती,
मेरे ख्याल से यही होती है कपालभाति।

एक हाथ से पैसे देकर, दूजे हाथ में सामान ला रही हूँ मैं,
और इस प्रक्रिया को अनुलोम विलोम बता रही हूँ मैं।

सुबह से ही मैं , घर के सारे काम कर रही हूँ,
बस इसी तरह से दोस्तों प्राणायाम कर रही हूँ।

मेरी सारी गलतियों की जालिम ऐसी सजा देते हैं,
योगो का महायोग अर्थात मुर्गा बना देते हैं।

हे योग देव, अगर आप गृहस्थी बसाते,
तो हम योग दिवस नहीं, पति दिवस मनाते।

 एक शादीशुदा की 'दुखी' कलम से योग दिवस की मासूम सी योग गाथा ।

हँसते रहिये , हँसाते रहिये ।

किसान आन्दोलन और विपक्षी एकता तय करेगी भावी राजनीति की दिशा

जंतर-मंतर - Wed, 21/06/2017 - 04:59


शेष नारायण सिंह

देश की राजनीति में ज़बरदस्त गतिविधियाँ चल रही हैं , प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता के तीन साल पूरे होने पर उनकी पार्टी पूरे  देश में मोदी फेस्ट नाम से त्यौहार मना रही है . मीडिया में प्रधानमंत्री को समर्थन खूब मिल रहा है , सभी सरकारी विभाग भी मोदी फेस्ट में अपना योगदान कर रहे हैं . जिन राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं वहां भी  मोदी जी का त्यौहार  मनाया जा  रहा  है. इसी बीच राष्ट्रपति का कार्यकाल ख़त्म होने वाला है सो नए राष्ट्रपति के चुनाव  के लिए नई दिल्ली में राजनीतिक सरगर्मियां तेज़ हो गयीं हैं .  राष्ट्रपति के चुनाव के लिए जो एलेक्टोरल कालेज है  उसमें सत्ताधारी गठबंधन  का बहुमत है इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिसको चाहेंगे , वह आराम से राष्ट्रपति पद की कुर्सी पर २५ जुलाई को बैठ जाएगा लेकिन विपक्षी पार्टियों से सहमति बनाने के लिए बीजेपी अध्यक्ष ने  तीन केन्द्रीय मंत्रियों की एक समिति बना दी है जो विपक्षी दलों से बातचीत करके राष्ट्रपति का चुनाव निर्विरोध  कराने की कोशिश में जुट गई है .तीन साल पूरे होने पर नरेंद्र मोदी के पक्ष में ख़ासा माहौल है . बीजेपी का दावा  है कि यह नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के कारण है , पार्टी के समर्थक और  कुछ मीडिया संस्थान  भी यही मानते हैं . आमतौर पर माना जा रहा  है कि जिन लोगों ने २०१४ में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए वोट दिया था , वे अभी भी उनके समर्थन में हैं . उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में  उनकी पार्टी को जो सफलता मिली  है वह भी इसी तरफ संकेत करती है . थोक महंगाई की दर भी बहुत कम हो गयी है और टेलिविज़न चैनलों पर  बीजेपी प्रवक्ता इसको बहुत ही करीने से देश दुनिया को समझा रहे हैं . लेकिन जानकार बता रहे हैं कि थोक बाज़ार में सब्जियों के दाम  बहुत ही नीचे आ  गए हैं और किसानों को औने पौने दामों पर बेचना पड़ रहा है . इसलिए थोक दाम बहुत ही नीचे आ गए हैं .दर असल बीजेपी के त्योहारी माहौल को किसानों के आन्दोलन वाली की  मुसीबतें  बहुत ही मुश्किल में डाल रही हैं .चुनाव के दौरान किसानों की भलाई के  लिए नरेंद्र मोदी ने बहुत ही आकर्षक वायदे किये थे . यह वायदे २०१३-१४ के लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान भी किये गए थे और उसके बाद हुए राज्यों के चुनावों में भी किये गये . उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने तो क़र्ज़ माफी वाला मोदी जी का वायदा पूरा  करने की दिशा में बहुत ही महत्वपूर्ण क़दम भी उठा लिया है . मंत्रिमंडल की बैठक में  फैसला ले लिया गया है कि किसानों का क़र्ज़ माफ़ कर दिया जाएगा. प्रधानमंत्री के वायदों  का लुब्बो लुबाब यह था कि किसानों की आमदनी डेढ़ गुना कर दी जायेगी और उनके क़र्ज़ माफ़ कर दिए जायेगें . तीन साल तक तो  इस  मुद्दे पर कोई ख़ास चर्चा नहीं हुयी लेकिन जब उत्तर प्रदेश में  किसानों की क़र्ज़ माफी की घोषणा हो गयी तो कई राज्यों में  किसानों का आन्दोलन शुरू हो गया . तमिलनाडु में तो आन्दोलन पत्तर प्रदेश की क़र्ज़ माफी  की घोषणा के पहले  ही से चल रहा था और उस को  पूरी दुनिया का मीडिया कवर भी  कर रहा था. उत्तर प्रदेश के फैसले के बाद तो महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में ज़बरदस्त आन्दोलन शुरू हो गया . महाराष्ट्र में करीब दो हफ्ते तक चले आन्दोलन के बाद जब राज्य सरकार को समझ में आ गया कि इस बार किसान कुछ लेकर ही जायेगें तो वहां भी आंशिक क़र्ज़ माफी की दिशा में  एक कमेटी बना कर पहला क़दम उठा  लिया  गया . हालांकि कई जानकार मानते हैं कि महाराष्ट्र सरकार ने   मामले को थोडा टालने के  लिए यह क़दम उठाया है . यह ऐसा मुद्दा है जिसपर आने वाले समय  में तय होगा कि सरकार की नीयत क्या थी. जब वक़्त आयेगा तो उसकी भी व्याख्या कर ली जायेगी . बहरहाल अभी समस्या यह  है कि प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी को जिस सबसे बड़े वर्ग ने उनके वायदों पर विश्वास करके वोट दिया था वह अभी नाराज़ है और आन्दोलन के   रास्ते पर है .  किसानों  का आन्दोलन समकालीन भारत के राजनीतिक इतिहास की बहुत बड़ी  घटना बन गया  है क्योंकि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह  चौहान ने मंदसौर के  आन्दोलन को बहुत बिगाड़ दिया . शुरू में उनके गृहमंत्री ने बयान दे दिया कि जिन किसानों की मंदसौर में मौत हुयी है , उनको पुलिस ने गोली नहीं मारी  . बाद में गृहमंत्री  महोदय ने बयान बदला और यह कहा कि पुलिस   ने ही  किसानों की   हत्या की  लेकिन साथ  ही  यह भी प्रचार होने लगा कि जो लोग मरे हैं वे ठीक आदमी नहीं थे . उनकी इस  बात को भी बेमतलब सरकार ने ही साबित कर दिया जब  सरकार ने मरे हुए किसानों के परिवार के लिए एक-एक करोड़ रूपये की सहायता की घोषणा कर दी .  बाद में मुख्यमंत्री जी अनशन पर भी बैठ गए .वहीं  अनशन स्थल पर ही किसानों ने भी धरना दे दिया लेकिन शिवराज सिंह चौहान की वीरता की तारीफ़ करनी होगी  इस माहौल में  ही उसी  उपवास वाले  महंगे और भारी पंडाल में अपनी  पत्नी का जन्मदिन भी मनाया . कुल मिलाकर मध्यप्रदेश में  किसानों के आन्दोलन की समस्या को शिवराज सिंह चौहान ने इतना खराब कर दिया कि केंद्रीय नेतृत्व उनसे खासा   नाराज़ बताया जा रहा है . मध्य प्रदेश के किसान आन्दोलन से होने वाले नुक्सान को शिवराज सिंह ने काबू में करना तो दूर , उसको बढ़ने के लिए बहुत सारे अवसर उपलब्ध कराये .  यह तो उनकी  क़िस्मत अच्छी थी कि जितना नुक्सान होना था वह नहीं हुआ क्योंकि मध्य प्रदेश की मुख्य  विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने किसानों के आन्दोलन से मिलने वाली पूंजी को तितर बितर  कर दिया . पार्टी के आला नेता राहुल गांधी के सबसे  करीबी दोस्त और मध्य  प्रदेश में उनके आघोषित  प्रतिनिधि , ज्योतिरादित्य सिंधिया उसी दिन अमरीका चले गए . जब राज्य कांग्रेस की चिंता करने वाले  उनके कुछ करीबी लोगों ने कहा कि आपको इस वक़्त मंदसौर में होना चाहिए क्योंकि वहां जनता मुसीबत में है तो  बताते हैं कि उन्होंने कहा कि उनका अमरीका जाना बहुत ज़रूरी है . उसके बाद राहुल  गांधी  मंदसौर गए लेकिन वहां से जल्दी जल्दी  वापस आ  गए . उनके करीबी सचिन पाइलट ने उनको समझा दिया कि मंदसौर में रुकना ठीक नहीं है  जबकि जे डी ( यू ) के बड़े नेता शरद यादव भी साथ गए थे और वे आन्दोलन में शामिल होने के मूड में थे .वहां से आकर राहुल गांधी विदेश यात्रा पर  चले गए जिसको कुछ मीडिया संगठन बड़ा मुद्दा  बना रहे हैं . जो भी हो राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया की निष्क्रियता के कारण बीजेपी की वह दुर्दशा होने से बच गयी जो कि इतने बड़े आन्दोलन के बाद हो सकती थी.किसान आन्दोलन के राजनीतिक परिणाम अभी नहीं आये हैं , अभी समय लगेगा . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  किसानों को जो वायदे किये थे उनकी लिस्ट बड़ी  है लेकिन जो मुख्य मुद्दे   हैं वे  खेती करने वालों की आमदनी को डेढ़ गुना  करना और क़र्ज़ माफी मुख्य  हैं . जहां तक क़र्ज़ माफी का सवाल है उसपर तो सरकार के लिए  खासी  मुश्किल आने वाली है .  पूरे देश में किसानों पर बारह लाख  साठ हज़ार करोड़ रूपये का क़र्ज़ है जिसमें से अभी उत्तर प्रदेश  सरकार ने ३६ हज़ार करोड़ की कर्जमाफी की दिशा में पहल   शुरू कर दी है. यह अलग बात है कि उसके लिए केंद्र से कोई सहायता नहीं मिलने वाली है . राज्य के मुख्यमंत्री  योगी आदित्यनाथ दिल्ली आये थे . उनको वित्त मंत्री अरुण जेटली ने  बता दिया कि क़र्ज़ माफी के  लिए उनको केंद्र सरकार से कोई मदद नहीं मिलने वाली है . उत्तर प्रदेश सरकार ने बांड जारी करके धन का इंतज़ाम करने की कोशिश की जिसके लिए रिज़र्व बैंक ने अनुमति ही नहीं  दिया . इसका मतलब यह है कि उत्तर प्रदेश में भी  किसानों की क़र्ज़ माफी  को विपक्षी राजनीतिक मुद्दा बना सकते हैं . यहाँ का विपक्ष मध्यप्रदेश जैसी हालत में नहीं है. यहाँ अखिलेश यादव विपक्ष के  मुख्य नेता हैं और वे मौके की तलाश में बैठे हैं . उन्होंने एक प्रेस वार्ता में भी कहा था कि जब सरकार गलती करेगी तो जनता का पक्ष वे राजनीतिक बहस के  दायरे में लाने में संकोच नहीं करगें . अखिलेश यादव ने अपने परिवार की मुख्य विरोधी , बसपा नेता मायावती की तरफ भी समझौते का हाथ बढ़ा दिया है . उनके चाचा और पार्टी के बड़े नेता  शिवपाल सिंह यादव भी अब समाजवादी पार्टी में हाशिये पर हैं . दर असल मायावती को अपमानित करने के लिए शिवपाल यादव की अगुवाई में ही करीब २२ साल पहले गेस्ट हाउस काण्ड हुआ था . लगता है कि अखिलेश यादव मायावती को गेस्ट हाउस काण्ड की यादों की तकलीफ से बाहर  लाने की कोशिश कर रहे हैं . अगर इन दोनों की एकता हो जाती है और किसानों की क़र्ज़ माफी के मुद्दे पर योगी सरकार की परेशानियां कम  नहीं होतीं तो बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश में राजनीतिक रूप से मुश्किलें पेश आना शुरू हो  जायेंगीं.बीजेपी को मंडल कमीशन से लाभ पाने वाली जातियों की एकता हमेशा परेशान करती रही है. पिछले लोकसभा चुनाव में अपने तब के प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र  मोदी को बीजेपी ने सफलता पूर्वक ओबीसी के रूप में पेश कर दिया था जिसका राजनीतिक लाभ उनको मिला . अगर किसी  राजनीतिक परिस्थिति में ओबीसी जातियों की एकता हो जाती  है तो बीजेपी का मोदी फेस्ट वह राजनीतिक फायदा नहीं ला पायेगा जिसकी उम्मीद में इतना बड़ा आयोजन किया गया है. ओबीसी एकता के राजनीतिक नुक्सान से बीजेपी का आला नेतृव वाकिफ है .  सबको मालूम है कि इस राजनीतिक एकता के सबसे बड़े  शिल्पी लालू प्रसाद यादव ही हैं . हालांकि आजकल उनके परिवार के ऊपर कई तरह की जांच चल रही है  ,  मीडिया में भी उनकी बहुत सारी कमियों को हाईलाईट किया जा रहा है लेकिन जो लालू यादव को जानते हैं , उनको मालूम है कि राजनीतिक पार्टियों की एकता के सबसे बड़े अलमबरदार लालू यादव ही हैं .ऐसे माहौल में जब बहुत सारी राजनीति माहौल में विद्यमान है तो आने वाले दो साल बहुत ही  दिलचस्प होने वाले हैं .ऐसा लगता है  कि  राष्ट्रपति चुनाव के हवाले अगले एक महीने में ही आने वाले दो वर्षों की राजनीति की रूप रेखा तय हो जायेगी . किसान आन्दोलन और  विपक्षी पार्टियों की एकता  देश की दो साल की राजनीति में  अहम भूमिका निभाने वाली है .

क्या 2019 में किसान राजनीति का कोई नया मॉडल दे सकती है ?

मोदी के सामने कोई नेता नहीं टिकता। लेकिन देश में कोई मुद्दा बड़ा हो जाये तो क्या मोदी का जादू गायब हो जायेगा। ये सवाल इसलिये क्योंकि इंदिरा गांधी के दौर को याद कर लीजिये। कहां कोई विपक्ष का नेता इंदिरा गांधी के सामने टिकता था। खासकर 1971 के बाद इंदिरा लारजर दैन लाइफ की इमेज वाली जीती जागती नेता थीं। और कोई सोच भी नहीं सकता था कि इंदिरा की सत्ता जो 1973 तक अजेय दिखायी दे रही थी, 1974 के आते आते वही सत्ता डगमगाते दिखी । उस वक्त जेपी कोई इंदिरा के विकल्प नहीं थे। जेपी सिर्फ जनता के भीतर के सवालों को सतह पर ला रहे थे। और देखते देखते गुजरात से बिहार तक इंदिरा के खिलाफ आम जनता की गोलबंदी ही कुछ इस तरह होती चली गई कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी आंदोलन में शरीक हो गया। और संघ के भीतर की राजनीतिक कुलबुलाहट को भी पहली बार देवरस ने राजनीतिक शुद्दिकरण से कहीं आगे ला खड़ा किया। ठीक इसी तरह नया सवाल मोदी या कोई विकल्प के ना होने का नहीं बल्कि बेरोजगारी के बाद किसान के मुद्दों को लेकर जो कुलबुलाहट समाज के भीतर पनप रही है, अगर वह सतह पर आ जाये तो क्या देश की राजनीति बदल सकती है।

जाहिर है किसान या युवाओं से जुड़ा मुद्दा राष्ट् य राजनीति में ही उठा-पटक ना कर दे। इस पर बाखूबी मौजूदा सत्ता की नजर भी होगी और मौजूदा सत्ता को भी इंदिरा का दौर याद होगा। तो मुद्दा उभरेगा तो संघ की सक्रियता भी होगी। जैसे किसानों के मुद्दे पर किसान संघ सक्रिय है। यानी आने वाले वक्त में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहल मौजूदा सत्ता के लिये तमाम अवरोधों को दूर कर रास्ता निकालने की होगी ही। और मौजूदा हालात को देख कर कोई भी नौसिखिया राजनीतिज्ञ पहली जुबां में ये कह सकता है कि अब संघ स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिये दबाव बनायेगा और  आखिर में मोदी सरकार स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू कर खुद को नायक के तौर पर स्थापित कर लेगी। ये हो भी सकता है कि ये सब गुजरात चुनाव से एन पहले हो।

लेकिन ये भी पहली बार हो रहा है कि कोई एक दल यानी बीजेपी चुनाव दर चुनाव तो जीत रही है लेकिन देश में राजनीतिक शून्यता और गहरी होती जा रही है। यानी सवाल ये नहीं है कि कांग्रेस हो या वामपंथी या फिर कोई भी विपक्ष या समूचा विपक्ष भी मौजूदा मोदी सरकार का विकल्प बन नहीं पा रहा है या इनका इकट्टा होना भी बीजेपी के लिये कोई खतरे की घंटी नहीं है। क्योंकि जब केन्द्र समेत 17 राज्यों में बीजेपी की सरकार हो चुकी हो और आने वाले वक्त में कर्नाटक, हिमाचल, ओड़िशा को लेकर भी लग रहा हो कि वहा भी बीजेपी आ जायेगी। तो फिर कह सकते है कि बीजेपी स्वर्णिम काल को  जी रही है। संघ के लिये बेहतरीन दौर है जब उसके प्रचारक सत्ता में है और एजेंडा देश में लकीर खींच रहा है। लेकिन इस दौर की बारीकी को समझें तो मुश्किल ये है कि बीजेपी जीत कर भी कमजोर हो रही है। संघ की सत्ता में होने के वाबजूद वह अपने ढलान पर है। और इसी कोई दूसर वजह नहीं बल्कि सिर्फ इतनी सी वजह है कि जिन मुद्दों के कटघरे में देश खड़ा है, उन मुद्दों को अभी तक सुलझाने के लिये जनता ने संघ परिवार या बीजेपी की तरफ देखा।


कांग्रेस सत्ताधारी है और उसकी सत्ता तले ही गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार , दलाली या संस्थानों के खत्म होने की शुरुआत हुई। और इन्हीं सवालों को नरेन्द्र मोदी ने चुनाव प्रचार के वक्त मुद्दा भी बनाया। लेकिन मोदी के सत्ता में आने के बाद अगर वही सवाल फन उठाये हुये हैं तो नया सवाल ये नहीं है कि फिर से जनता कांग्रेस को ले आये । नया सवाल ये है कि राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग के हालात बनना है। कांग्रेस की राजनीति का पर्याय बीजेपी में नहीं देखना है या कहें कमोवेश हर राजनीतिक दल का मतलब सत्ता में आने के बाद उसका कांग्रेसीकरण हो जाना है। ये भी कोई सोच सकता है। क्योंकि सरकारी आंकडो के लिहाज से ही समझें तो बीते 15 बरस में कमोवेश हर राजनीतिक दल ने एनडीए-यूपीए गठबंधन के दौर में सत्ता की मलाई चखी। लेकिन इन्ही 15 बरस में किसान ही नहीं बल्कि छात्र और बेरोजगार युवाओं की खुदकुशी के सच को परख लें तो हर घंटे दो किसान ने भी खुदकुशी की और हर घंटे दो छात्र या युवा बेरोजगार ने भी खुदकुशी की। 15 बरस में किसानों की खुदकुशी का आंकड़ा 2 लाख 34 हजार से ज्यादा का है। और इन्हीं 15 बरस में छात्रो की खुदकुशी 95 हजार से जेयादा तो युवा बेरोजगारों की खुदकुशी की संख्या एक लाख 44 हजार से ज्यादा की है। तो फिर सत्ता के परिवर्तन ने ही क्या किसान-युवाओ में उम्मीद जगाये रखी कि हालात ठीक हो जायेंगे। अगर ऐसा है तो अगला सवाल ये भी है कि पहली बार किसान जिस तरह अपनी फसल की किमत ना मिलने से परेशान है और सरकार को भी सुझ नहीं रहा है कि आखिर कैसे फसल की किमत को भी देने की व्यवस्था वह कर दें । तो समाधान के रास्ते कर्ज माफी और फसल बीमा से सुलझाने के प्रयास तल खोजे जा रहे हैं। लेकिन राजनीति इस सच से आखे मूंदे हुये है कि किसानों के मुद्दे से आंखे नेहरु के दौर में भी मूंदी गईं। तब लाल बहादुर सास्त्री ने जय जवान का नारे के साथ जय किसान को भी जोड़ा। लेकिन इंदिरा गांधी से लेकर मोदी तक के दौर में किसान कभी पंचवर्षीय योजनाओं में ही नहीं बल्कि हर बरस के बजट मे भी जगह पा नहीं पाया। और 1991 के बाजार इकनॉमी से पहले या बाद के 25 बरस के दौर में ये मान कर हर राजनीतिक सत्ता ने काम किया कि खेती पर जितनी बडी तादाद टिकी हुई है उसमें जीडीपी में खेती का योगदार कम होगा ही। यानी रुपया कहा से कमाया जाये और कहां खर्च किया जाए।

अर्थव्यवस्था की सारी थ्योरी इसी पर टिकी रही। यानी किसान का पेट भरा रहे । किसान के बच्चों को शिक्षा-स्वास्थ्य सर्विस मिले। देश के सोशल इंडेक्स को छूने की स्थिति में किसान भी रहे। ये कभी किसी सरकार ने सोचा ही नहीं। और चुनावी राजनीति को ही लगातार लोकतंत्र का जामा पहनाकर किसान ही नही युवा बेरोजगार और हाशिये पर तबको में जब यही आस जगायी गयी की सत्ता बदलने से हालात बदल जायेंगे तो क्या 2019 का चुनाव इस सोच के विकल्प के तौर पर याद किया जायेगा। क्योंकि 2014 में जो भी वादे गढ़े गये। जो भी राजनीतिक आरोप गढ़े गये, वह सही - गलत जो भी हो लेकिन पहली बार देश प्रचार प्रसार या कहे टेक्नालाजी के जरीये ऐसे चुनावी दौर में आया, जहां जो दिल्ली में दिखायी देता वही मंदसौर में दिखायी दे रहा था । जो मुंबई की हवा में राजनीतिक माहौल की गर्मी थी वही यूपी के किसी गांव में तपिश महसूस की जा रही थी । यानी आर्थिक असामनता के बावजूद चुनावी लोकतंत्र ने महानगर से लेकर गांव तक को एक प्लेटफार्म पर ला खडा कर दिया । और चाहे अनचाहे मोदी सरकार से नहीं बल्कि वोटरो की तादाद से भी चुनावी लोकतंत्र का आकलन होने लगा। और जब देश इतना राजनीतिक हो गया कि हर मुद्दे का राजनीतिक समाधान ही खोजने लगा तो फिर 2019 के चुनाव में ये अक्स क्या हालात पैदा कर सकता है ये किसे पता है। क्योंकि जिस तरह किसानों के संघर्ष व किसानों की त्रासदी , उनके दर्द को हडपने की राजनीतिक दल सोच रहे है उसमें पहली नजर में लग तो यही रहा है कि मोदी की राजनीति के सामने बौने पडते हर राजनीतिक दलों को पहली बार किसान संघर्ष में अपनी सियासी जमीन दिखायी देने लगी है। दरअसल, संसदीय चुनावी राजनीति के अक्स में अगर किसान को वोटर मान कर लोकतंत्र की धार को परखे तो फिर देश के इस अनूठे सच को भी समझ लें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कुल वोटर 83करोड 40 लाख , 82 हजार 814 वोटर थे । जिनमे से बीजेपी को 17 करोड 14 लाख 36 हजार 400 वोट मिले और दूसरी तरफ कांग्रेस को 10 करोड 67 लाख 32 हजार 985 वोट मिले । और देश में किसान मजदूर का सच ये है कि कुल 26 करोड 29 लाख किसान-मजदूर देश में है । जिनमें 11 करोड 86 लाख किसान तो 14 लाख 43 हजार मजदूर । यानी देश के ससंदीय राजनीति के इतिहास में 1951 से लेकर 2014 तक कभी किसी एक पार्टी को देश में मौजूद किसान-मजदूरों की तादाद से ज्यादा वोट नहीं मिला । लेकिन हर राजनीतिक दल के चुनावी घोषणापत्र में किसानों के हक की बात हर किसी ने जरुर की। 2014 में काग्रेस और बीजेपी दोनो ने बकायदा अपने अपने मैनिफेस्टो में किसानो  पर पन्ना भर खर्च भी किया गया। कांग्रेस ने उपलब्धियां गिनायी तो बीजेपी ने भी 2014 के चुनावी घोषणापत्र में 50 फीसदी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का वादा किया । और सत्ता में आने अगले बरस ही केन्द्र सरकार 50 फिसदी समर्थन मूल्य बढाने से 2015 में ही पलट गई । बकायदा 21 फरवरी 2015 को कोर्ट में एफिडेविट देकर कहा कि 50 फीसदी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाना संभव नहीं है। सरकार के मुताबिक ऐसा करने से बाजार पर विपरित प्रभाव होगा। और तो और जिन राज्यों में किसानों को प्रति क्विंटल धान पर तीन सौ रुपये का बोनस मिलता था वह भी बंद कर दिया गया । तो सवाल सिर्फ चुनावी वादे और उससे पलटने भर का नहीं है। सवाल तो ये भी है कि भारत ने डब्ल्यूटीओ के साथ समझौता कर 10 फिसदी से ज्यादा समर्थन मूल्य ना बढाने पर हस्ताक्षर किये हुये हैं। तो आखिरी सवाल ये भी है कि जब राजनीतिक सत्ता के लिये बाजार ही मायने रखता है। और बाजार अर्थव्यवस्था में किसान को कोई जगह है ही नहीं तो फिर संसदीय चुनावी लोकतंत्र का मतलब किसान के लिये है क्या। और अगर किसानों की खुदकुशी तले ही चुनावी राजनीति का लोकतंत्र जी रही है तो फिर किसान को करना क्या
चाहिये। क्योंकि एक सच तो ये भी है कि किसानों से जुडे देश भर में 62 किसान संघ काम कर रहे हैं यानी राजनीति कर रहे हैं। और राजनीति करने वाले किसानों की जिन्दगी बदल गई लेकिन किसान की हालत बद से बदतर ही हुई। तो फिर 2019 में राजनीति को ही चुनावी लोकतंत्र की चौखट पर किसान खारिज कर दें या नये तरीके से परिभाषित कर दें । मानिये या ना मानिये हालात उसी दिशा में जा रहे है। जो खतरे की घंटी है। सवाल यही है कि राजनीतिक सत्ता इसे समझेगी या सत्ता के लिये राजनीति इस आग को और भड़कायेगी। और किसान राजनीति के इस सच को समझेंगे और देश को ही राजनीति का नया मॉडल देंगे।
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)